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Tuesday, August 9, 2016

दलित क्यों भाजपा के विरोध में खड़े हो रहे हैं: आनंद तेलतुंबड़े


दलित क्यों भाजपा के विरोध में खड़े हो रहे हैं: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/09/2016 01:23:00 PM


गुजरात और महाराष्ट्र में चल रहे दलित आंदोलनों के संदर्भ में आनंद तेलतुंबड़े का लेख. अनुवाद:रेयाज उल हक
 

हाल ही में सहज रूप से शुरू हुए दलित आंदोलनों की लहर में एक खास भाजपा-विरोधी रंग है. चाहे वह रोहिथ वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर देश भर के छात्रों का विरोध हो या फिर गुजरात में सबकी आंखों के सामने चार दलित नौजवानों को सरेआम पीटे जाने की शर्मनाक घटना पर राज्य में चल रहा विरोध हो, या फिर मुंबई में ऐतिहासिक आंबेडकर भवन को गिराए जाने पर 19 जुलाई को होने वाला विरोध प्रदर्शन हो, या राजस्थान में एक नाबालिग स्कूली छात्रा के कथित बलात्कार और हत्या पर उभरा गुस्सा हो या फिर उत्तर प्रदेश में मायावती के लिए भाजपा के उपाध्यक्ष द्वारा की "वेश्या वाली टिप्पणी" पर राज्य में होने वाला भारी विरोध हो, भाजपा के खिलाफ दलितों के गुस्से को साफ-साफ महसूस किया जा सकता है. भाजपा के दलित हनुमान चाहे इस आग को जितना भी बुझाने की कोशिश करें, यह नामुमकिन है कि अगले साल राज्यों में होने वाले चुनावों तक यह बुझ पाएगी. इससे भी बढ़ कर, इन प्रदर्शनों में उठ खड़े होने का एक जज्बा भी है, एक ऐसा जज्बा जिसमें इसका अहसास भरा हुआ है कि उनके साथ धोखा हुआ है. अगर यह बात सही है तो फिर यह संघ परिवार के हिंदू राष्ट्र की परियोजना की जड़ों में मट्ठा डाल सकती है.

रोहिथ की बार-बार हत्या

रोहिथ की संस्थागत हत्या के बारे में अब सब इतना जानते हैं कि उस पर यहां अलग से चर्चा करना जरूरी नहीं है. लेकिन जिस तरीके से उसको दबाने की कोशिश हो रही है वो हत्या से कम आपराधिक नहीं है. गाचीबावड़ी पुलिस ने हैदराबाद केंद्रीय विवि के विवादास्पद वाइस चांसलर अप्पा राव पोडिले, भाजपा सांसद और मोदी के मंत्रिमंडल के मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और एचसीयू में एबीवीपी के अध्यक्ष एन. सुशील कुमार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए उत्पीड़न अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया है. लेकिन पुलिस ने कभी इस पर कार्रवाई नहीं की. रोहिथ की मौत ने छात्रों में आंदोलन की चिन्गारी सुलगा दी थी, जिन्होंने देश भर में ज्वाइंट एक्शन कमेटियां गठित की थीं. इसने अप्पा राव को कैंपस से भाग जाने पर मजबूर किया था.

लेकिन 22 मार्च को, मामला थोड़ा ठंडा पड़ता दिखने पर वो एकाएक वापस लौटे. स्वाभाविक रूप से आंदोलनकारी छात्रों ने वाइस-चांसलर के आवास के बाहर, जहां वे एक मीटिंग कर रहे थे, एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया. उन्हें पुलिस की एक बड़ी सी टुकड़ी ने घेर रखा था. जब आंदोलनकारी छात्रों ने एबीवीपी के सदस्यों को इमारत के भीतर देखा तो उन्हें बड़ा धक्का लगा. उन्होंने भीतर जाना चाहा. दरवाजे पर होने वाली इस धक्का-मुक्की की ओट में पुलिस ने गंभीर लाठी चार्ज किया. पुलिस से बातें करने गए दो फैकल्टी सदस्यों को भी नहीं छोड़ा गया. उन्होंने छात्रों को कई किलोमीटर तक झाड़ियों में खदेड़ते हुए पीटा. उन्होंने लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ भी की.

सभी 27 छात्र और दो फैकल्टी सदस्य प्रो. के.वाई. रत्नम और तथागत सेनगुप्ता को दो पुलिस वैनों में भर दिया गया और फिर हैदराबाद की सड़कों पर घंटों तक चक्कर लगाती उन वैनों में उन पर बेरहम हमलों का एक नया दौर शुरू हुआ. देर शाम तक उनके ठिकाने की कोई खबर नहीं थी. आखिर वे सात दिनों तक कैद रहने के बाद जमानत पर ही बाहर आ सके. रोहिथ को इंसाफ देने का तो सवाल ही नहीं था, जो लोग इसकी मांग कर रहे थे उन्हें ही सजाएं दी जा रही थीं.

मानो इतना ही काफी न हो, गिरफ्तार किए गए प्रोफेसरों को बाद में निलंबित कर दिया गया. जब विवि के प्रवेश द्वार के बाहर उन्होंने अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल करते हुए इसका विरोध किया तो जनता और अनेक प्रगतिशील संगठनों की ओर से समर्थन की बाढ़ आ गई. नतीजों से डरे हुए अप्पा राव के होश ठिकाने आए और उन्होंने निलंबन के आदेश वापस लिए.

विवादास्पद मंत्री और सबसे अहम मानव संसाधन मंत्रालय का नेतृत्व करने के लिहाज से सबसे नाकाबिल स्मृति ईरानी ने अपने और अपने चापलूसों की करतूतों को जायज ठहराने के लिए संसद में झूठ का पुलिंदा पेश करने में अपना सारा का सारा नाटकीय कौशल लगा दिया. जो कुछ हुआ था, उस पर पछताने के बजाए उन्होंने रोहिथ के इंसाफ का आंदोलन करने वालों पर आक्रामक हमला किया. रोहिथ की जाति पर सवाल उठा कर इस मामले को भटकाने की घिनौनी कौशिशें की गईं मानो उनका दलितपन उन्हें हाथोहाथ इंसाफ दिला देगा और उनका दलित न होना अपराधियों के अपराध को हल्का कर देगा.

तेलंगाना राज्य की पूरी ताकत – जिसके लिए करीब 600 लोगों ने अपनी जान दे दी थी और उनमें से अनेक दलित थे – मातम में डूबी हुई मां पर टूट पड़ी कि वो अपनी जाति साबित करें. रोहिथ के पास दलित होने का जाति प्रमाणपत्र होने के बावजूद, एक दलित की जिंदगी जीने और मरने के बावजूद, तेलंगाना प्रशासन ने यह अफवाह फैलाई कि वो दलित नहीं, एक वड्डेरा थे. यह साबित करने के लिए परिवार को जगह-जगह दौड़ाया गया कि रोहिथ असल में एक दलित थे. उन्हें अपने बेटे को खो देने के दर्द को परे कर देना पड़ा. किस्मत से सरकार की सारी तरकीबें नाकाम रहीं और रोहिथ का दलित होना साबित हुआ. 

जैसी कि उम्मीद थी, अपराधियों पर इसका कोई भी फर्क नहीं पड़ा. वे सभी ताकत के अपने पदों पर जमे हुए हैं, जबकि इंसाफ के लिए संघर्ष कर रहे छात्रों को आखिरी हदों तक धकेला जा रहा है. अप्पा राव ने उस दलित वीथि को हटा दिया है, जो रोहिथ और उनके चार निष्कासित साथियों की आखिरी शरण स्थली थी, जिसे उन्होंने शॉपकॉम पर खड़ा किया था. यह जगह मौजूदा आंदोलन का एक प्रतीकात्मक केंद्र थी. वहां लगाई गई आंबेडकर की प्रतिमा भी चुरा ली गई और रोहिथ के अस्थायी स्मारक पर लगाए गए रोहिथ के पोर्ट्रेट को बिगाड़ दिया गया.

गुजरात में गुंडागर्दी

11 जुलाई को गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में उना तालुका के मोटा समाधियाला गांव में एक दलित परिवार, जाति द्वारा नियत अपने पेशे के मुताबिक एक मरी हुई गाय का चमड़ा उतार रहा था, कि गौ रक्षा समिति का भेस धरे शिव सेना का एक समूह उनके पास पहुंचा. उन्होंने गाय की हत्या करने का आरोप लगाते हुए पूरे परिवार को पीटा और फिर चार नौजवानों को उठा लिया. उन्होंने उनकी कमर में जंजीर बांध कर उन्हें एक एसयूवी से बाध दिया और फिर उन्हें घसीटते हुए उना कस्बे तब ले आए, जहां एक पुलिस थाने के करीब उनको कई घंटों तक सबकी नजरों के सामने पीटा गया.

हमलावरों को इस बात को लेकर यकीन था कि उन्हें इसपर कभी भी किसी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा, इसलिए उन्होंने अपनी इस खौफनाक हरकत का वीडियो बनाया और उसे सार्वजनिक भी किया. लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया. इससे भड़क उठे दलित खुद ब खुद सड़कों पर उतर पड़े. हालांकि गुजरात कभी भी दलितों की स्थिति के लिहाज से आदर्श राज्य नहीं रहा था, लेकिन यह दलितों पर ऐसे दिन-दहाड़े अत्याचार का कभी गवाह नहीं रहा था.

राज्य भर में दलितों के भारी विरोध प्रदर्शनों की एक स्वाभाविक लहर दौड़ गई. करीब 30 दलितों ने अपने समुदाय के साथ होने वाली नाइंसाफियों को उजागर करने के लिए खुदकुशी करने की कोशिश की. लेकिन सबसे समझदारी भरी कार्रवाई मवेशियों की लाशों को अनेक जगहों पर कलेक्टर कार्यालयों के सामने डाल देना था. दलितों ने एकजुटता जाहिर करने की एक गैरमामूली कदम उठाते हुए लाशें उठाने और उनका चमड़ा उतारने का अपना परंपरागत काम रोक दिया और इस तरह इनसे होने वाली आमदनी की भी कुर्बानी दी.

28 जुलाई के द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में हर जगह सड़ती हुई लाशें एक महामारी का खतरा बन गई हैं. पशुपालन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में करीब एक करोड़ गाएं और भैंसें हैं जिनके मरने की दर 10 फीसदी है. इसका मतलब ये है कि हर रोज राज्य भर में 2,740 मवेशी मरते हैं. किसी जगह पर ऐसी ही पड़ी एक लाश की बदबू जनता की बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, और ऐसे में ऊपर दी गई तादाद तो एक तबाही ही ला सकती है.

गौ रक्षा संस्थाओं को होश आ गया है और वे यह कबूल करने को मजबूर हुई हैं कि वो इस समस्या के बारे में नहीं जानती थीं और अब वे लाशों का निबटारा करने के तरीके खोजेंगी. अगर देश भर के नहीं तो पूरे राज्य में मैला ढोने के काम में लगे दलितों (सरकारों द्वारा कसम खा कर उनके वजूद को नकारने के बावजूद उनकी तादाद हजारों में है) और इसी तरह पूरे राज्य के सफाई कर्मियों को भी इस विरोध का हिस्सा बन जाना चाहिए.

आंबेडकर की विरासत चकनाचूर

25 जून की रात में आंबेडकरियों का भेस धरे सैकड़ों गुंडे दो बुलडोजर लेकर आए और उन्होंने मुंबई में दादर में स्थित ऐतिहासिक आंबेडकर भवन और आंबेडकर प्रेस को गिरा दिया. ऐसा उन्होंने रत्नाकर गायकवाड़ के कहने पर किया, जो एक रिटायर्ड नौकरशाह हैं और मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में अपनी नियुक्ति करवाने में कामयाब रहे हैं. प्रेस का एक ऐतिहासिक मूल्य था, क्योंकि उसका संबंध बाबासाहेब आंबेडकर से था. उनके अहम अखबारों में से दो जनता और प्रबुद्ध भारत यहीं से छपते और प्रकाशित होते थे और यह 1940 के दशक में आंबेडकरी आंदोलन का एक केंद्र भी था. उनके निधन के बाद भी यह एक केंद्र बना रहा; भूमि संघर्ष पर आंदोलन, 'रिडल्स' विवाद पर आंदोलन और नामांतर संघर्षों की योजना यहीं बनी और उन अमल हुआ.

दूसरी इमारत आंबेडकर भवन एक एकमंजिला, अंग्रेजी के 'यू' अक्षर के उल्टे शक्ल की थी जिसे 1990 के दशक में बनाया गया था. इन दोनों इमारतों को गिराने के लिए जिस बहाने की ओट ली गई, कि वे ढांचागत रूप से खतरनाक थे, वे जाहिर तौर पर गायकवाड़ द्वारा 'गढ़े' गए थे. इस दुस्साहस भरी कार्रवाई से और इससे भी ज्यादा जिस शर्मनाक और उद्दंड तरीके से उसको जायज ठहराया जा रहा था, उससे लोग भौंचक रह गए. जैसा कि इसके पहले और इसके बाद होने वाली घटनाओं ने उजागर किया, गायकवाड़ राज्य में भाजपा के दिग्गजों के हाथों का मोहरा भर थे. 

ट्रस्ट की विवादास्पद स्थिति से वाकिफ मुख्यमंत्री ने प्रस्तावित 17 मंजिला आंबेडकर भवन के लिए चोरी-छिपे भूमिपूजन किया (और मजे की बात है कि यह पूजा कहीं और की गई) और इसके लिए 60 करोड़ के अनुदान का ऐलान भी किया. 25 जून को जो कुछ हुआ था, वह खुल्लम-खुल्ला एक आपराधिक करतूत थी, जिसको मजबूरन गायकवाड़ को कबूल करना पड़ा. उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा करने से बचने के लिए उनकी संवैधानिक हैसियत का एक झूठा बहाने को सामने कर दिया गया.

गायकवाड़ और भाजपा सरकार के अपराधों से नाराजगी के साथ 19 जुलाई को मुंबई में एक भारी मोर्चा निकाला गया. घटनाओं के इस पूरे सिलसिले ने दलितों के भीतर वर्गीय बंटवारे को सबसे बदसूरत तरीके से उजागर किया. जहां उच्च मध्य वर्ग के दलितों ने गायकवाड़ का समर्थन किया, जिसमें प्रवासी दलित (डायस्पोरा) तबका और दलित नौकरशाहों से मिले हराम के पैसों पर आरामतलबी की जिंदगी जीते बौद्ध भिक्षु भी शामिल हैं. दूसरी तरफ दलितों की व्यापक बहुसंख्या ने उनकी गिरफ्तारी की मांग की और आंबेडकर परिवार का समर्थन किया जो गायकवाड़ के खिलाफ खड़े थे. बाबासाहेब आंबेडकर के तीनों पड़पोते आमतौर पर स्वतंत्र रहे हैं और कांग्रेस या भाजपा के साथ सहयोग करने से इन्कार किया है. 

राजनीतिक रूप से उनका नजरिया अवाम के हक में रहा है और उन्होंने जनसंघर्षों का समर्थन किया है. चाहे जितना भी कमजोर हो, आज वे अकेले आंबेडकरी प्रतिष्ठान है जो पूरी मजबूती से हिंदुत्व ताकतों के खिलाफ हैं.

इसलिए भाजपा के लिए उनकी छवि को बदनाम करना जरूरी है. इस काम को पूरा करने के लिए मध्यवर्ग के दलितों के एक हिस्से को चुपचाप उकसाया जा रहा है. धीरे-धीरे उन्होंने यह प्रचार खड़ा किया है कि बाबासाहेब आंबेडकर के वारिस आंबेडकरी नहीं बल्कि माओवाद के समर्थक हैं. कम से कम एक दलित अखबार महानायक पिछले पांच बरसों से इस झूठ को पूरे उन्माद के साथ फैलाता आ रहा है. इमारतों को तोड़े जाने के इस पूरे नाटक के जरिए भाजपा का इरादा इसी मकसद को हासिल करने का था. गायकवाड़ ने तीनों पोतों और उनके पिता यशवंतराव आंबेडकर को गैर कानूनी कब्जा करने वाले नालायक और गुंडा बताया.

आंबेडकर भवन को गिराना और आंबेडकर के परिवार की छवि को मिट्टी में मिलाना, गायकवाड़ के ये वो दो जुड़वां काम थे जिनके लिए उन्हें देश भर में भड़कते जनता के गुस्से की अनदेखी करते हुए भाजपा सरकार से समर्थन मिल रहा है. इस खुलेआम आपराधिक मामले में पुलिस और राज्य मशीनरी जिस तरह पेश आती रही है और आ रही है उसी से सरकार का तौर-तरीका साफ हो जाता है.

दलित 'हनुमानों' की बेशर्मी

भाजपा अपने तीनों दलित रामों को अपना 'हनुमान' बना देने में कामयाब रही है. उन्होंने कुछ तथाकथित दलित बुद्धिजीवियों को भी लालच देते हुए अपनी हां में हां मिलाने के लिए अपनी तरफ खींचा है. गुजरात में दलित नौजवानों को पीटे जाने पर देश भर में भड़क उठे गुस्से के ताप में भी, एक दलित 'हनुमान' ऐसा था जो बेशर्मी से यह कहता फिर रहा था कि दलितों पर अत्याचारों से गुजरात का नाम नहीं जोड़ा जाए. जिस तरह उन्होंने राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो (एनसीआरबी) के अपराध के आंकड़ों को गलत और संदर्भ से हटा कर पेश किया, उसी से उनकी गुलामी और बौद्धिक बेईमानी जाहिर होती है. एक तरफ जब गैर-दलित पैनलिस्ट गुजरात में भड़के गुस्से को जायज ठहरा रहे थे, यह पिट्ठू बड़े भद्दे तरीके से यह बहस कर रहा था कि जातीय अत्याचारों के मामले में गुजरात अनेक राज्यों से बेहतर है.

तथ्य ये है कि दलितों पर अत्याचारों की घटनाओं के मामले में गुजरात के सिर पर, ऊपर के पांच राज्यों में लगातार बने रहने का एक खास ताज रखा हुआ है. 2013 में जब आने वाले आम चुनावों और प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताजपोशी के मद्देनजर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का 'वाइब्रेट गुजरात' का जाप चरम पर पहुंचा, अनुसूचित जातियों (एससी) की प्रति लाख आबादी पर अत्याचारों की तादाद उसके पहले वाले साल के 25.23 से बढ़ कर 29.21 हो गई. इसके नतीजे में राज्य देश का चौथा सबसे बदतर राज्य बन गया.

पहले गलत तरीका अपनाते हुए एनसीआरबी अत्याचारों की गिनती प्रति लाख आबादी पर करता आ रहा था; सिर्फ 2012 से यह प्रति लाख एससी आबादी के संदर्भ में घटनाओं को जुटा रहा है. इसलिए एनसीआरबी तालिकाओं में दी गई एससी के खिलाफ अपराध की घटनाओं की दरों को सही आंकड़ों में बदलने की जरूरत होगी, लेकिन उनसे भी राज्यों के बीच में गुजरात की तुलनात्मक स्थिति के बदलने की संभावना कम ही है.

हत्या और बलात्कार जैसे बड़े अत्याचारों के मामले में भी गुजरात बदतरीन राज्यों में से है. तालिका एक भारत के बड़े राज्यों में 2012 और 2013 के लिए इन अत्याचारों की दरें मुहैया कराती है, ताकि दिखाया जा सके कि कैसे दलितों के खिलाफ अपराधों के लिए गुजरात का नाम ऊपर के राज्यों में आता है.




तालिका साफ-साफ दिखाती है कि हत्याओं की दरों के मामले में 2012 में सिर्फ दो ही राज्य, उत्तर प्रदेश (0.57) और मध्य प्रदेश (0.78) गुजरात से आगे थे और 2013 में गुजरात साफ तौर पर उनका सिरमौर बन गया. असल में यह 2012 में भी करीब-करीब उत्तर प्रदेश के बराबर ठहरता है, जो अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों के लिए इतना बदनाम राज्य रहा है. बलात्कारों की दर के मामले में 2012 में पांच राज्य छत्तीसगढ़ (3.86), हरियाणा (2.79), केरल (6.34), मध्य प्रदेश (6.75) और राजस्थान (3.44) गुजरात से आगे रहे हैं. 2013 में गुजरात खुद को ऊपर ले गया और छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ते हुए पांचवें स्थान पर पहुंच गया. यह बस हरियाणा (5.45), केरल (7.36), मध्य प्रदेश (7.31) और राजस्थान (5.01) से ही पीछे था.

मोदी के घड़ियाली आंसू

कहा गया कि नरेन्द्र मोदी इस हादसे के बारे में जानकर विचलित थे, मानो उनके 'आदर्श' गुजरात में पहली बार दलितों पर जुल्म हो रहा हो. सितंबर 2012 में गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक छोटे से कस्बे थानगढ़ में मोदी की पुलिस ने लगातार दो दिनों (22 और 23 सितंबर) में तीन दलित नौजवानों को गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन मोदी एक शब्द भी नहीं बोले जबकि वे उस जगह से महज 17 किमी दूर विवेकानंद यूथ विकास यात्रा का नेतृत्व कर रहे थे. 

पहले दिन एक छोटे से झगड़े में एक दलित नौजवान को पीटने वाले भारवाड़ों के खिलाफ विरोध कर रहे दलितों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं. पुलिस फायरिंग में एक सात साल का लड़का पंकज सुमरा गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसकी मौत बाद में राजकोट अस्पताल में हो गई. मौत की खबर ने दलितों में नाराजगी भड़का दी जो इस मौत के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की मांग के साथ सड़कों पर उतर पड़े. अगले दिन, पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों पर फिर से गोलियां चलाईं और तीन दलित नौजवानों को घायल कर दिया, जिनमें से दो मेहुल राठौड़ (17) और प्रकाश परमार (26) राजकोट सिविल अस्पताल में मर गए. 2012 के राज्य विधानसभा चुनावों के ऐन पहले हुई इन हत्याओं से राज्य भर में सदमे की लहर दौड़ गई और चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं. जांच सीआईडी (अपराध) को सौंप दी गई. लेकिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआरों के बावजूद सिर्फ एक मामले में ही आरोपपत्र (चार्ज शीट) दायर की गई और एक आरोपित बीसी सोलंकी को तो गिरफ्तार तक नहीं किया गया.

गुजरात में अपने दलित समुदाय के सामंती दमन का लंबा इतिहास रहा है. राज्य का दलित समुदाय राष्ट्रीय औसत 16.6 की तुलना में छोटा और आबादी का महज 7.1 फीसदी है और यह मुख्यत: राजनीतिक रूप से निष्क्रिय रहा है. हालिया इतिहास में, 1970 के दशक में दलित पैंथर्स की झलक के बाद, उन्हें 1981 के आरक्षण विरोधी दंगों ने गांधीवादी नींद से झटके से जगाया. पहली बार राज्य भर में आंबेडकर जयंतियों के उत्सव का दौर शुरू हुआ. लेकिन यह जागना बहुत थोड़ी देर का ही साबित हुआ. जब भाजपा ने दलितों की चुनावी अहमियत को महसूस किया और उन्हें लुभाना शुरू किया, वे आसानी से उनकी बातों में आ गए और 1986 में इसके जगन्नाथ रथ जुलूसों में बढ़-चढ़ कर भागीदारी करने लगे. आगे चल कर खास कर 2002 में गोधरा के बाद मुसलमानों के कत्लेआम के दौरान वे राजी-खुशी से इसके लठैत बन गए. लेकिन जमीन पर उनके लिए कुछ भी नहीं बदला. दलित-विरोधी सिविल सोसायटी की हिमायत से राज्य की खुली या छुपी मिलीभगत के साथ भेदभाव, अपमान, शोषण और अत्याचार बेलगाम तरीके से बढ़ते रहे.

हाल के ही एक अध्ययन ने दिखाया है कि गुजरात में चार जिलों में होने वाले अत्याचार के सभी मामलों में से 36.6 फीसदी को अत्याचार निवारण अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत दर्ज नहीं किया गया था और जहां इस एक्ट को लागू भी किया गया था, वहां भी 84.4 फीसदी मामलों में इसको गलत प्रावधानों के साथ दर्ज किया गया था, जिससे मामलों में हिंसा की गहनता छुप गई थी.[1] इसके पहले अहमदाबाद स्थित काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस ने 1 अप्रैल 1995 से एक दशक के भीतर इस एक्ट के तहत राज्य के 16 जिलों में स्थापित स्पेशल एट्रॉसिटी कोर्ट्स में दिए गए 400 फैसलों का अध्ययन किया और पाया कि पुलिस द्वारा नियमों के निरंकुश उल्लंघन ने मुकदमे को कमजोर किया. फिर न्यायपालिका ने अपने पूर्वाग्रहों से भी इस एक्ट को नकारा बनाने में योगदान किया.[2] 

कोई हैरानी नहीं है कि गुजरात में अत्याचार के मामलों में कसूर साबित होने की दर 10 बरसों में अनुसूचित जातियों-जनजातियों के मामले में भारतीय औसत से छह गुना कम है. 2014 में (जो सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े हैं) अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों में से सिर्फ 3.4 फीसदी में ही आखिर में कसूर साबित हो पाया. जबकि इन्हीं अपराधों में कसूर साबित होने की राष्ट्रीय दर 28.8 फीसदी है यानी देश भर में हरेक आठ अत्याचार में एक में कसूर साबित होता है. हैरानी की बात नहीं है कि राज्य में छुआछूत का चलन धड़ल्ले से जारी है. 2007 से 2010 के दौरान गुजरात के दलितों के बीच काम करने वाले एक संगठन नवसर्जन ट्रस्ट द्वारा रॉबर्ट ई. केनेडी सेंर फॉर जस्टिस एंड ह्यूमन राइट्स के साथ मिल कर किए गए "अंडरस्टैंडिंग अनटचेबिलिटी: अ कॉम्प्रीहेन्सिव स्टडी ऑफ प्रैक्टिसेज़ एंड कन्डीशंस इन 1,589 विलेजेज़" नाम के एक अध्ययन ने ग्रामीण गुजरात में छुआछूत के चलन की व्यापक घटनाओं को उजागर किया.[3] अपने आस पास समृद्धि के समंदर में अपने अंधेरे भविष्य को देखते हुए दलितों की नई पीढ़ी इसको कबूल नहीं करेगी. यह भाजपा की मीठी-मीठी बातों के नीचे छुपाई हुई दलित-विरोधी नीतियों की वजह से जमा होता आया गुस्सा था जो राज्य में दलितों के सहज रूप से भड़क उठने की शक्ल में सामने आया.

अभागों की आह

हालिया आंदोलन दलितों के नए सिरे से उठ खड़े होने के संकेत हैं. कांग्रेस के बरअक्स भाजपा के दोमुंहेपन और निरंकुशता, आंबेडकर के लिए स्मारक बनवाने और खुद को सबसे बड़े आंबेडकर भक्त के रूप दिखाने का पाखंड एक के बाद एक इन दलित विरोधी गतिविधियों से बखूबी तार-तार हो गया है. जब अक्तूबर 2002 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के गौ रक्षा गिरोहों ने हरियाणा के झज्झर के दुलीना में पांच बेगुनाह दलित नौजवानों को पीट-पीट कर मार दिया था और फिर पुलिस की ठीक नाक के नीचे उन्हें जला दिया था तो विहिप के उपाध्यक्ष गिरिराज किशोर ने उन हत्याओं को यह कह कर जायज ठहराया था: "हमारे धार्मिक ग्रंथों (पुराणों) में गाय की जान इंसानों की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है." तब हरियाणा के भाजपा अध्यक्ष राम बिलास शर्मा ने गाय की हत्या को इंसान के कत्ल जितने जघन्य अपराध के रूप में लेने का वादा किया था. शायद दलितों ने उस घटना को इक्की-दुक्की घटना के रूप में लेते हुए भाजपा को माफ कर दिया था.

लेकिन इस बार एक के बाद एक जल्दी जल्दी होने वाली इन घटनाओं ने ऐसा दिखता है कि भाजपा के असली दलित-विरोधी चरित्र को उन पर उजागर कर दिया है. हालांकि इधर भाजपा ने हिंदू राष्ट्र के अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए दलित वोटों की बड़ी अहमियत को इधर महसूस किया है, लेकिन उन दोनों के बीच के ऐतिहासिक और विचारधारात्मक विरोधाभासों को आसानी से नहीं सुलझाया जा सकता है. दलित विरोधी भावनाएं किसी न किसी स्वामी या साध्वी की शेखी के जरिए या फिर हिंदुत्व के गुंडे-मवालियों द्वारा किए गए अत्याचारों के जरिए सामने आती रहेंगी.

चाहे इसको जैसी भी शक्ल दी जाए, हिंदुत्व का मतलब हिंदू रिवाजों, प्रथाओं और संस्कृति पर गर्व करना ही है, और ये जाति व्यवस्था का ही एक दूसरा नाम हैं और इस तरह यह दलितों की मुक्ति के एजेंडे का विरोधी है. गाय के लिए हिंदुत्व की सनक ने – जो अब गाय के पूरे परिवार तक फैल गई है – अब मुसलमानों के बाद दलितों को चोट पहुंचाई है. यह उन्हें उनके पसंदीदा बीफ (गोमांस) से वंचित करती है जो प्रोटीन का बहुत सस्ता स्रोत है और इसने उनके लाखों लोगों को बेरोजगार बना दिया है. छोटे किसानों के रूप में दलित मवेशी पालते हैं. 'गाय नीति' उनकी माली हालत पर गंभीर चोट करती है.

सबसे हैरान करने वाली बात इसके पीछे की अतार्किकता और दोमुंहापन है. आर्थिक अतार्किकता को कई अर्थशास्त्रियों ने उजागर किया है और अगर यह बनी रही तो कुछ बरसों में यह देश के लिए अकेली सबसे बड़ी तबाही बन सकती है. और दोमुंहापन ये है कि जबकि हजारों छोटे कत्लखानों में मवेशियों के कत्ल पर पाबंदी है और जिसने लाखों मुसलमान और दलित बेरोजगार बना दिया है, निर्यात के लिए छह बड़े कत्लखाने इसी समय फल-फूल रहे हैं, जिनमें से चार के मालिक हिंदू हैं और उनमें से भी दो ब्राह्मण हैं. चाहे यह गाय के कत्ल का मामला हो या इसका सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पहलू हो, ये सीधे-सीधे दलितों के हितों और उनकी उम्मीदों का विरोधी है.

हिंदुत्व के दलित-विरोधी पंजों के साथ सामने आने के साथ ही, यह तय है कि भाजपा को अगले चुनावों में इसकी आंच को महसूस करना होगा.

नोट्स
[1] http://navsarjan.org/navsarjan/status-of-dalits-in-gujarat/

[2] https://www.sabrangindia.in/tags/council-social-justice.

[3] http://navsarjan.org/Documents/Untouchability_Report_FINAL_Complete.pdf.
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Monday, August 8, 2016

আমাদের মেয়ে দীপানোভা কর্মকার দীপানোভা প্রমাণ করল,আমরাও পারি। ত্রিপুরায় তাঁদের মাতৃভাষা হারিয়ে যায়নি।বাংলা ছাড়া সবচেয়ে বেশী বাংলা ভাষার চর্চা ও সাহিত্য সৃজন ত্রিপুরা এবং অসমেই হয়।অন্যান্য রাজ্যের মত তাঁরা মাতৃভাষা কিংবা সংরক্ষণের অধিকার থেকে বন্চিত নন।পুরোদস্তুর নাগরিক তাঁরা।যে নাগরিকত্ব থেকে পশ্চিম বঙ্গেও জীবনের সর্বক্ষেত্রে বাঙালরা আজও বন্চিত। পলাশ বিশ্বাস

আমাদের মেয়ে দীপানোভা কর্মকার

দীপানোভা প্রমাণ করল,আমরাও পারি।

ত্রিপুরায় তাঁদের মাতৃভাষা হারিয়ে যায়নি।বাংলা ছাড়া সবচেয়ে বেশী বাংলা ভাষার চর্চা ও সাহিত্য সৃজন ত্রিপুরা এবং অসমেই হয়।অন্যান্য রাজ্যের মত তাঁরা মাতৃভাষা কিংবা সংরক্ষণের অধিকার থেকে বন্চিত নন।পুরোদস্তুর নাগরিক তাঁরা।যে নাগরিকত্ব থেকে পশ্চিম বঙ্গেও জীবনের সর্বক্ষেত্রে বাঙালরা আজও বন্চিত।


পলাশ বিশ্বাস

ত্রিপুরার বাঙালিরাও সারা দেশে ছড়িয়ে ছিটিয়ে থাকা কোটি কোটি বাঙালিদের মতই বাস্তুহারা,উদ্বাস্তু এবং ছিন্নমূল।কিন্তু বাংলা এবং বাংলাদেশ ছাড়া একমাত্র ত্রিপুরাতেই বাঙালিরা সংখ্যাগরিষ্ঠ।আবার বাংলাদেশ ও পশ্চিম বাংলার তুলনায় সেখানে সংখ্যাগরিষ্ঠ বাঙালিরা আমাদের মত  সারা দেশে ছড়িয়ে ছিটিয়ে থাকা কোটি কোটি বাঙালিদের মতই বাস্তুহারা,উদ্বাস্তু এবং ছিন্নমূল।


ঢাকা,ফরিদপুর, বরিশাল,যশোর,পাবনা,রাজশাহীর মানুষ যখন বাংলার সীমান্ত পেরিয়ে ভারতে এসেছেন,তখন ঢাকা কুমিল্লা সিলেট নোয়াখালি ও বাংলাদেশের অন্যান্য জেলা থেকে মানুষের ঢল সবচেয়ে বেশি ত্রিপুরায় নেমেছে।


অসমের চাইতে বেশি মানুষ ত্রিপুরায় শরণার্থী।তবে ভারতবর্ষের অন্যান্য রাজ্য এমনকি সাধের পশ্চিম বাংলার বিপরীতে ত্রিপুরায় তাঁদের শরণার্থী পরিচয় মূল ত্রিপুরী আদিবাসী জনগোষ্ঠীসমূহের সঙ্গে একাকার হয়ে গেছে এবং তাঁরা বাংলা সহ অন্যান্য রাজ্যের শরণার্থীদের মত চিন্মূল ত ননই,পুরোদস্তুর ভারতের নাগরিক।


নিজেদের ভাগ্যের নিয়ন্ত্রক,জীবনের সর্বক্ষেত্রেই তাঁরা প্রতিষ্ঠিত।

ত্রিপুরায় তাঁদের মাতৃভাষা হারিয়ে যায়নি।বাংলা ছাড়া সবচেয়ে বেশী বাংলা ভাষার চর্চা ও সাহিত্য সৃজন ত্রিপুরা এবং অসমেই হয়।অন্যান্য রাজ্যের মত তাঁরা মাতৃভাষা কিংবা সংরক্ষণের অধিকার থেকে বন্চিত নন।পুরোদস্তুর নাগরিক তাঁরা।যে নাগরিকত্ব থেকে পশ্চিম বঙ্গেও জীবনের সর্বক্ষেত্রে বাঙালরা আজও বন্চিত।


প্রয়াত কবি মন্ত্রী অনিল সরকারের সৌজন্যে এই ত্রিপুরাকে জানার সুযোগ আমার হয়েছে এবং তাঁদের আদিবাসীদের সঙ্গে ভ্রাতৃত্বের মানববন্ধন আমি চিরকালই অন্যান্য রাজ্যের বাঙালিদের সঙ্গে সেই রাজ্যের অধিবাসীদের গড়ে তোলার কাজে আজ অবধি সক্রিয়।


উদ্বাস্তুরা যেখানেই আছেন,তাঁরা স্থানীয়মানুষদের সঙ্গে সুসম্পর্ক রেখে কোনো ক্রমে বেঁচে বর্তে আছেন কিন্তু অসম কিংবা উত্তরপ্রদেশে কিংবা উত্তরাখন্ডে কিংবা দনডকারণ্যের আওতায় ওড়ীশা, মহারাষ্ট্র, অন্ধ্র,ছত্রিশগঢ়,মধ্যপ্রদেশ ব্যাতিরেক বিহার ও ঝারখন্ডে স্ংখ্যার বিচারে অনেক বেশি বাঙালি ছন্নছাড়া,বাস্তুহারা মানুষ বসবাস করলে ও তাঁরা অনেকাংশই বেনাগরিক এবং বাংলাতেও পূর্ব বঙ্গের মানুষ,তাঁদের মাতৃভাষা,তাঁদের সংস্কৃতি,তাঁদের জীবনযাত্রা,জীবিকা,পরিচিতি এবং গোটা অস্তিত্বটার বাস্তব অর্থে কোনো জমি জায়গা নেই।


বলা বাহুল্য বাংলার মাটিতে পূর্ব বঙ্গ থেকে আসা মামুষজন আজও অনাহুত, রবাহুত, অবান্ছিত,বহিরাগত।বাংলায় তাঁরা জবর দখল কলোনীতে,রিফিউজি ক্যাম্পের জায়গায় সরকারি ভসত পাচট্টায়,রেল ধারে,বিল ধারে,খাল পাড়ে পোকা মাকড়ের মত বসবাস করছেন এবং শাশক শ্রেণী তাঁদের উত্খাত করার জন্য যা যা করার 15 আগস্ট থেকে আজ অবধি প্রতিনিয়ত অবর্ণনীয় ঘৃণায়,হিংসায় ও প্রতিশোধ স্পৃহায় করে চলেছে।


বিদানরায় যেমন এদের পান্জাবের দেশভাগের বলির মত মানুষ মানেননি এবং তত্কালীন দিল্লী ও কোলকাতার শাশকেরা এদের পূর্ববাংলার না খেতে পাওয়া আকালের বুভুক্ষু মানুষদের খাদ্যও আশ্রয়ের সন্ধানে সীমান্ত পেরিয়ে আসা অনাহুত হতদরিদ্র নামানুষ মনে করে তাঁদের তাত্ক্ষণিক মানবিক সাহায্য দিয়ে ভদ্রতার খাতিরে পশ্চিম বাংলা ও ভারতের অন্যান্য রাজ্যের ট্রান্জিট ক্যাম্পে বা ভারতের বিভিন্য  রাজ্যে জলে জঙ্গলে, দ্বীপে, দ্বীপান্তরে, পাহাড়ে, চা বাগানে, কফি বাগানের কুলি করে রেখে আবার ভারতে থেকে বিতাড়িত করে পূর্ববঙ্গে পাঠানোর ব্যবস্থা করেছেন।


ডিপোর্টেশান,ডিটেনশান ও এথনিক ক্লীন্জংঃসেই সুনিয়োজিত পরিকল্পনার দরুণই পূর্ব বাংলার ভিটেহারাদের পুনর্বাসন,নাগরিকত্ব,মাতৃভাষা,সংরক্ষণের দাবিতে বাংলা কখনো সোচ্চার হয় নি।প্রণব মুখার্জি বলেছেনঃ তিনি ভারতের স্বরাষ্ট্র মন্ত্রী হলে পত্রপাঠ এই আপদ পূর্ব বাংলাতে ফেরত পাঠাতেন।


2003 সালের কালো নাগরিকত্ব সংশোধণী আইন সেই প্রতিশোধের নাম।


সংসদীয় কমিটির চেয়ারম্যান ছিলেন প্রণব মুখার্জি নিজে এবং তিনি কোনো উদ্বাস্তু সংগঠন বা নাগরিক উদ্বাস্তুর সঙ্গে দেখা প্রযন্ত করতে অস্বীকার করে এই বিলটিকে আইনে পরিবর্তিত করতে নির্ণায়ক ভূমিকা পালন করেন এবং পশ্চিম বঙ্গের সমস্ত সাংসদরা দল মত নির্বিশেষ বাঙাল খেদাও আইনের সমর্থন করেন।আরএসএস কে,কেন্দ্রকে সর্বার্থে দায়ী করার রাজনৈতিক শ্লোগানে আমরা কিন্তু এই নির্মম সত্যের মুখোমুখি হতে পারছি না।


আইনিটি প্রণয়ণ করেছিলেন লাল কৃষ্ণ আঢওযানী যিনি আরএসএশের মুখ এবং অটল জমানায় স্বরাষ্ট্র মন্ত্রী হিসাবে তিনিই আইনচি পাশ করান।


সামনের এই ছবির পিছনে কিন্তু রং বেরং বাংলার নেতাদের অবস্থান যারা আজও নিজেদের আধিপাত্যের স্বার্থে পূর্ববালার দেশভাগের বলি মানুষদের সারা বারত থেকে বিদায় জানাবার বন্দোবস্ত করে চলেছেন।


এই জন্যই গত পাঁচই আগস্ট কোলকাতায় দশ হাজার উদ্বাস্তুদের মিছিল ও সমাবেশের কোনো খবর হল না বা এর আগে এই সব মানুষদের রাজনৈতিক ভোটব্যান্ক বা আপরাধিক শিরোণাম ছাডা় কোনো খবর হয়না।


দীপানোভা কর্মকারকে মনে রাখা প্রয়োজন।অসম্ভব আত্মবিশ্বাসী,লক্ষ্যে অস্থির ত্রিপুরার এই মেয়েটি আমাদেরই মেয়ে।আমাদের মেয়ে দীপানোভা।যে ত্রিপুরার জীবন যাত্রা ,সাহিত্য সংস্কৃতি বাংলায় কোনো স্বীকডতি পায়না,সেই ত্রিপুরার মেয়ে ওলিম্পিকে ভারতের মুখ হযে যাওয়া দীপানোভা আজ খবরের শিরোনামে,কাগজে পাতা জুড়ে তাঁর ছবি।


আমাদের বন্ধু গাইড  কবি মন্ত্রী অনিল সরকার বেঁছে তাকলে যা লিখতে পারতেন ,তা লেখার ক্ষমতা আমার নেই।দীপা প্রমাণ করেছে যে দেশভাগের রপর না থেমে থাকা গণসংহার,ধর্ষণ,বিতাড়ন,অবহেলা,বন্চনা,ঘৃণা ও নাসুযোগের এই পরিবেশেও আমাদের  শিরদাঁড়া ভেঙ্গে পড়ে নি।পদক না জিতলেও,কিছু আসে যায়না।


ওলিম্পিকে প্রথম ভারতীয় জিমনাস্ট হিসাবে প্রথাম আবির্ভাবে বিশ্ব চ্যাম্পিয়ান,এলিম্পিক চ্যাম্পিয়ানদের দীর্ঘাঙ্গী শ্বেত আধিপাত্যের মুখোমুখি আমাদেরম মেয়ে দীপানোভার পা এতটুকু চলে নি।ভল্টের প্রাণসংসশয়ের বিপদকে অবহেলায় হারিয়ে আবির্ভাবেই ফাইনালে উঠে সেই আজ ভারত ও দক্ষিণ এশিযার মুখ।  দীপানোভা প্রমাণ করল,আমরাও পারি।



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নিজেদের কথা বলতে হবে,লিখতে হবে,আমাদের পোস্টশেয়ার ও লাইক করতে হবে যদি অন্ধকার থেকে মুক্তির আলোর সন্ধান চাই পলাশ বিশ্বাস


নিজেদের কথা বলতে হবে,লিখতে হবে,আমাদের পোস্টশেয়ার ও লাইক করতে হবে যদি অন্ধকার থেকে মুক্তির আলোর সন্ধান চাই

পলাশ বিশ্বাস
সবচেয়ে ভালো হয় যদি সবাই ভারত ভাগের বলি দশ কোটি মানুষের জীবন যন্ত্রণার কথা নিজেই লিখতে শুরু করেন।নিজেদের দাবি,সমস্যা ও আন্দোলনের কথা,সংগঠনের কথা নিজেই লিখুন৤দু চার লাইন লিখলেও হবে৤ভাষার বিশুদ্ধতা বা বানানের চেয়েও বেশি দামি আপনার নিজস্ব মতামত।সারা ভারত জুড়ে,ভারতের বাইরে ছিন্নমুল মানুষের জীবন যন্ত্রণার কথা কেউ লিখবে না৤আমাদেরই লিখতে হবে৤আমাদের কথা কেঊ খখনো ভাবে নি,ভাববে না।
সোশাল মীডিয়ায় আমাদের হাজারো মানুষ।একটা শেয়ার মানে একটা লিন্ক।মীডিয়ার প্রয়োজন নেই।ফেসবুকে বা অন্যত্র হাজারো মানুষ যদি আমাদের বক্তব্য পোস্ট শেয়ার করে তাহলে রোজই আমরা লাখো মানুষের কাছে পৌঁচাতে পারি,মীডিয়ায় আমাদের কথা লেখা হল কি হল না তাতে কিচ্ছু যায় আসে না৤অথচ আমাদের জন্য গুরুত্ব পূর্ণ তথ্য,আমাদের সমস্যা,দাবি,সংগঠনের কথা,আন্দোলনের খবর কিছুই দু চারজন ছাড়া শেয়ার কেউ করছেন না৤সবাই নিজের ছবি বা এলবম পোস্চ করছেন।
আমরা আমাদের কথা বলছি না।আমরা আমাদের বক্তব্যমানুষের কাছে তুলে ধরার জন্যলাইক বা শেয়ার করছি না,তাহলে কি মুড়ি মোয়ার মত আমাদের সমস্যার সমাধান তাঁরা করে দেবে,যারা এই সমস্ত সমস্যা তৈরি করে আমাদের দফা রফা করে আমাদের জন্যহাজার নরকের বন্দোবস্ত করেছেন?
ভাবুন! ভাবুন!
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मूर्तियों के तिलिस्म से रिहाई के बिना मुक्ति की कोई दिशा नहीं है। केसरिया सुनामी में विचारधारा और प्रतिबद्धता उसीतरह बहने लगी है जैसे बंगाल की रचनाधर्मिता,विचारधारा और प्रतिबद्धता की मुख्यधारा सत्ता में निष्णात हुई है। भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान रवींद्रनाथ हैं,तो यह महज संजोग नहीं है।साझा चूल्हा और साझे इतिहास की वैज्ञानिक रचनादृष्टि की वजह से रवींद्र सार्वभौम हैं।ल

मूर्तियों के तिलिस्म से रिहाई के बिना मुक्ति की कोई दिशा नहीं है।


केसरिया सुनामी में विचारधारा और प्रतिबद्धता उसीतरह बहने लगी है जैसे बंगाल की रचनाधर्मिता,विचारधारा और प्रतिबद्धता की मुख्यधारा सत्ता में निष्णात हुई है।


भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान रवींद्रनाथ हैं,तो यह महज संजोग नहीं है।साझा चूल्हा और साझे  इतिहास की वैज्ञानिक रचनादृष्टि की वजह से रवींद्र सार्वभौम हैं।लेकिन निरीश्वर वाद के बुद्धं शरणं गच्छामि के महाकवि को हमने उसी तरह मूर्ति में तब्दील कर दिया है,जैसे समता,न्याय,प्रेम,सत्य और अहिंसा के महानायक गौतम बुद्ध को हमने ईश्वर बना दिया है और आज भी हम रोज रोज मूर्तियां गढ़ रहे हैं और उन्ही मूर्तियों को विसर्जित करने का महोत्सव जी रहे हैं।


अब रचनाधर्मिता का मकसद मनुष्य की मुक्ति नहीं है,हमारी रचनाधर्मिता अब सत्ता सान्निध्य का पर्याय है जो क्रयक्षमता का सृजन है।सबसे खतरनाक बात जो है ,वह पाश बेहत साफ साफ लिख गये हैं,सबसे खतरनाक है ख्वाबों का मर जाना और हमारे माध्यमों और विधायों में किसी ख्वाब की लाश की भी अब कोई जगह नहीं है और हम सिर्फ मूर्ति बना और तोड़ रहे हैं।


मर्यादा पुरुषोत्तम की यह नियति है कि उनके नाम का जयघोष करते हुए हत्यारी फौजें गोमाता और गंगा की सौगंध खाकर दसों दिशाओं में मनुष्यता और प्रकृति को रौंद रही हैं।


गांधी की नियति मूर्ति बनने की रही हैं तो उनकी वे मूर्तियां टूटनी ही थी। उन्हीं के हत्यारों की मूर्तियां अब प्रचलन में हैं।

अब अंबेडकर की बारी है।


न जाने किस किसकी बारी है।



पलाश विश्वास

कल भारत और बांग्लादेश में चंद्रमा के हिसाब से जो बांग्ला कैलेंडर अब भी प्रचलित है,उसके मुताबिक श्रावण महीने की बाइस तारीख थी,जो बंगाल में रवींद्रनाथ की पुण्यतिथि की वजह से बाइसे श्रावण पर्व में तब्दील है।बाइसे श्रावण मृणाल सेन निर्देशित बहुचर्चित फिल्म भी है।


दुनियाभर में जहां भी बांग्लाभाषी जनता है,शरणार्थी,प्रवासी,भद्रजन और बहुजन,अछूत,उन सबने फिर रवींद्रनाथ को फिर याद किया।भारत तीर्थ में सभी नस्लों राष्ट्रीयताओं के विलय के इतिहासबोध पर भारतीय राष्ट्रीयता के जनक अगर कोई हैं तो वंदेमातरम के हिंदुत्व के ऋषि बंकिम नहीं,रवींद्रनाथ हैं।


बाकी भारत में भी उनकी प्रासंगिकता बहुलता विविधता और धम्म पंचशील आधारित विश्वबंधुत्व के समता और न्याय केंद्रित बाउल फकीर संत परंपरा की उनकी कविता दृष्टि की वजह से आज विघटनकारी हत्यारी धर्मोन्मादी अंध राष्ट्रीयता के मुक्तबाजार के प्रतिरोध में सबसे अहम है।


आज सुबह बांग्ला के सबसे लोकप्रिय अखबार आनंदबाजार पत्रिका में महाश्वेता देवी की बहन  सोमा मुखोपाध्याय का बयान पढ़ने के बाद मन भारी हो गया है।


महाश्वेता दी की स्मृति में 28 जुलाई को गोल्फ ग्रीन के उदय सदन में उनके परिजनों ने एक शोकसभा का आयोजन किया जिसमें राज्य सरकार के तमाम मंत्री, सिने कलाकार और सत्तादल के नेता तो उपस्थित हुए लेकिन एक भी लेखक हाजिर न था।


सोमा की शिकायत है कि महाश्वेता दी की अस्वस्थता,उनकी मृत्यु और उनकी अंत्येष्टि के वक्त भी कोई लेखक कवि उनके साथ नहीं था।हम तो अपराद बोध में जी रहे थे कि परिवर्तन के बाद उनसे सारा संपर्क सूत्र टूट गया और इसी वजह से नवारुण दा के साथ भी छूट गया।


फिरभी नवारुण दा के अंतिम समय में उनके सारे साथी और लेखक कलाकार लोग हाजिर थे क्योंकि वहां सत्ता का कोई हतस्तक्षेप नहीं था।


महाश्वेता दी की चिकित्सा और अंत्येष्टि राजकीय हो गयी तो अब उनकी स्मृति भी राजकीय है,जिसमें आम जनता,उनके साथियों और लेखक कलाकारों की कोई भागेदारी नहीं है।


गनीमत है कि महाश्वेता दी सिर्फ बंगाली लेखिका नहीं रही हैं और भारत और भारत भर की उत्पीड़ित वंचित शोषित जनता की मुक्ति की लड़ाई उनकी कथा,व्यथा और प्रतिबद्धता है।गनीमत है कि सत्ता उनके इस अखिल भारतीय कृतित्व व्यकित्व को निगल नहीं सकी।


सोमा जी ने एक और गंभीर शिकायत की है उनके बारे में,जिन्होंने महाश्वेता दी को सीढ़ी बनाकर कामयाबी और हैसियत हासिल की,वे लोग आखिरकार उनके साथ नहीं थे और उन्हीं की वजह से जो उनके संघर्ष में दशकों से उनके साथी रहे हैं,उनका साथ छूट गया और उन्होंने कामयाबी और हैसियत मिलते ही दीदी का साथ छोड़ दिया।हिंदी में भी ऐसे विचित्र किस्म के लोग हैं,जिनका नाम बताये बिना उनकी पहचान साफ है और इनमें से कई ने तो दीदी से अंतरंगता के लिए हम जैसे नाचीज की मित्रता का दोहन किया और अब वे हमें तो क्या खाख पहचानेंगे,वे मठाधीस बनने के बाद महाश्वेता दीदी का नाम भी नहीं लेते।


साहित्य में गिरोहबंदी और मौकापरस्ती का यह अद्भुत परिदृश्य है।महाश्वेता दी अपनी प्रखर प्रतिबद्धता के बावजूद इस दुश्चक्र से बच नहीं सकीं और अंततः अकेली रह गयी,इतनी अकेली कि हम भी चाहकर उनके साथ खड़े होने की हालत में नहीं थे क्योंकि उनतक पहुंचने से पहले सत्ता से तार बांधने की जरुरत आन पड़ी और किसी को अंतिम प्रणाम करने का भी मौका नहीं मिला चाकचौबंद राजकीय बाडा़बंदी की वजह से।नामदेव धसाल का हश्र हम जानते हैं और शैलेश मटियानी का हश्र भी ।


पुराना वह दर्द फिर समुंदर बनकर दिलोदिमाग को लहूलुहान करने लगा है।


हम गोरख पांडेय की आत्महत्या और पाश की हत्या देखने के बाद यह नरक जीने को जिंदा हैं।बेहदबे।शर्म बन चुके हैं हम और बहुत मुशकिल है इस वेवफा फिजां में हरजाई जमाने में किसी से वफा की उम्मीद भी।


सतह के नीचे से उठकर एकदम जमीन की भीतरी परतों से जिनकी रचनाधर्मिता आम लोगों के हक हकूक की आग बनने ही लगी थी कि वे इसी दुश्चक्र के शिकार हो गये।हम उस आग की विरासत से क्रमशः बेदखल होने लगे हैं और आजाद देश के हम गुलामों की गुलामी की कोई इंतंहा उसीतरह नहीं है जैसे जुल्मोसितम की कोई इंतहा नहीं है और बिकने लगी है सरफरोशी की तमन्ना भी।हर महान छवि के साथ सेल पर बिकाउ होने का टैग लग गया है।आगे पीछे सारी महानताए बाजार में बिकने लगी हैं और हम भी बिकाऊ हैं।ब्लैंकचेक के साथ खरीददार बाजार में उपयोगी माल खरीदने को कारबद्ध कतारबद्ध हैं,हवा हवाई उड़ान पर हैं विचारधाराएं,प्रतिबद्धताएं और अब कौन नहीं बिकेगा,कहना मुश्किल है।


अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रतिबद्ध लोगों के साथ जब ऐसा हादसा होता है तो उनकी मजबूरी किसी शैलेश मटियानी की मजबूरी होती है,ऐसा भी नहीं है।केसरिया सुनामी में विचारधारा और प्रतिबद्धता उसीतरह बहने लगी हैं जैसे बंगाल की रचनाधर्मिता,विचारधारा और प्रतिबद्धता की मुख्यधारा सत्ता में निष्णात हुई हैं।नदियां सारी की सारी भले बंध गयी है लेकिन विचारधारा अबाध पूंजी प्रवाह की तरह अब प्रवाहमान हैं।


प्रेमचंद और मुक्तिबोध से लेकर नवारुण भट्टाचार्य सिर्फ रचनाधर्मिता में ही प्रासंगिक नहीं हैं,उऩकी सामाजिक सक्रियता कभी सत्तावर्ग के हितों से नत्थी होकर जनविरोधी नहीं हुई है,जैसा कि हम आज बड़े पैमाने पर होते देख रहे हैं।प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष संस्कृतिकर्म के एक के बाद एक स्तंभ जिस बेशर्मी से धर्मोन्मादी राष्ट्रवादी के झंडेवरदार बनते जा रहे हैं विचारधारा और प्रतिबद्धता को तिलांजलि देकर,उनके लिए महाश्वेता देवी,नामदेव धसाल और शैलेश मटियानी जैसे हमारे जिगर और वजूद के हिस्से की नियति नियत है,जो अपरिहार्य है।


इससे बड़ी बात यह है कि भारत में लोकभाषा और बोलियों में जो साहित्य रचा गया है,वास्तव में सामाजिक यथार्थ और बदलाव और प्रतिरोध की जीवनदृष्टि के नजरिये से देखा जाये तो आधुनिक भाषाओं के क्रांतिकारी उत्सवधर्मी साहित्यके मुकाबले आज भी वह भारतीय आत्मा के अंतःस्थल,हजारों पीढ़ियों की अक्लांत मुक्ति संघर्ष,सामंतवाद और साम्राज्यवाद के प्रतिरोध,इतिहासबोध और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ साथ साझे चूल्हे की तपिश,विविधता और बहुलता का सही और वास्तविक प्रतिनिधित्व करती है।


कबीर दास,सूरदास,तुलसीदास,गुरु नानक,दादु,लालन फकीर,सूरदास,रसखान,मीराबाई जैसे हजारों पुरखों ने सत्ता से बाकायदा मुठभेड़ अपनी खालिस रचनाधर्मिता के बूते की है और असल भारतीय राष्ट्रीयता का मुख्य स्वर उसी लोक साहित्य में हैं,लोकभाषा में है,बोलियों में है,बनावटी आधुनिक भाषा,विशुध वर्तनी व्याकरण सौंदर्यबोध और आयातित आंदोलन के साहित्य में वह धारा कहीं नहीं है।हम उस विरासत से जड़े नहीं हैं।इसीलिए मातृभाषा की मृत्यु अनिवार्य है और लोक और बोलियों की महामारी है।विज्ञापन भाषा है।


रवींद्र साहित्य उसी धारा में रचा बसा है।भानुसिंह की पदावली में रवींद्र ने भक्त कवियों के स्थाई भाव और जीवन दृष्टि,भाषा शैली छंद का अनूठा प्रयोग किया तो गीतांजलि हिंदुत्व के वैदिकी आध्यात्म के बजाय गौतम बुद्ध के धम्म और चार्वाक दर्शन में रमे भारतीय संत फकीर बाउल की धर्मनिरपेक्षता, विविधता, बहुलता, सहिष्णुता, भ्रातृत्व, प्रेम,सत्य,अहिंसा और निरीश्वरवाद का गीत संकलन है जिसका स्वर वैदिकी नहीं,विशुद्ध लोक संसार है।


इसे समझे बिना हम चंडालिका,विसर्जन,रक्तकबरी,चित्रांगदा के कवि और गीतकार संगीतकार चित्रकार ब्रह्मसमाजी अछूत म्लेच्छ रवींद्रनाथ का मर्म समझ नहीं सकते।


भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान रवींद्रनाथ हैं,तो यह महज संजोग नहीं है।साझा चूल्हा और साझे  इतिहास की वैज्ञानिक रचनादृष्टि की वजह से रवींद्र सार्वभौम हैं।लेकिन निरीश्वर वाद के बुद्धं शरणं गच्छामि के महाकवि को हमने उसीतरह मूर्ति में तब्दील कर दिया है,जैसे समता,न्याय,प्रेम,सत्य और अहिंसा के महानायक गौतम बुद्ध को हमने ईश्वर बना दिया है और आज भी हम रोज रोज मूर्तियां गढ़ रहे हैं और उन्ही मूर्तियों को विसर्जित करने का महोत्सव जी रहे हैं।


आजादी के बाद हम पिछले दशकों में गांधी की मूर्ति गढ़ते रहे हैं।आज हम उस गांधी मूर्ति को खंडित करने की सुनामी की पैदल फौजे हैं और देश के चप्पे चप्पे में हम गांधी के हत्यारों की मूर्तियां गढ़ रहे हैं।


यही नहीं,न्याय और समता का आंदोलन कर हे लोग इतनी हड़बड़ी में हैं कि वे जीते जी अपनी मूर्तियां गढ़ने से बाज नहीं आ रहे हैं।


तैतीस करोड़ देव देवी कम पड़ गये तो हम अवतारों की मूर्तियां बनाने लगे और आजादी के बाद हम महामानवों और महामानवियों की मूर्ति गढ़ने लगे हैं।


मूर्ति पूजा की इस भास्कर्य और विसर्जन और उन्हीं मूर्तियों के उपासना स्थलों के कर्मकांड तक सीमाबद्ध रह गया है हमारा जीवन,धर्म,समाज,राजनीति और बाजार भी।


मूर्तिपूजा का सबसे आधुनिक कर्मकर्म कांड ब्रांडिंग है,जिसपर समूचा मुक्तबाजार का तिलिस्म है।


हम इन मूर्तियों के तंत्र मंत्र यंत्र में ऐसे कैद हैं कि इस तिलिस्म का आधार,राजकाज कटकटेला अंधकार अमावस्या है,जिसकी कोई सुबह होती नहीं है और इस तिलिस्म से मुक्ति है नहीं।


विज्ञान और तकनीक ने हमारी क्रयक्षमता का क्रांतिकारी विकास किया है और हमने भोग के सारे साधन मनुष्यता और प्रकृति की कीमत पर युद्ध,गृहयुद्ध दंगा फसाद हिेंसा,घृणा,जाति वर्ण वर्चस्व रंगभेद के माध्यमों और विधाओं से हासिल कर लिया है।


अब रचनाधर्मिता का मकसद मनुष्य की मुक्ति नहीं है,हमारी रचनाधर्मिता अब सत्ता सान्निध्य का पर्याय है तो क्रयक्षमता का सृजन है।सबसे खतरनाक बात जो है ,वह पाश बेहत साफ साफ लिख गये हैं,सबसे खतरनाक है ख्वाबो का मर जाना और हमारे माध्यमों और विधायों में किसी ख्वाब की लााश के लिए भी कोई जगह नहीं है और हम सिर्फ मूर्ति बना और तोड़ रहे हैं।खुद अपनी मूर्ति बनाने की फिराक में।आत्मध्वंस का महोत्सव है।


मर्यादा पुरुषोत्तम की यह नियति है कि उनके नाम का जयघोष करते हुए हत्यारी फौजें गोमाता और गंगा की सौगंध खाकर दसों दिशाओं में मनुष्यता और प्रकृति को रौंद रही हैं।


गांधी की नियति मूर्ति बनेन की रही हैं तो उनकी वे मूर्तियां टूटनी ही थी।

अब अंबेडकर की बारी है।


न जाने किस किसकी बारी है।


महानता की यह नियति है तो हम भयानक तम दुःस्वप्न में भी महान बनने से परहेज करना चाहेंगे ताकि कोई हमारी मूर्ति कभी बनाने की सोचे भी नहीं और न हमारी मर्तियां तोड़ने की कभी नौबत आये।


वैदिकी साहित्य में आस्था प्रकृति का सान्निध्य के उत्कर्ष में रही है और मोक्ष पंचतत्व में विलीन हो जाने के बाद जीवनचक्र से प्रकृति के अनंत में समाहित होना रहा है।उपासना भी प्राकृतिक शक्तियों की रही है।


देवमंडल का सृजन हमने अपने अपने हितों के लिए,संसाधनों पर दखल के लिए किया है और हम लोग बुनियादी तौर पर सामंत हैं,जो बन सके हैं वे सत्ता में हैं और जो नहीं बन सकें,वे उस हैसियत को हासिल करने के लिए अपनी सुविधा के मुताबिक रोज रोज नये नये देव,नई नई देवियां,नये नये अवतार और ब्रांड बना रहे हैं।


ओलंपिक में दीपा कर्मकार की उपलब्धि के समाने सच यही है कि अब भी हम मदारी,सांप और जादूगरों का देश हैं।


विज्ञान और तकनीक,क्रयक्षमता और बाजार के विकास में हम लगातार मध्ययुग की गहराई में पैठते जा रहे हैं।यही राजधर्म राजकाज राजकरण धर्मोन्मादी जिहादी फासीवाद है,जिस हम महिमामंडित कर रहे हैं।

महिमामंडन की यह निरंतरता माध्यमों और विधाओं का बाजार जो है, सो है वही अब संस्कृतिकर्म है।


मूर्तियों के तिलिस्म से रिहाई के बिना मुक्ति की कोई दिशा नहीं है।



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