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Saturday, August 13, 2016

पेनफुल साइट्स! बंगाल भुखमरी के दौरान अपने गांव में भूखों की कोई मदद किये बिना श्यामाप्रसाद ने भव्य वल्गर बागान बाड़ी कैसे बनाया जिसे देखकर घिन आ रही थी? हिंदू महासभा का भुखमरी रिलीफ वर्क का गिरोहबंद ढकोसला उतना ही फर्जीवाड़ा था,जितना मुनाफावसूली के लिए श्यामाप्रसाध का हाट या आशुतोष मैंसन की डिस्पेंसरी। मशहूर चित्रकार चित्तोप्रसाद की भूखमरी पर रपट में खुलासा


पेनफुल साइट्स!

बंगाल भुखमरी के दौरान अपने गांव में भूखों की कोई मदद किये बिना श्यामाप्रसाद ने भव्य वल्गर बागान बाड़ी कैसे बनाया जिसे देखकर घिन आ रही थी?

हिंदू महासभा  का भुखमरी  रिलीफ वर्क का गिरोहबंद ढकोसला उतना ही फर्जीवाड़ा था,जितना मुनाफावसूली के लिए श्यामाप्रसाध का हाट या आशुतोष मैंसन की डिस्पेंसरी।

मशहूर चित्रकार चित्तोप्रसाद की भूखमरी पर रपट में खुलासा

अनुवादः पलाश विश्वास

(हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल के सवर्ण जमींदारों के हितों के मुताबिक बंगाल विभाजन पर अड़े थे और इस मकसद को उनने भारत विभाजन के जरिये अंजाम तक पहुंचाया। जबकि कविगुरु के शांति निकेतन में चित्रकला विभाग के नंदलाल बसु ने जिन चित्तप्रसाद को वहां दाखिला देने से इंकार कर दिया, वही चित्तप्रसाद  लीनाकोट माध्यम के न सिर्फ भारत के श्रेष्ठ चित्रकारों में हैंं,सोमनाथ होड़ की तरह चित्रकला के माध्यम से उनने बंगाल भुखमरी की जिंदा रिपोर्टिंग की और तेभागा आंदोलन को बेहतर जानने का माध्यम भी चित्तप्रसाद हैं।कला जगत में जनपक्षधर प्रतिबद्धता मेंं वे बेमिसाल हैं।इन दिनों भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी का भयंकर महिमामंडन करके  गांधी हत्या को अंजाम तक पहुंचाने की बजरंगी बिरादरी की मुहिम बहुत तेज है।चित्तप्रसाद ने चित्रकला के अलावा समसामयिक ज्वलंत मुद्दों पर चिट्ठियां भी लिखी हैं।उनकी ये तमाम चिट्ठियां समय के  प्रकाशित दस्तावेज हैं।1943-44 के दौरान चित्तप्रसाद ने बंगाल भुखमरी पर अनेक सचित्र आलेख कम्युनिस्ट पार्टी के समाचार पत्र पीपुल्स वार में लिखे।इनमें से एक आलेख श्यामाप्रसाद मुखर्जी के गांव जिराट को लेकर भी है।उस वक्त गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर रही हिंदू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुत बड़े नेता थे।इस आलेख के कुछ अंश दि वायर ने फिर प्रकाशित किये हैं।इस आलेख में हिंदू राष्ट्र भारत के बारे में श्यामाप्रसाद मुखर्जी की दृष्टि का खुलासा है।हुगली जिले के श्यामाप्रसाद के गांव जाकर बंगाल की भुखमरी की पृष्ठभूमि में श्यामाप्रसाद के कृतित्व व्यक्तित्व पर लिखा यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।चित्तप्रसाद अगस्त ,1944 में श्यामाप्रसाद के गांव जिराट गये थे तो वहां बलागढ़ इलाके के तमाम आम लोगों के नजरिये से भुखमरी के दौरान श्यामाप्रसाद के बनाये बागान बाड़ी और उनके नये हाट के ब्यौरे पेश करके उनने श्यामाप्रसाद की असल तस्वीर पेश की है।)


महज दो साल में पूरे भारत में किसी बंगाली सज्जन ने राष्ट्रीय ओहदा हासिल करने में कामयाब हुआ हो,तो वे इकलौते डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हैं।ऐसा क्यों न हो?वे आधुनिक बंगाल के निर्माताओं में से अन्यतम सर आशुतोष मुखर्जी के सुपुत्र हैं जिन सर आशुतोष ने ब्रिटिश सरकार से लड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय को संस्कृति और ज्ञान का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बना दिया।1943 में गवर्नर एमरी के कुशासन के खिलाफ पदत्याग करके श्यामा प्रसाद मुखर्जी रातोंरात राष्ट्रीय नेता बन गये।जाहिर है कि बंगाल की भुखमरी के विभीषिकामय दिनों में बंगाल के गवर्नर के खिलाफ वे ही सबसे सशक्त कंठस्वर थे पूरे देश में।इन्हीं डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बंगाल रिलीफ फंड में देश के चारों हिस्सों से लाखों रुपये की आमद हुई।असल मसला यही है कि बंगाल को बचाने के लिए जो लाखों रुपये देश की जनता ने देश के हर हिस्से से ऐसे राष्ट्रीय नेतृत्व के हवाले कर दिये तो उनने भुखमरी का  अमावस जी रहे अपने खुद के गांव में एक भी दिया इन रुपयों से जलाया क्या उन्होंने।देश के लोगों को शायद इस बारे में जानने में दिलचस्पी होनी चाहिए।


यही जानने और इसी मकसद से बंगाल का एक मामूली कलाकार मैं सर आशुतोष और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गांव हुगली जिले के जिराट की तीर्थयात्रा पर निकला।बहरहाल जून महीना शुरु होते न होते एकदिन मैं ट्रेन पकड़कर कलकत्ता से चालीस किमी दूर खरनारगाछी पहुंचा और फिर वहां से पैदल कुछ ही किमी दूर जिराट पहुंच गया।रास्ते में मैं  बलागढ़ इलाके के  छह सात गांवों से गुजर गया।इस दरम्यान अपनी आंखों से जो कुछ मैंने देखा वह अत्यंत भयानक था।हुआ यह कि सालभर उस इलाके की भयंकर नदी बेहुला में बाढ़ें आती रहीं।इस नदी से यह इलाका दो हिस्सों में बंटा हुआ था।बाढ़ की वजह से दोनों किनारों पर बसे तमाम गांव उपजाऊ कीचड़ में दब गये।देहाती लोगं की तमाम झोपड़ियां न सिर्फ बाढ़ के पानी में समा गयीं बल्कि तूफां में कुछ उड़ भी गये।बंगाल के गांवों में धान को जमा करने वाले देसी गोदाम तमाम धान गोला खत्म हो गये हर गांव में।बलागढ़ इलाके के सात गांव लगातार बारह दिनों तक पानी के नीचे जलसमाधि में थे और करीब सात हजार देहाती विस्थापित थे।यह हादसा पिछले साल हुआ था।कायदे से नदी की तलहटी की उपजाऊ कीचड़ से खेतों को इस साल सोना उगलाना चाहिए था।उपजाऊ और समृद्ध माटी से उपजे धान से इस इलाके को किसी बगीचे की तरह लहलहाना चाहिए था।ऐसा हुआ क्या? क्या पिछले साल का अभिशाप इस साल किसानों के लिए वरदान बना?ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।दरअसल किसानों को खेत जोतने तक का मौका नहीं मिला।बेहुला की बाढ़ के कहर के तुरंत बाद पूरा बंगाल भुखमरी के शिकंजे में था और चूंकि उनकी धान की फसल बाढ़ से तहस नहस हो चुकी थी तो बलागढ़ इलाके के किसानों को भी दूसरे इलाके के लोगों की तरह बाहर से आने वाले चावल मंहगे दरों पर खरीदना पड़ा और नये सिरे से घर बनाने के लिए जो सरकार की तरफ से दस रुपये का लोन उन्हें मिला,उसे उन्हें इसी मद में खर्च कर देना पड़ा।जब वे दस रुपये भी खर्च हो गये तो खाने के लिए चावल खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे,बीज के लिए वे धान कैसे खरीदते और बीज भी न हो तो वे खेत कैसे जोत लेते।नई फसल की उम्मीद भी नहीं रही।


गरीब देहाती आम खाकर जी रहे थे

इसलिए पूरे इलाके में मैंने मुस्कुराते हुए लहलहाते धान के खेत नहीं देखे।इसके बदले जमीन बंजर पड़ी थी।कड़ी धूप में पकती हुई जमीन ऊपर नीचे फट रही थी।दरारें दीख रही थीं।जिसमें कहीं कहीं घास और खर पतवार उगे हुए थे।बेहतर हालत में जो इ्क्के दुक्के किसान थे,उनने अपने अपने खेत में जूट लगा रखे थे। लेकिन वे भी इतने बदकिस्मत निकले कि  इस साल मानसून इतना लेटलतीफ रहा कि खड़े खड़े खेत में ही जूट सूख गया।किसानों ने मुझे सिलसिलेवार बताया कि कलकत्ता के बाजार के लिए उगाये जाने वाले आलू,प्याज और पूरी रबि की पसल कैसे तबाह हो गयी लेट मानसून की वजह से।गनीमत यह थी कि इलाके में आम के पेड़ सारे के सारे पुराने और लंबे थे।बाढ़ उनका कुछ बिगाड़ न सकी।इसी वजह से एक चौथाई बलागढ़ की किसान आबादी आम और आम की गुठलियां खाकर गुजर बसर कर रही थी।जाहिर है कि आम एक फल है जिसे खाया तो जा सकता है लेकिन खालिस आम खाकर जीना मुश्किल होता है।नतीजतन जैसा हमने देखा कि इलाके में बड़े पैमाने पर हैजा फैला हुआ था।मलेरिया का प्रकोप अलग था।ऊपर से चेचक।महामारियों से भूखे किसान जूझ रहे थे इसीतरह।मसलन राजापुर गांव के  52 परिवारों में से सिर्फ छह परिवार बचे थे और वे भी मलेरिया से बीमार और उनके पास न खाने के लिए अनाज था और न पहनने के कपड़े थे।यह किस्सा हर उस गांव का था ,जहां जहां से होकर मैं गुजरा।मैंने उन देहातियों से पूछा कि उसी इलाके के महान नेता डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनकी मदद के लिए क्या किया।मैंने बांएं दाएं सबसे यही सवाल पूछा लेकिन उस पूरे इलाके में एक भी शख्स ऐसा नहीं मिला ,जिसने उनके बारे में कुछ अच्छा कहा।


इसके बदले मुखर्जी के इलाके के  उन देहातियों ने मुझसे सिलसिलेवार कहा कि कैसे गांव में सरकारी लंगरखाना खुला, जहां चार सौ लोगों को खाना देने का इंतजाम था।रोजाना यह लंगर खाना दो महीने तक चालू रहा।उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने उन्हें हर परिवार के हिसाब से पंद्रह आना दिये और गांव के हर व्यक्ति को चुवड़ा खाने के लिए दिये। इसके अलावा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने हर आदमी को चौदह पैसे,हर औरत को दस पैसे और हर बच्चे को पांच पैसे दिये। किसानों ने उसी गांव में स्टुडेंट्स फेडरेशन और मुस्लिम स्टुडेंट लीग की मदद के बारे में भी बताया जिन्होंने बाढ़ के तुरंत बाद गांव वालों को कपड़े बांटे।बारह मन बीज दिये।काफी सब्जियां बांटीं और इसके अलावा हर परिवार को पांच पांच रुपये दिये।उन्होंने बताया कि कम्युनिस्ट पार्टी ने भी हर व्यक्ति के हिसाब से एक पाव चावल और एक पांव आटा दिये।डुमुरदह उत्तम आश्रम ने हर परिवार को दो रुपये का अनुदान दिया और कंट्रोल रेट पर हर परिवार को तीन महीने तक आटा दिया।संक्षेप में हर किसी ने संकट की उस घड़ी में उन बेसहारा किसानों की मदद करने की कोशिश की।लेकिन जिले के सबसे बड़े आदमी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सबसे शक्तिशाली संगठन हिंदू महासभा ने उनकी किसी किस्म की कोई मदद नहीं की।मैंने श्रीकांति गांव में उनके मातबर किस्म के एक व्यक्ति से सीधे पूछा कि उनकी क्या मदद की है बेंगल रिलीफ कमिटी ने।लेकिन उनने न किसी बेंगल रिलीफ कमिटी के बारे में सुना था और न किसी श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में।लेकिन सर आशुतोष का नाम बताते ही यह सवाल वे समझ गये।उन्होंने फिर साफ साफ कह दिया कि नहीं,उनसे कुछ भी नहीं मिला।यह जवाब सुनने काे बाद जिराट तक पहुंचने से पहले मैंने किसी से फिर श्यामाप्रसाद की चर्चा नहीं की।


जैसे जैसे मैं जिराट के नजदीक पहुंचता गया,मुझे जिराट के आसपास के गांवों के इन देहातियों पर टूटते मुसीबत के पहाड़ का नजारा देखने को मिला।एक वाक्य में कहें तो मैंने देखा कि नैसर्गिक नेता ने जब इन देहातियों को मंझधार में बेसहारा छोड़दियातो उनकी हालत कितनी दयनीय थी और वे जिंदा रहने के लिए क्या कर रहे थे।श्यामा प्रसाद उनकी कोई मदद नहीं कर रहे थे और पूरे इलाके में किसी का कद इतना बड़ा नहीं था जो उनकी मदद कर पाता।इसपर तुर्रा यह कि तमाम आवारा और चोर आजाद थे कि जो भी कुछ मदद इन मरते हुए लोगों को बाहर से  भोजन,कपड़ा,दवा, और दूसरी छिटपुट शक्ल में मिल रही थी,उसे भी वे ले उड़े।मसलन श्रीकांति गांव में हर कोई एक शख्स का नाम ले रहा था जो सही मायनों में  उनका गला रेंत रहा था और वह डिस्ट्रिक्ट बोर्ट की रिलीफ एक्टिविटी से जुड़ा था।(मैं उस शख्स का नामोल्लेख करना नहीं चाहता।)उसने अपने अमचों चमचों के डेढ़ सेर प्रति सप्ताह की दर से चावल खैरात में बांट दिये।फिर जब कदमडांगा गांव के किसान उसके पास मदद मांगने गये,उसने खुल्ला ऐलान कर दिया कि वह किसी की मदद किसी कीमत पर नहीं कर सकता।कहा,मैं किसी को किसी  कीमत चावल बांट नहीं सकता,तुम सबको मालूम होना चाहिए।फिर उसने साफ साफ उनसे पेशकश की कि किसान उसके खेतमें बेगार खटे तो कंट्रोल रेट में वह चावल भी दे देगा।पूरे गांव ने इसके खिलाफ एकसाथ आवाज उठायी,फिरभी डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने उसी शख्स को कपड़े के 15 लट्ठे सौंपे ताकि वह यह कपड़ा किश्त दर किश्त 83 परिवारों को बांट दें।उसने फिर वही पुराना खेल चालू कर दिया और जो भी कपड़ा मांगने आया,उसे बैरंग वापस भेज दिया।फिर अपनों को वह सारा कपड़ा कैरात में बांट दिये।


एक ही परिवार उन सबका बास बना हुआ था

ऐसी तकलीफदेह आवाजें मेरे कानों में लगातार गूंजती रहीं और आखिरकार मै श्यामा प्रसाद के अपने  गांव में दाखिल हो गया और सीधे सर आशुतोष के प्राचीन मैंसन में दाखिल हो गया।आशुतोष के किसी दूर के रिश्तेदार,किसी गोस्वामी ने इस पुराने भवन का नाम आशुतोष मेमोरियल रखा था।लेकिन मेरा सामना एक जराजीर्ण,गमशुदा,टूटता हुआ भग्नप्राय रायल बेंगल टाइगर का स्मारक से हुआ।( सर आशुतोष का यही लोकप्रिय नाम है रायल बेंगल टाइगर)।वे बहुत बड़े कद के इंसान थे और जिन्होंने आधुनिक बंगाल का निर्माण किया।जिन्होंने इस भवन की परिकल्पना तैयार की और उसे साकार करके भी दिखाया।मैंने एक रेखाचित्र तैयार किया है जिसे देखकर आपको अंदाजा होगा कि कितना राजकीय भवन यह रहा होगा।इसके तमाम शानदार क्लासिक मजबूत स्तंभ भरभराकर गिरने लगे थे।टैरेस का आधा हिस्सा ढह चुका था और दीवारों से ईंटें निकल रही थीं। खंडहर में तब्दील हो रही उस इमारत की दीवारों,खिड़कियों पर काईं जमने लगी थीं।दरारों में जंगली पौधे जहां तहां उग आये थे,जिसके नतीजतन ऊपर से नीचे तक  तमाम खंभे तहस नहस हो रहे थे।


सर आशुतोष के बेटों ने इस भवन को उन लोगों के हवाले छोड़ रखा था जो आशुतोष स्मृति मंदिर या आशुतोश चैरिटेबिल डिस्पेन्सरी जैसा कुछ खोलकर उनके पिता की स्मृति की पवित्रता सहेजे हुए थे।उस डिस्पेंसरी के डाक्टर इंचार्ज ने कड़ुवा सा मुंह बनाकर मुझसे कहा कि रोज सुबह वे इस डिस्पेंसरी को तीन घंटे के लिए खुला रखते हैं और तीस चालीस मरीजों का इलाज रोज करते हैं।मैं लगातार दो रोज सुबह वहां गया लेकिन डिस्पेंसरी एक घंटे से ज्यादा खुला नहीं देखा और तीस चालीस मरीज भी मैंने नहीं देखे।दस या बारह से ज्यादा मरीज वहां आ नहीं रहे थे जबकि आस पड़स में सैकडो़ं लोग मलेरिया से बिस्तर पर थे।यह मेरे लिए अकथनीय दुःख सा है और वहां का पूरा माहौल मुझे रहस्यजनक लगा।


पैतृक विरासत काफी नहीं

हुआ यह कि जब बाढ़ से बलागढ़ इलाका में हर मकान ढहने लगा तो सर आशुतोष के बेटों ने एक ब्रांड निउ मैंसन बनाने के बारे में निश्चय कर लिया।जाहिर है कि ओल्ड आशुतोष मैंसन उनके किसी काम का नहीं था।बहरहाल मैं यह समझ नहीं सका कि बंगाल में भुखमरी के इस कहर के बीच श्यामा प्रसाद ने नया भव्य मेंसन बनाने की क्यों सोची जबकि अपने पिता के पुराना भव्य भवन देख रेख के बिना भरभराकर ढहने लगा था।मीलों तक तमाम दूसरे मकान भी ढह रहे थे।फिरभी मैंने उस घृणा करने लायक,वल्गर नया बागान बाड़ी देखने के लिए गया ।पूरे बलागढ़ में भुखमरी के दौर में सालभर में इकलौता वह नया मकान बना था।फिर वह इकलौता मकान था जिसमें दो दो धान गोला (देशी गोदाम) धान से भरे थे।बहरहाल इस नये मकान में भव्य कीमती फर्नीचर से लदे फंदे बैठक घर तो थे ही,मुख्यगेट के दोनों तरफ गेस्टहाउस भी अलग से थे।इस्पात का सिंहद्वार था तो खिड़कियों पर भी सींखचे मजबूत थे ताकि बलागढ़ के उस सबसे समृद्ध धनी बागानबाड़ी की सुरक्षा में कोई कसर बाकी न रह जाये।फिर उस बागान बाड़ी में शानदार तरीके से रचे हुए बगीचे में एक ग्रीन हाउस भी था।

वह पूरी जगह रेगिस्तान के बीच मरुद्यान की तरह लग रहा था।छुट्टियों के दिनों में मुखर्जी परिवार के लोग सबांधव पिकनिक मनाने वहां मोटर गाड़ी से कोलकाता से लैंड करते रहते थे।गंगा में तैराकी का आनंद लेते थे।फिर बिना स्थानीय जनता से मिले जुले मोटरगाड़ी में सवार कलकत्ता चल देते थे। सर आशुतोष के बेटों की बनायी यह वल्गर बागानबाड़ी टुकड़ों में बिखर रहे भव्य राजकीय सर आशुतोश के प्राचीन भवन के लिए अपमान के सिवाय कुछ नहीं लग रही थी।यहीं नहीं ,वहां लबालब उमड़ती समृद्धि आसपास मरते खपते भूखे हजारों इंसानों के हुजूम के लिए भी अपमानजनक थी।भीतर से उमड़ रही घिन की वजह से मैं उस घृण्य बादानबाड़ी से भाग निकला,लेकिन फिर भी इस किस्से का अंत कहीं नहीं था।


उस वक्त बलागढ़ के गांवो में खास चर्चा का मुद्दा भुखमरी के दौरान बागानबाड़ी दो दो बार पधारे श्यामाप्रसादे की एक यात्रा के दौरान जिराट में खोले नये हाट को लेकर था, जिसका बड़े ठाठ बाट के साथ भव्य समारोह के जरिये उनने शुरु किया था। सारे ईमानदार लोग इस हाट के बारे में कसमें खाकर बातें कर रहे थे।क्यों? क्योंकि बलागढ़ इलाके में पहले से एक पुराना हाट जिराट के पास ही सिजे गांव में मौजूद था।भुखमरी के वक्त वही इकलौता हाट काफी था।मुद्दा साफ साफ भुखमरी के मध्य सीधे तौर पर मुनाफावसूली का था।जबकि जरुरत उस वक्त की यह थी कि भूखों मरते खपते लोगों को बिन बिचौलिये सीधे सौदा करने का मौका देने का था।बजाय इसके श्यामाप्रसाद ने  अपना नया हाट खोल दिया सिजे के पुराने हाट को बंद करने के मकसद से।जाहिर है कि लगभर  हर इंसान के नजरिये से यह मामला….


हिंदू महासभा के रिलीफ का सच


श्यामाप्रसाद के खोले नये हाट में दिनदहाड़े बेशर्म मुनाफावसूली के दौर में जिराट गांव में हिंदू महासभा के राहत सहायता अभियान से मेरे तनिक भी प्रभावित होने की नौबत बन नहीं रही थी।मैंने ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं की थी।फिरभी मैंने पूरी छानबीन इसलिए की कि मुझे मालूम था कि जिराट की जनता ने भुखमरी के दौरान श्यामाप्रसाद के राहत सहायता कार्यक्रमों के बारे में सुना ही होगा।वहीं इकलौता  गांव था,जहां ऐसा था।बहरहाल मैंने तहकीकात के बाद पाया कि हिंदू महासभा  का भुखमरी  रिलीफ वर्क का गिरोहबंद ढकोसला उतना ही फर्जीवाड़ा था,जितना मुनाफावसूली के लिए श्यामाप्रसाद का हाट या आशुतोष मैंसन की डिस्पेंसरी।चार रिलीफ सेंटर से हिंदू महासभा को 28 सेर चावल और 28 सेर आटा ही भूखी जनता को बांटना था। इसके अलावा श्यामाप्रसाद के दो भाइयों ने अलग दुकान खोल रखी थी,जहां बाजार की आधी कीमत पर चावल बेचा जाना था।इसके बावजूद यह तामझाम  गरीबों के किसी काम का न हुआ क्योंकि बाजार में चालीस रुपया मन चावल बिक रहा था।यही वजह थी कि जिराट गांव के किसानों और मछुआरों की आम शिकायत यह थी कि यह सारी चैरिटी बाबुओं की मदद के लिए थी।दरअसल चंद लोगों को छोड़कर दरअसल हिंदू महासभा की चैरिटी के तहत बीस रुपया मन चावल खरीदने की औकात भूखी जनता में से किसी की नहीं थी।


इसी लिए धनी वर्ग के लोगों से जिराट के लोगों को सख्त नफरत थी और सबसे ज्यादा नफरत थी श्यामाप्रसाद से।उनसे वे डरते भी थे सबसे ज्यादा।


कुल मिलाकर मैंने यही श्यामाप्रसाद के पैतृक गांव जिराट में देखा।मैंने भुखमरी के दौरान बंगाल की तमाम बड़ी हस्तियों के गांवों को देखा लेकिन कहीं भी धनी तबके के लिए इतनी घृणा और कटुता नहीं देखी।खासतौर पर उस गांव के सबसे कद्दावर शख्स के खिलाफ।


वापसी के रास्ते मुझे कुछ और ऐसा मिला जिसके लिए मैं कतई तैयार न था।मुझे तो पहले से ऐसा लगता रहा था कि मध्यवर्ग की पूरी की पूरी नई पीढ़ी श्यामाप्रसाद के महिमामंडन के लिए कोई भी सफेद झूठ कहने से हिचकती नहीं है। पूरे  बलागढ़ इलाके और  जिराट गांव में हर किसी  ने साफ तौर पर बता दिया कि दो साल में श्यामाप्रसाद अपने गांव सिर्फ दो बार गये।भुखमरी के दौरान एकबार और फिर जिराट में नया हाट बसाने के लिए। इसके विपरीत बगल के कसलपुर में एक डाक्टर साहेब मिले जिनने दावा किया कि श्यामाप्रसाद तो कलकता से लगातार गांव आते जाते रहते हैं और मसलन पिछले दो महीने में वे चार बार पधारे।क्या उनके गांव में एक भी शख्स ऐसा नहीं है जिसे श्यामाप्रसाद से मुहब्बत हो? जिराट के रिलीफ सेंटरों में चावल और आटा बांटने का काम देख रहे बीरनलेंदु गोस्वामी ने खुद मुझसे कहा कि वे सिर्फ रविवार को ही रिलीफ बांट रहे थे।जबकि हिंदू महासभा पर गर्व करने वाले हाईस्कूल के एक युवा छात्र ने दावा किया कि वहां रिलीफ केंद्रों पर रोजाना 24 छात्र काम कर रहे थे और रोज सौ डेढ़ सौ मुंहों को भोजन खिला रहे थे।


इसी लिए धनी वर्ग के लोगों से जिराट के लोगों को सख्त नफरत थी और सबसे ज्यादा नफरत थी श्यामाप्रसाद से।उनसे वे डरते भी थे सबसे ज्यादा।फिरभी इस यात्रा के अंत पर मुझे कुछ ऐसा सकारात्मक भी सुनने को मिला कि जिससे पता चला कि श्यामाप्रसाद और उनके तमाम कृत्यों के बावजूद प्राचीन बंगाली सभ्यता के मुताबिक सर आशुतोष की आत्मा प्रेरणा अभी सही सलामत हैं।शाम ढलने लगी थी और स्कूल तालाबंद था,जिसके सामने पेड़ों के नीचे लड़के लड़कियों के शोर मचाते झुंड जमा थे।किसी ने भद्दी भाषा में कोसना शुरु कर दिया तो तत्काल एक बूड़े आदमी ने चीखकर पूछा,`कौन भद्दी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है? क्या तुम सभी जानवरों में तब्दील हो गये हो?' इसके जबाव में किसी ने कहा कि वे लोग कैसे इंसान हो सकते हैं,जिन्होंने स्कूल तक बंद कर दिये।फिर मेरे गाइड,एक किसान कार्यकर्ता के मुखातिब हुए वे।उन्होंने बिना लाग लपेट के मांग की,`प्लीज,हमारे लिए एक स्कूल टीचर दे दीजिये।हम भूखं रहकर उन्हें खाना खिलायेंगे।केरोसिन का भाव दस आना पिंट(0.473 लीटर) है।लेकिन हम उसके लिए भी पैसे जुगाड़ कर लेंगे।ईश्वर के वास्ते,हमारा स्कूल फिर चालू कर दीजिये।अगर ऐसा नहीं हो सका तो सर आशुतोष के गांव की सभ्यता खत्म हो जायेगी।हमारे बच्चे गुंडे बदमाश निकलेंगे।' जीने के लिए,श्रम के लिए कितना फौलादी इरादा है यह! यकीनन वे लोग जिंदा रहेंगे और रायल बेंगल टाइगर की तरह लड़ेंगे-श्यामाप्रसाद के बावजूद!

साभार समयांतर



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Friday, August 12, 2016

राष्ट्र कहां है? विभाजन और विखंडन राष्ट्र का सच है और इसीलिएसीमाओं के आर पार कश्मीर जल रहा है तो समूचा महादेश सीमाओं के आर पार आतंक और हिंसा के शिकंजे में है।धर्म कहां है? विधर्मियों, शरणर्थियों,आदिवासियों,दलितों,पिछड़ों,बहुजनों शिशुओं, युवाओं, मेहनतकशों,किसानों और स्त्रियों की अबाध हत्यालीला रासलीला है। मनुष्य से बड़ा कोई सत्य होता नहीं है और न मनुष्यता से बड़ा कोई धर्म होता है�


राष्ट्र कहां है?

विभाजन और विखंडन राष्ट्र का सच है और इसीलिएसीमाओं के आर पार कश्मीर जल रहा है तो समूचा महादेश सीमाओं के आर पार आतंक और हिंसा के शिकंजे में है।धर्म कहां है? विधर्मियों, शरणर्थियों,आदिवासियों,दलितों,पिछड़ों,बहुजनों शिशुओं, युवाओं, मेहनतकशों,किसानों और स्त्रियों की अबाध हत्यालीला रासलीला है।

मनुष्य से बड़ा कोई सत्य होता नहीं है और न मनुष्यता से बड़ा कोई धर्म होता है।

मध्यभारत में,दंडकारण्य में और समूचे आदिवासी भूगोल में इस सैन्य राष्ट्र का वीभत्सतम चेहरा बेपर्दा है।जहां राष्ट्र, संविधान, कानून का राज, लोकतंत्र का एक ही मायने है सलवा जुड़ुम और अनंत विस्थापन।

हमारी नागरिकता और हमारी स्वतंत्रता का एक ही मायने रह गया है क्रयशक्ति।

विकास का मतलब है अबाध विदेशी हितऔर अबाध विदेशी पूंजी।

पलाश विश्वास

हमने खाड़ी युद्ध शुरु होते न होते लिखना शुरु किया था अमेरिका से सावधान।अब बूढा हो गया हूं और आय के स्रोत बंद हो जाने के बाद सड़कों पर हूं।सर पर छत भी नहीं है और हमारे लिए सारे दरवाजे,खिड़कियां और रोशनदान तक बंद हैं।देश विदेश के लाखों लोगों के साथ निरंतर संवाद के बाद कहीं कोई मित्र नहीं है तो जीजिविषा छीजती जा रही है।वरना हालातइतने तेजी से बदल रहे हैं कि हमें सचमुच लिखना चाहिए धर्मोन्मादी इस सैन्यराष्ट्र बारत से सावधान।


राष्ट्र कहां है?विभाजन और विखंडन राष्ट्र का सच है और इसीलिएसीमाओं के आर पार कश्मीर जल रहा है तो समूचा महादेश सीमाओं के आर पार आतंक और हिंसा के शिकंजे में है।धर्म कहां है?विधर्मियों,शरणर्तियों,आदिवासियों,दलितों,पिछड़ों,बहुजनों और स्त्रियों की अबाध हत्यालीला रासलीला है।


हम आहिस्ते आहिस्ते अमेरिका बन गये हैं।धर्मोन्मादी हमारे राष्ट्रनेता और युद्धोन्मादी अमेरिकी कर्णदार दोनों सभ्यता,मनुष्यता और प्रकृति के खिलाफ हैं।


जो हम खाड़ीयुद्ध की शुरुआत से कह रहे थे अब अमेरिका के भावी राष्ट्रपति बनने के प्रबल दावेदार डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं और काफी जिम्मेदारी से कह रहे हैं क्योंकि उनके राष्ट्रपति बनने की प्रबल संभावना है।


ट्रंप खुलेआम चुनाव अभियान में  इस्लाम के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर चुके हैं तो बाकी लोग लगातार इस्लाम और दूसरे धर्मों के खिलाफ धर्मयुद्ध का नेतृत्व करते रहे हैं और करेंगे।चाहे जो भी जीतें।क्योंकि अमेरिका का मतलब है कि बाकी देशों की स्वतंत्रता और संप्रभुता का विध्वंस अमेरिकी सत्ता वर्ग के हितों के मुताबिक।


हमारे यहां ऐसे धर्मोन्मादी अविराम चुनाव प्रचार अभियान को हम लोकतंत्र मानने लगे हैं बाकी हमारी मानसिकता उतनी ही युद्धोन्मादी धर्मोन्मादी है,जितनी कि अमेकरिकी राष्ट्रनेताओं की घृणा और हिंसा की कोख में रची बसी मानसिकता है।


हमारे यहां वही हिसां और घृणा को महोत्सव,वही श्वेत आधिपात्य,वहीं निर्मम रंगभेद जाति व्यवस्था और मनुस्मृति की बुनियाद पर राजकाज,राजनय और राजधर्म हैं।हम अमेरिका और इजराइल के मनुष्यता विरोधी,प्रकृति विरोधी विश्वयुद्ध में उनके सर्वोच्च वरीयता वाले पार्टनर हैं।


इस युद्ध के मुक्तबाजार में माफ करें फ्री में हमें हिंसा,बेदखली,शरणार्थी सैलाब,अशांत भूगोल, सैन्यशासन, गृहयुद्ध, युद्ध, आतंक, दमन, उत्पीड़न,नागरिक और मनावाधिकारों के हनन के अलावा कुछ भी नहीं मिलने वाला है।


जो विपदा,आपदा और संकट के रचनाकार हैं,हमने राष्ट्र और राष्ट्र की सुरक्षा आंतरिक सुरक्षा उनके हवाले कर दिया है।


इस्लामिक स्टेट के जनक के बतौर डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति  राष्ट्रपति बराक हुसैन को चिन्हित किया है तो उनकी पहली विदेश मंत्री और राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन को आतंकवादी नेटवर्किंग का सूत्रधार बताया है।सच यह है कि वे सच कह रहे हैं।


विकीलीक्स के दस्तावेज और दूसरे पारामाणिक दस्तावेज से बी यही साबित हो रहा है।साबित हो गया कि सद्दाम हुसैन निर्दोष थे।दुनियाभर के मीडिया के पापकर्म का खुलासा भी हो गया है।हालांकि मीडिया के युद्ध अपराधों को आमतौर पर आम माफी है।मीडियाअब सार्वभौम है।


डोनाल्ड ट्रंप का एजंडा हम जानते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों से साफ है कि उनमें और मैडम हिलेरी में कोई फर्क नही है जैसे जार्ज बुश और ओबामा में कोई फर्क नहीं था।यह इन लोगों का चरित्र नहीं है यह अमेरिकी साम्राज्यवाद का चरित्र है।



इसीतरह भारत के तमाम राजनेताओं में कोई बुनियादी फर्क अब नहीं रह गया है जो एकसाथ मिलकर लोकगणराज्य भारत को अमेरिकी उपनिवेश बतौर धर्म राष्ट्र बनाने लगे हैं।विचारधारा ,रंग,जाति ,धर्म,क्षेत्र,भाषा की विभिन्नता के बावजूद भारतीय राजनीति और राजनय,राजधर्म का ,सामाजिक यथार्थ यही है जिसका समाना हम कर नही रहे हैं क्योंकि सत्य, अहिंसा और प्रेम की भारतीयता के वंशज अब हम नहीं हैं ।


हम सभी लोग नवउदारवादी मुक्तबाजार की संतानें हैं जो ज्यादा से ज्यादा क्रयशक्ति हासिल करने के लिए आपस में मारकाट कर रहे हैं और मनुष्यता को रौंदते हुए  सारे प्राकृतिक संसाधन और देश तक बेच रहे हैं।


हम सभी,हां,हम सभी इस देशबेचो गिरोह के छोटे बड़े गैंगस्टार उसीतरह है जैसे कि हमारे तमाम बजरंगवली गोरक्षक हैं।हम भी कम गोरक्षक नहीं है।


राष्ट्र कहां है?

उपनिवेशों की न्यूनतम सव्तंत्रता हम दलितों, बहुजनों, अल्पसंख्यकों, विस्थापितो, शरणार्थियों, आदिवासियों और स्त्रियों को देने को तैार नहीं है और रंगभेदी सत्ता विमर्श हमारा इतिहासबोध और विज्ञान दोनों है।


मनुष्य से बड़ा कोई सत्य होता नहीं है और न मनुष्यता से बड़ा कोई धर्म होता है।


विश्व की तमाम प्राचीन सभ्यताओं का बुनियादी जीवनदर्शन यही है तो धर्म कमसकम भारत में प्रकृति से मनुष्य का तादात्म्य है,जो नैतिकता के सर्वोचच् मानदंड पर आधारित है और वे मानदंड भी प्रकृति और मनुष्यता के गहरे रिश्ते पर आधारित हैं।


भारत में प्राचीन बौद्ध धर्म और आधुनिकतम सिखधर्म में ईश्वरा का कोई अस्तित्व नहीं है।समाज उनका प्रस्थानबिंदू है और समता,न्याय,बंधुता,भ्रातृत्व,प्रेम और शांति तमाम मूल्यों के साध्य हैं।


यहीं नहीं,जिस अधर्म के नाम धर्मोन्मादी राष्ट्र बनाने पर आमादा हैं मनुष्यविरोधी प्रकृति विरोधी वैश्विक शक्तियां और जिसे हिंदुतव कहा जाता है,उसमें तमाम नस्लों की सभ्यताओं और सामाजिक मूल्यों का प्राचीनकाल से समायोजन होता रहा है।


इसी हिंदुत्व ने पृथक दो धर्मों बुद्धधर्म और जैन धर्म के प्रवर्तकों महात्मा गौतम बुद्ध और महावीर को अपने सर्वोच्च संस्थापक आराध्य भगवान विष्णु का अवतार उसीतरह माना है जैसे विजेता आर्यों ने पराजित अनार्यों के तमाम देव देवियों को शिव,विष्णु और चंडी का अवतार बना दिया है।


सिखों के सारे गुरु हमारे भी गुरु है और हर भारतीयके लिए बोधगया और अमृतसर के स्वर्णमंदिर का वही महत्व है जितना की समस्त हिंदू धर्मस्थलों का है।उसीतरह अजमेर शरीफ पर सदियों से चादर चढाने वाले सिर्फ मुसलमान नहीं है।


पीर के दरगाह पर हिंदुओं ने हमेशा मत्था टेका है।भारत में जो भक्ति आंदोलन हुआ या फिर अंग्रेजी हुकूमत के दौरान जो नवजागरण हुआ,वहां ईश्वर का सर्वथा निषेध है और दिव्यता के बदले,ईश्वर की सत्ता के बदले सबसे ऊपर मनुष्य का स्थान है।


संस्कृत के अंतिम माहकवि ने हिंदुत्व के संस्थापक भगवान श्रीकृष्ण को उसीतरह हाड़ मांस का मनुष्य रचा है जैसे गोस्वामी तुलसीदास ने मर्यादा परुरषोत्तम के रुप में श्रीराम का नवनिर्माऩ करके भारतीय जनमानस में उसकी प्रतिष्ठा की है।तो स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ के ईशव्र नरनाराण थे।


यह सारा समायोजन सामाजिक पुनर्गठन और संगठन का मामला है और धर्म उसका माध्यम बना है तो उसके मूल्यबोध के जरिये आत्म संयम और आध्यात्म,धम्म और पंचशील के अनुशीलन से संगठित तौर पर हिंसा और घृणा का निषेध किया ही नहीं गया है बल्कि गौतम बुद्ध की अहिंसा को विश्वबंदुत्व का आधार बना दिया गया है और इसी वजह से भारत अब भी रवींद्रनाथ का भारततीर्थ है,जहां उपासना पद्धति चाहे कुछ हो,आस्था चाहे कुछ हो,धर्म का मतलब भारत में हमेशा धम्म रहा है।धर्म चाहे कोई हो,हर भारतीय का आचरण गौतम बुद्ध का पंथ रहा है।


इतिहासबोध के इस प्रस्थानबिंदू पर भारतीयता का मतलब यह बेलगाम अभूतपूर्व हिंसा हो ही नहीं सकता और जीवन का मायने मुक्तबाजार तो कतई नहीं और इस मुक्तबाजारी पागल दौड़ का गांधी ने विरोध किया था और विकास की उनकी परिकल्पना भारत के ग्राम स्वराज्य से शुरु होती है,जहां विकास का मतलब प्रकृति और मनुष्यता का कल्याण और विकास है और राष्ट्र का मतलब अत्याधुनिक परमाणु शक्ति सैन्यराष्ट्र नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है।


प्राचीन भारत के इतिहास को कायदे से पढ़ा जाये तो यह सामाजिक सास्कृतिक संगठन हड़प्पा संगठन हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो की नगरसभयताओं की बुनियाद रहा है तो भरत के तमाम चक्रवर्ती राजाओं सम्राट अशोक,चंद्रगुप्त मोर्य, विक्रामादित्य,हर्षवर्धन से लेकर सत्रहवीं और अछारवी सदी पर अलग अलग रियासतों पर राज करने वाले राजाओं तक राष्ट्र मूलतः जनसमाज का सांस्कृतिक संदठन है।


यहीं नहीं,इस सामाजिक सांस्कृतिक बुनियाद को आधार माना है पठान और मुगल शासकों से लेकर महाराष्ट्र के शिवाजी महाराज और जाधव राजाओं ने तो दक्षिण के भारतीय हिंदू राजाओं का राजकाज भी यही रहा है।


इतिहास और परंपरा के विरुद्ध हम किस राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं,बुनियादी सवाल यही है।


इसका मायने यह है कि मनुष्यता और प्रकृति के विरुद्ध हम किस राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं जिसका कोई सामाजिक या सांस्कृतिक चरित्र है ही नहीं।


भारतीय संविधान का निर्माण राष्ट्र निर्माताओं ने धम्म और पंचशील के आधार पर किया है जहां समता,न्याय,बंधुत्व,भ्रातृत्व,स्वतंत्रता,लोकतंत्र,अहिंसा और सत्या हमारे मूल्य हैं।


गौतम बुद्ध ने अपने देशना को जांचने परखने के बाद उन पर अमल करने को कहा था क्योंकि उनका धम्म विज्ञान और इतिहास के विरुद्ध था नहीं और वहां सत्य सर्वोपरि है और बुद्ध इसलिए महात्मा है कि उन्होंने खुद को तमाम धार्मिक लोगों की तरह न ईशवर घोषित किया है और न गुरु ।उन्होंने अपनी अभिज्ञता देशान के मार्फत शेयर किया है और अनुयायियों को उन्हें आजमाने की आजादी दी है।आजमाने के बाद ही अनुयायी बनने का उनका देशान रहा है।


इसके विपरीत अत्याधुनिक तकनीक वाले परमाणु श्कित सैन्य राष्ट्र भारत में भारतीय राष्ट्र और भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्य और लक्ष्य सिरे से गायब है।


धर्म के नाम पर मनुष्यविरोधी प्रकृतिविरोधी विध्वंस के महात्सव को हम राजकाज और राजधर्म दोनों मान बैठे हैं जो इतिहास,समाज,संस्कृति और विज्ञान के विरुद्ध है तो भारत और बारतीयता के विरुद्ध भी है यह तांडव।


हम अपना अपना सच साबित कर रहे हैं और चाहते हैं कि हमारे सच को ही बाकी लोग सच माने ले और जयघोष करें सत्यमेव जयते जबकि नरमेधी अश्वमेध जारी है और हम तेजी से वैदिकी हिंसा के युग में लौट रहे है बिना प्रकृति के साथ किसी तादात्म के।


बिना नैतिकता,बिना पंचशील,बिना संयम,बिना करुणा,बिना आचरण की शुचिता के हम विशुध रंगभेद को राजकरण बना रहे हैं,जो भारत में राजतंत्र का भी इतिहास नहीं है लेकिन विडंबना यही है कि यह हमारे लोक गणराज्य का सत्य है।


स्वतंत्रता का मतलब यह है कि सारे नागरिक स्वतंत्र हों।उन्हें समान अवसर मिले।

स्वतंत्रता का मतलब है कि कानून का राज हो और संविधान रक्षाकवच हो तो सत्य के आधार पर सारे नागरिकों को न्याय भी मिलें और उन सबकी सुनवाई हो।


स्वतंत्रता का मतलब है सामाजिक आर्थिक धार्मिक राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता जो विविधता और बहुलता के भारतीय इतिहास की निरंतरता  और राष्ट्र के सामाजिक सांस्कृतिक स्वरुप के बिना असंभव है।


धर्म के नाम अध्रम का यह तांडव,यह प्रेतनृत्य नरनारायण की हत्या का महोत्सव है।


ईश्वर हो या न हो,निरीश्वरवादी और आस्थावान हमारे तमाम पुरखों का जीवनदर्शन यही रहा है कि उसने मनुष्यता में ही धर्म का चरमोत्कर्ष माना है और सारे भारतीय साहित्यिक सांस्कृतिक कथासार और अभिव्यक्ति के तमाम आयाम यही है कि मनुष्य से बड़ा कोई सत्य होता नहीं है और न मनुष्यता से बड़ा कोई धर्म होता है।


जो धर्म राष्ट्र बनाने पर हम आमादा हैं,उसके अंध राष्ट्रवाद में हम मनुष्य और प्रकृति दोनों का वध कर रहे हैं और इसीके तहत राष्ट्र का विखंडन भी कर रहे हैं।


मध्यभारत में,दंडकारण्य में और समूचे आदिवासी भूगोल में इस सैन्य राष्ट्र का वीभत्सतम चेहरा बेपर्दा है।जहां राष्ट्र ,संविधान,कानून का राज,लोकतंत्र का एक ही मायने है सलवा जुड़ुम और अनंत विस्थापन।


हमारी नागरिकता और हमारी स्वतंत्रता का एक ही मायने रह गया है क्रयशक्ति।

विकास का मतलब है अबाध विदेशी हितऔर अबाध विदेशी पूंजी।


राष्ट्र कहां है?

विभाजन और विखंडन राष्ट्र का सच है और इसीलिएसीमाओं के आर पार कश्मीर जल रहा है तो समूचा महादेश सीमाओं के आर पार आतंक और हिंसा के शिकंजे में है।


धर्म कहां है?

विधर्मियों,शरणर्तियों,आदिवासियों,दलितों,पिछड़ों,बहुजनों और स्त्रियों की अबाध हत्यालीला रासलीला है।


उपनिवेशों की न्यूनतम स्वतंत्रता हम दलितों, बहुजनों, अल्पसंख्यकों, विस्थापितों, शरणार्थियों, आदिवासियों,बच्चों,युवाजनों,कामगारों,किसानों और स्त्रियों को देने को तैयार नहीं हैं और रंगभेदी सत्ता विमर्श हमारा इतिहासबोध और विज्ञान दोनों है।

Thursday, August 11, 2016

An attempt afresh to uproot the partition victimes! Palash Biswasভাবনা চিন্তি, শিকড কেটে গাছ মারার ফন্দী.....।ধন্যবাদ অচিন্ত বাবু/



 An attempt afresh to uproot the partition 


victimes!



Palash Biswas


ভাবনা চিন্তি, শিকড কেটে গাছ মারার ফন্দী.....।ধন্যবাদ অচিন্ত বাবু:Dr.Subodh Biswas


I am happy that Nikhil Bharat Udvastu Samanvaya Samiti President Dr.Subodh Biswas has shared this article by Dr.Achintya Biswas.Let the samiti take a stance against this name change just because of nameshake without considering history, geography, anthropology and demography.

Banga is the anthropological geography of negroid Non Aryan residents from Andhra to almost entire South East Asia.Bangladesh specifically East Bengal was known historically and Politically as Bengal for thousands of years and this Banga was ruled from Gaur for thousands of years.

West Bengal has become a separate state of Independent India which alone might not be called Banga or Bengal.

Moreover,16 crore population of Bangladesh and more than five crore refugees resettled in other states of India speak Bengali.This majority of Bengali demography has to be discarded with the name shake as the demography has similar language, identity,DNA and culture.

The Ruling Hegemony in Bengal has discarded every Bengali who has been aborted out of East Bengal and the East Bengal itself in history,geography and politics to ensure their monopolistic dominance and monopolistic racist rule of the Aryans enslaving the negroid Non Aryans which are better known as dalits,Bahujan,partition victims,refugees and so on in every sphere of life.Thus,this name change for name shake is not limited to administrative or political consequence at all and it means deepest conspiracy to eject and reject the indigenous demography and their civic and human rights as well as citizenship to ensure the continuity of Manusmriti rule of racist ethnic cleansing.


Thus,West Bengal remains always silent on the issue of Bangladesh genocide or the plight of Bengali Partition victime who are deprved in every sense.

It is an attempt afresh to uproot the partition victimes!

Palash Biswas

राह दिखाता गुजरात: आनंद तेलतुंबड़े

दलितों के इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन का संयोजन करने के लिए एक नौजवान दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की पहल पर बनी उना दलित अत्याचार लड़त समिति ने ऐलान किया कि दलित मरे हुए मवेशियों को उठाना बंद कर देंगे. उन्होंने सरकार से कहा कि वे शिव सैनिकों और खुद को गौ रक्षक कहने वालों से कहे कि वे सड़ती हुई लाशें उठाएं और उनका संस्कार करें. टाइम्स ऑफ इंडिया (28 जुलाई 2016) ने खबर दी कि कुछ ही दिनों के भीतर सड़ती हुई लाशों की बदबू ने गौरक्षकों और उनके सरपरस्त, राज्य, के होश ठिकाने ला दिए. समिति ने दायरा बढ़ाते हुए मैला साफ करना बंद करने का आह्वान भी किया है, जिसके वजूद को खुद अपनी ही एजेंसियों द्वारा कबूल किए जाने के बावजूद सरकार लगातार नकारती रही है. अगर दलितों ने सामूहिक रूप से अपने दलितपन से जुड़े बस इन दो कामों को छोड़ने का फैसला कर लिया तो जाति के पूरे निजाम को शिकस्त दी जा सकती है. अपनी असुरक्षा और प्रभुत्वशाली समुदायों की तरफ से होने वाले जवाबी हमलों के डर से वे ऐसा करने में नाकाबिल रहे हैं. इन गंदे कामों में लगा दिए गए दलित मुख्यधारा से दूर, अलग-थलग कर दिए जाते हैं, जिनके लिए सामाजिक तौर पर ऊपर उठने की गुंजाइश न के बराबर होती है.

राह दिखाता गुजरात: आनंद तेलतुंबड़े



गुजरात में मोटा समाधियाला गांव और उना कस्बे में हुए अत्याचारों के खिलाफ भड़के दलितों के आंदोलन में दलितों के नए सिरे से जाग उठने संकेत हैं. 11 जुलाई को यहां एक परिवार और इसके चार दलित नौजवानों को गाय की रक्षा की ठेकेदारी करने वाले गिरोह ने सबकी आंखों के सामने पीटा. 1970 के दशक में दलित पैंथर्स के बाद से कभी भी दलितों ने कभी भी इतने बागी तरीके से और भौतिक सवालों के साथ कोई पलटवार नहीं किया था. यों, देश में दलितों पर अत्याचार हर जगह होते हैं और गुजरात में जो कुछ हुआ, वे उससे कहीं ज्यादा खौफनाक होते हैं. लेकिन दूसरे अत्याचारों और उना में हुए इस अत्याचार में फर्क बस वो दुस्साहस है, जिसके साथ हमलावरों ने अपनी कार्रवाई का वीडियो बना कर इसे सोशल मीडिया पर डाल दिया. इससे जाहिर होता है कि उनको इस बात का पक्का यकीन था कि उन्हें अपने अपराधों के लिए कभी भी सजा नहीं मिलेगी. 2002 में इसी तरह के गौरक्षा के गुंडों ने दुलीना (झज्झर), हरियाणा में पांच दलितों को पीट-पीट कर मार देने के बाद उनमें आग लगा दिया था और इस घटना को छोड़ दें तो ऐसी घटनाओं की कभी भी ऐसी कोई जोरदार प्रतिक्रिया नहीं हुई. खुद गुजरात में ही सितंबर 2009 में सुरेंद्रनगर जिले के थानगढ़ में एक मेले में दलितों और ऊंची जाति के नौजवानों के बीच में एक छोटी सी झड़प में राज्य पुलिस ने तीन दलित नौजवानों को मार डाला था. बेशक, काफी हद तक थानगढ़ और ऐसी ही घटनाओं पर जमा हुए गुस्से और राज्य द्वारा इन अत्याचारों पर कोई भी कार्रवाई नहीं किए जाने से ही वह नाराजगी पैदा हुई है, जो मौजूदा आंदोलन के रूप में सामने आई है.

उना पुलिस थाने के करीब, कमर तक नंगे और एक एसयूवी में बंधे चार दलित नौजवानों को लोगों द्वारा सबकी नजरों के सामने बारी बारी से बेरहमी से पीटे जाने का वीडियो वायरल हुआ और इसने सब जगह पर गुस्से की एक लहर दौड़ा दी. शायद रोहिथ वेमुला के नक्शे कदम पर चलते हुए नाराजगी की पहली लहर में राज्य में अलग अलग जगहों पर करीब 30 दलित नौजवानों ने खुदकुशी करने की कोशिश की. इन्हीं में से कीटनाशक पी लेने वाले एक नौजवान 23 साल के योगेश सरिखड़ा की अस्पताल में मौत हो गई. लेकिन जल्दी ही इसके बाद विरोध का एक ऐसा बगावती तेवर सामने आया, जिसे आंबेडकर के बाद दलितों ने कभी भी नहीं आजमाया था. आंबेडकर ने दलितों से कहा था कि वे मवेशियों की लाशों को ढोना बंद कर दें. जब कुछ ब्राह्मणों ने यह दलील दी कि वे दलितों की कमाई का नुकसान कर रहे हैं, तो उन्होंने गुस्से में इसका जवाब देते हुए ऐलान किया था कि अगर दलित ऐसा करेंगे तो वे उन्हें नकद इनाम देंगे. बदकिस्मती से, सारे दलितों ने उनकी सलाह पर अमल नहीं किया और यह प्रथा आज तक चली आ रही है. आंबेडकर ने उन्हें ऐसे सभी पेशों को छोड़ने की सलाह भी दी थी, जो साफ-सुथरे नहीं हैं, लेकिन दलित कुछ तो अपने गुजर-बसर की जरूरतों के लिए और कुछ प्रभुत्वशाली समुदायों के दबाव के तहत उनको अपनाए हुए हैं. आधे पेट खा कर इज्जत के साथ जिंदगी गुजारने के अलावा आंबेडकर ने कोई और विकल्प नहीं पेश किया था. लेकिन गुजरात में चल रहे इस मौजूदा आंदोलन को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि इसने यह वाजिब मांग भी जोड़ी है कि अपने जातीय पेशों को छोड़ने वाले हरेक दलित को खेती लायक पांच एकड़ जमीन दी जाए.

इस रूप में दलितों के पास एक मजबूत हथियार तो है ही, उनके पास हिंदुत्व ब्रिगेड का एक मुंहतोड़ जवाब भी है, जिस पर गाय की रक्षा का सनक सवार है. घटना के एक हफ्ते बाद गांवों के बेशुमार दलित मरी हुई गाएं ट्रैक्टरों में भर कर ले आए और उन्हें गोंधल और सुरेंद्रनगर के सरकारी दफ्तरों के सामने डाल दिया. दलितों के इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन का संयोजन करने के लिए 
एक नौजवान दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की पहल पर बनी उना दलित अत्याचार लड़त समिति ने ऐलान किया कि दलित मरे हुए मवेशियों को उठाना बंद कर देंगे. उन्होंने सरकार से कहा कि वे शिव सैनिकों और खुद को गौ रक्षक कहने वालों से कहे कि वे सड़ती हुई लाशें उठाएं और उनका संस्कार करें. टाइम्स ऑफ इंडिया (28 जुलाई 2016) ने खबर दी कि कुछ ही दिनों के भीतर सड़ती हुई लाशों की बदबू ने गौरक्षकों और उनके सरपरस्त, राज्य, के होश ठिकाने ला दिए. समिति ने दायरा बढ़ाते हुए मैला साफ करना बंद करने का आह्वान भी किया है, जिसके वजूद को खुद अपनी ही एजेंसियों द्वारा कबूल किए जाने के बावजूद सरकार लगातार नकारती रही है. अगर दलितों ने सामूहिक रूप से अपने दलितपन से जुड़े बस इन दो कामों को छोड़ने का फैसला कर लिया तो जाति के पूरे निजाम को शिकस्त दी जा सकती है. अपनी असुरक्षा और प्रभुत्वशाली समुदायों की तरफ से होने वाले जवाबी हमलों के डर से वे ऐसा करने में नाकाबिल रहे हैं. इन गंदे कामों में लगा दिए गए दलित मुख्यधारा से दूर, अलग-थलग कर दिए जाते हैं, जिनके लिए सामाजिक तौर पर ऊपर उठने की गुंजाइश न के बराबर होती है.


गुजरात को हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला के रूप में लिया जाता रहा है, जहां हम इसके असली चेहरे को साफ-साफ देख पाते हैं. एक तरफ जहां 2002 के कत्लेआम के जरिए मुसलमानों को उनकी हैसियत साफ-साफ बता दी गई कि भारत में रहने का अकेला तरीका यह है कि उन्हें हिंदुत्व की शर्तों पर रहना होगा और इस्लामी हिंदू बनना कबूल करना होगा. वहीं दूसरी तरफ दलितों को अपने साथ मिला कर, इनाम देकर या सजाओं की अनेक तहों वाली तरकीबों के जरिए उलझाए रखा गया. पहले 1981 में और 1985 में फिर से आरक्षण संबंधी दंगों में दलितों को इसी से मिलता-जुलता सबक सिखाया गया था, जो 2002 में मुसलमानों पर हुए हमलों से कहीं ज्यादा व्यापक थे और कहा जाता है कि जिनमें करीब 300 दलितों ने अपनी जान गंवाई थी. बार-बार होने वाले इन हमलों ने पहले से ही कमजोर उनकी चेतना पर अंकुश लगा दिए और जल्दी ही उन्हें 1986 के जगन्नाथ यात्रा जुलूसों में शामिल होते हुए देखा गया. लेकिन उनके दुख-दर्द पर इस मेल-मिलाप का कोई फर्क नहीं पड़ा. इसके उलट उन्होंने पाया कि उनकी बदहाली साल दर साल बढ़ती ही जा रही है, जैसा कि अत्याचारों के आंकड़े इसे उजागर करते हैं. आमफहम धारणा के उलट, दलितों पर अत्याचार करने में गुजरात हमेशा ही सबसे ऊपर के राज्यों में रहा है. भाजपा ने कभी भी यह दावा करने का मौका हाथ से जाने नहीं दिया कि गुजरात दलितों के खिलाफ अपराधों की सबसे कम दरों वाला राज्य है. हाल ही में इसने पिट्ठू 'दलित नेताओं' और 'बुद्धिजीवियों' का एक जमावड़ा खड़ा किया है, जो इसकी तरफ से यही राग अलापने का काम कर रहा है.

मिसाल के लिए उना अत्याचारों के संदर्भ में एनडीटीवी पर एक बहस के दौरान और फिर इसके बाद द वीक (7 अगस्त 2016) में लिखे गए एक लेख में नरेंद्र जाधव ने यह दिखाने की कोशिश की कि गुजरात बड़े अत्याचारी राज्यों में नहीं आता. संघ परिवार के साथ अपने तालमेल के लिए राज्य सभा सीट से नवाजे गए जाधव ने बताया, "2014 में ऊपर के तीन राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार थे. अब बहस का मुद्दा बने गुजरात में असल में 2014 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की कहीं कम दर – 2.4 फीसदी – रही है जबकि ऊपर बताए गए राज्यों में यह 17 फीसदी से 18 फीसदी रही है." उन्होंने जानबूझ कर गलत आंकड़े बताए. क्राइम इन इंडिया 2014 में तालिका 7.1 घटनाओं की दरें मुहैया कराती है, जिनमें गुजरात की दर 27.7 (प्रति लाख एससी आबादी पर अत्याचारों की संख्या) है जो उत्तर प्रदेश के 18.5 से कहीं अधिक है. दिलचस्प बात यह है कि 2014 में गुजरात की हालत बेहतर दिखती है. इसके पहले से बरसों में गुजरात अत्याचारों के मामले में लगातार ऊपर के चार से पांच राज्यों में आता रहा है. 2013 में, जब आने वाले आम चुनावों और प्रधान मंत्री पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की ताजपोशी के दौर में नरेंद्र मोदी का वाइब्रेंट गुजरात प्रचार अभियान अपने चरम पर पहुंचा, दलितों के खिलाफ अपराधों की दर इसके पहले वाले साल 2012 के 25.23 से बढ़ कर 29.21 हो गई थी. इसने राज्य को देश का चौथा सबसे बदतर राज्य बना दिया. हत्या और बलात्कारों जैसे बड़े अत्याचारों के मामले में भी गुजरात ज्यादातर राज्यों को पीछे छोड़ते हुए ऊपर बना हुआ है. [देखें मेरा लेख: क्यों भाजपा के खिलाफ खड़े हो रहे हैं दलित]

गुजरात में दलितों के आंदोलन ने सीधे-सीधे इन मतलबी दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों को किनारे कर दिया है. इसने दिखाया है कि दलितों का सामूहिक आक्रोश खुद ही अपना चेहरा, अपने संसाधन और अपनी विचारधारा हासिल कर लेता है. द्वंद्ववाद का यह अनोखा फेर है कि दलितों की मुसीबतों का हल हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला में तैयार हो रहा है!


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কাকদ্বীপে সমুদ্রে নিঃখোঁজ সত্তর জন স্বজন। এবং বিধবা পল্লীর সেই সব মেয়েরা যারা সেদিন মিছিলে হেঁটেছিল। পলাশ বিশ্বাস


কাকদ্বীপে সমুদ্রে নিঃখোঁজ সত্তর জন স্বজন।

এবং বিধবা পল্লীর সেই সব মেয়েরা যারা সেদিন মিছিলে হেঁটেছিল।

পলাশ বিশ্বাস

বঙ্গোপসাগরে ঘনীভূত নিম্নচাপের দাপট। একনাগাড়ে বৃষ্টি কলকাতা সহ দক্ষিণবঙ্গে। জল জমল শহরের বিস্তীর্ণ এলাকায়। বঙ্গোপসাগরে ঘনীভূত নিম্নচাপ এখন অবস্থান করছে বাংলাদেশ সন্নিহত পশ্চিমবঙ্গেম।


বঙ্গোপসাগর উত্তাল।উথাল পাথাল সুন্দরবনের মনুষ্যজীবন ও জীবিকা।বিধবা পল্লীর অন্ধকার তমনিশা আরো ঘন আছড়ে পড়া কান্নার দাপটে।


বন্ধ জলে থমকে কোলকাতা ও সমগ্র নাগরিক জীবন মহানগর ও উপনগর সমেত।কিন্তু তাঁদের বিপর্যয় আরো আয়লা আচ্ছন্ন,যারা জীবিকার সন্ধানে স্বামী পুত্রকে সমুদ্রে পাঠিয়ে তাঁদের ফিরে আসার প্রতীক্ষা করে।তাঁরা প্রতিবার ফিরে আসে না ,যেমন এবারও তাঁরা ফিরে এল না।


সমুদ্রে নিঃখোঁজ সত্তর জন স্বজন।সমুদ্র উত্তাল থাকার জন্য আগামী ২৪ ঘণ্টায় গভীর সমুদ্রে মাছ ধরতে যেতে নিষেধ করা হয়েছে মৎস্যজীবীদের। এরই মধ্যে মাছ ধরতে গিয়ে বঙ্গোপসাগরে নিখোঁজ সত্তর জন  মৎস্যজীবী। নিখোঁজদের অধিকাংশই কাকদ্বীপের বাসিন্দা। তিন দিন আগে সমুদ্রে যান ওই মৎস্যজীবীরা।




গোসাবা থেকে হাসনাবাদ,হাসনাবাদ থেকে কাকদ্বীপ দিনপ্রতিদিনের জীবনযাত্রা এমনটাই।


সীমান্তের এপার ওপার বাদাবনে সীমান্ত নামানুষদের সমাজ বাস্তবের নিয়তি বদ্ধ দিনলিপি ঠিক এমনটাই.যা নিয়ে ভদ্রসমাজের মাথাব্যথা হওয়ার কারণ নেই।


সুন্দরবন নিয়েও তেমন মাথাব্যথা নের পরিবেশ চিতনাহীন সভ্য মুক্তবাজারি ভোগী ক্রয়শক্তি সমৃদ্ধ বাকী বাংলা ,বাকী বাংলাদেশ বা বাকী ভারতবর্ষের।


তাঁদের নাগরিকত্ব নেই।

রেশন কার্ড নেই।

ভোটার কার্ড নেই।


তাঁদের ভাগে আছে শুধু ঔ সুন্দরবন,সেখানকার মানুষখেকো বাঘ আর কুমীর আর আদিগন্ত ব্যাপী বঙ্গোপসাগর,যেখানে তাঁরা রাষ্ট্র ও সমাজের সব অধিকার,গণতন্ত্র,সংবিধান,আইন কানুনের সব অধিকার থেকে বন্চিত বাদা বন ও সমুদ্রকে আঁকড়ে বেঁচে থাকে এবং মরতে মরতে বাঁচে,বাঁচতে বাঁচতে মরে।


আমরা পৃথীবীর সব মানুষের পাশে দাঁড়াতে পারি,কিন্তু সুন্দরবনের ঔ ব্রাত্য মানুষদের পাশে দাঁড়াতে পারিনা।


এক সেদিন পাঁচই আগস্ট নিখিল ভারত উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির ডাকে তাঁরা বাংলাদেশ গণহত্যালীলা,ধর্ষণ উত্সব,বেদখলী ও উত্পীড়নের বিরুদ্ধে,নাগরিকত্বের দাবিতে,রেশন কার্ড,ভোটার কার্ডের দাবিতে কাকদ্বীপ থেকে ঝাঁকে ঝাঁকে চলে এসিছিল কয়েক হাজার।


রা কোলকাতায় সেদিনের সেই উদ্বাস্তুদের মহামিছিলে শিযালদহ থেকে হেঁটেছিল।

মতুয়াদের ডন্কার তালে তালে তাঁরা নেচেছিল।


মনুষত্বের,নাগরিকত্বের,নিরাপত্তার দাবিতে সোচ্চার প্রতিটি শব্দের সমর্থনে তাঁরা এক জোট উলুধ্বনি দিয়েছিল।


তাঁরা শুধু দাবি জানাতে এসেছিল এবং তাঁদের অনেকের মাথাতে সিন্দুর সেদিনও ছিল না।


হাতে ছিল না শাখা পলা।অলন্কাহীন সেই সব মেয়েরা রবীন্দ্রনাথের কৃষ্ণ কালো হরিণচোখে ভীত সন্ত্রস্ত সেদিন কোলকাতার পথে হেঁটেছিল হাজারো হাজার,মীডিয়া খবর করে নি।


সুন্দরবন প্রসঙ্গে তাঁরা বাদাবন জল ও সমুদ্রের মত খবরের পরিবেশ চেতনার মৃত  মুখ সারি সারি,যাদের জীবন জীবিকার নাগরিকত্বের অধিকার থাকতে নেই।


তাঁদের প্রতি সমাজের,রাজ্যের রাষ্ট্রের দায়বদ্ধতা থাকতে নেই।


তাঁরা এমনিকরে বেঁচে থাকবে,তাঁদের ছবি দিয়ে ফান্ডিং হবে।রাজনীতি হবে কিন্তু প্রতিবার আয়লায়,ভাঙ্গনে,বিপর্যয়ে,জলে জঙ্গলে তাঁদের ক্ষত ক্ষয় হয়ে যাওয়া জীবিকা জীবনের বাস্তবিক লড়াইয়ের কোনো খবর কোনো দিনও হবে না।


তাঁরা মরিচঝাঁপি গণসংহারের মুখ।

মরিচঝাঁপি গণসংহারের সাক্ষী তাঁরা।

প্রতিবার গণসংহার প্রাকৃতিক বিপর্যের মুখোমুখি তাঁরা এখনো বেঁচে আছে।


সেদিন সেই মিছিলের ঔ অসামান্যনারীদের সাথে সাথে গোটা পথ হেঁটেছিলাম।

প্রত্যেকের সঙ্গে কথা বলেছিলাম।


প্রত্যেককে কাছ থেকে দেখেচিলাম।


কাকদ্বীপ বাসিনী সেই সব নামানুষ বেনাগরিক মেয়েদের যাদের স্বামী পুত্র বর্তমান,তাঁরা রোজই সমুদ্রে যায়।জঙ্গলে যায়।


কারা ফিরে এসেছে ,কারা ফেরেনি,বা কারা আদৌ ফিরবে না,এখনই জানতে পারছি না।


তার চেয়ে বড় কথা আমাদের ঔ সব স্বজনদের জন্য কিছু করার ক্ষমতা আমার নেই ব্যক্তিগত ভাবে।আমরা রাষ্ট্র্র মুখোপেক্ষী।রাষ্ট্র যদি ওদের সমুদ্রের গর্ভ থেকে ফিরিয়ে আনতে পারে।

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Wednesday, August 10, 2016

अब मुकाबला धर्मोन्मादी अधर्म बनाम धम्म का है

सारे समीकरण उलट पुलट

अब मुकाबला धर्मोन्मादी अधर्म बनाम धम्म का है

लोकतांत्रिक,धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील ताकतों को इस बदलते मंजर को समझना होगा और गोरक्षकों के सौजन्य से जो समांतर ध्रूवीकरण शुरु हो गया है,उसे बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के प्रस्थानबिंदु से नई शुरुआत के साथ समता और न्याय,बहुलता और विविधता,अमन चैन,भाईचारे की लड़ाई को हमारे पुरखों के ख्वाबों की मंजिल में तब्दील करना होगा।


यूपी और पंजाब में आजादी से पहले आजमाये इस पुराने  और कामयाब  समीकरण की अग्निपरीक्षा है।अग्निपरीक्षा है बहुजन नेतृत्व की तो अग्निपरीक्षा है धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रीकि ताकतों की पकती हुई जमीन पर केसरिया सुनामी  के कयामती मंजर को फिजां दखल करने का कोई मौका न दें।



पलाश विश्वास

हवा बनाने वाले हवा हवाई लोगों को मालूम नहीं है कि हवा बदलने लगी है और वक्त को पीछे धकेलकर जमींदोज करने वालों को होश नहीं है कि उनके धतकरम से न विज्ञान के नियम बदलेंगे और न इतिहास बदल जायेगा।


हमने पहले ही लिखा है कि बंगाल में हवा बदलने लगी है और भारत और बांग्लादेश के धर्मोन्मादी महागठबंधन की नरसंहारी बलात्कारी सुनामी के बावजूद बदलाव की जो हवा मतुआ आंदोलन और बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर की शक्तियों में केंद्रित बहुजन आंदोलन की नींव से तूफां बनने जा रही है,उससे सारे समीकरण उलटपुलट हो जाने वाले हैं।फिरभी बुनियादी बदलाव के लिए समीकरण काफी नहीं हैं।


लोकतांत्रिक,धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील ताकतों को इस बदलते मंजर को समझना होगा और गोरक्षकों के सौजन्य से जो समांतर ध्रूवीकरण शुरु हो गया है,उसे बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के प्रस्थानबिंदु से नई शुरुआत के साथ समता और न्याय,बहुलता और विविधता,अमन चैन,भाईचारे की लड़ाई को हमारे पुरखों के ख्वाबों की मंजिल में तब्दील करना होगा।


यही फासिस्ट विरोधी मेहनतकश बहुजन तबके की एकता ही राष्ट्र और समाज के नवनिर्माण के लिए अनिवार्य वर्गीय ध्रूवीकरण का आधार है।


विभाजन से पहले सत्तावर्ग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बहुजनों और मुसलमानों का गठबंधन की रही है और सत्ता वर्ग के पास इसका जवाब भारत का विभाजन रहा है,जिसे उन्होंने बखूब अंजाम दिया।


बंगाल से जनाब फजलुल हक और जोगेंद्र नाथ मंडल की अगुवाई में बने इसी गठबंधन की ताकत से बाबासाहेब पूर्वी बंगाल से संविधान सभा में पहुंचे और तब जाकर कहीं उन्हें भारत का संविधान के तहत दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों,कामगारों,स्त्रियों और तमाम मेहनतकश तबकों को संवैधानिक रक्षाकवच सुनिश्चित करने का मौका मिला।


गुजरात से जो नई सुनामी का मंजर बनने लगा है,हम यह भूलने की भूल नकरे इसकी शुरुआत रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के बाद जातिव्यवस्था से आजादी और ब्राह्मणवाद के खिलाफ तमाम पहचान,जाति,मजहब की दीवारें तोड़कर देशभर में छात्रों और युवाओं के हाथों विश्वविद्यालयों और राजमार्गों पर व्यापक मनुस्मृति दहन के साथ शुरु हुई है जो बदलाव केलिए तमाम सामाजिक शक्तियों की एकता की प्रासंगिकता और उसकी निर्णायक भूमिका साबित करती है।


धर्मोन्मादी हिंदुत्व और फासीवादी नरसंहारी राजकाज की आधार प्रयोगशाला से फासिस्ट सत्ता और राजकरण,धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के खिलाफ भारत विभाजन से पहले बना बहुजनों और मुसलमानों का वह गठबंधन अग्निपाखी की तरह राख से निकल आया है और हमें उसके पांखों को मजबूत करने की दरकार है।


यूपी और पंजाब में आजादी से पहले आजमाये इस पुराने  और कामयाब  समीकरण की अग्निपरीक्षा है।अग्निपरीक्षा है बहुजन नेतृत्व की तो अग्निपरीक्षा है धर्मनिरपेक्ष,प्रगतिशील और लोकतांत्रीकि ताकतों की पकती हुई जमीन पर केसरिया सुनामी  के कयामती मंजर को फिजां दखल करने का कोई मौका न दें।


बदलाव के लिए अब फासिज्म की  निरंकुश सत्ता के मुकाबले बहुजनों और मुसलमानों का गठबंधन ही काफी नहीं है।


मुक्तबाजार की ताकतों का साथ है सत्ता वर्ग का,जो सबसे घातक विषैला गैसिला रुप रसगंधहीन मृत्यु निश्चितसायोनाइड आक्साइड आइसोसाइनेट वगैरह वगैरह है।


और संविधान के प्रावधानों और कानून के राज पर यही अबाध पूंजी वर्चस्व है जिसके शिंकजे में फंसे बहुजनों के तमाम राम रहीम अब हनुमान हैं तो बहुजन अलग अलग मजहब,जाति,नस्ल,जुबान,जमीन के दायरे में कैद लाखों टुकडो़ं में एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और अक दूसरे के खून से रंगे हुए नख से सिर तक केसरिया वानर सेना है।समाज और राष्ट्र को बदलने से पहले उन्हें बदलने की जरुरत है।


फासिज्म का यह राजकाज स्थानीय नहीं है,ग्लोबल है।

तोता अमेरिका में है तो तोता इजराइल में भी है।

दो दो जान है दो जहान है हत्यारी इस सत्ता कयामत की।


इसलिए बहुत संभव है कि बहुजनों और मुसलमानों का गठबंधन भी उसे शिकस्त देने काफी कतई न हो।यही बार बार हो रहा है।


सत्ता वर्ग के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनयिक,भौगोलिक, ऐतिहासिक, जाति नस्ल धर्म  हित समान हैं और उनकी संसदीय सहमति अटूट है तो इसके मुकाबले न प्रतिपक्ष कोई है और न प्रतिपक्ष की कोई राजनीति या अराजनीति है।


इस पर तुर्रा यह कि जीवन के हर क्षेत्र में समता और न्याय के वध का महोत्सव जारी है।भाषाओं,माध्यमों,विधाओं और लोक पर भी उन्हींका वर्चस्व है।


लोकतंत्र,अमन चैन,विविधता और बहुलता,समता और न्याय के लिए कोई राजनीतिक समीकरण काफी नहीं है।

राजनीति बदलाव के लिए सामाजिक क्रांति बेहद जरुरी है।


राजनीतिक शक्तियों के समीकरण के बादले सामाजिक शक्तियों के मानवबंधन की जरुरत है और प्रस्थानबिंदु वही बाबा साहेब का एजंडा जाति उन्मूलन का है तो पंथ दुनियाभर में पहली सामाजिक क्रांति के तहत समता और न्याय आधारित समाज और राष्ट्र के निर्माण करने वाले गौतम बुद्ध का है।


विश्वभर में धर्म चाहे कुछ हो,बदलाव की लड़ाई में सत्य, अहिंसा और प्रेम की विचारधारा की जो भूमिका है,उसका आधार महात्मा गौतम बुद्ध का धम्म है।


विश्वभर में धर्म चाहे कुछ हो,बदलाव की लड़ाई में सत्य, अहिंसा और प्रेम की विचारधारा की जो भूमिका है,उसका आधार महात्मा गौतम बुद्ध का धम्म है।पंचशील है।धम्म और पंचशील के अनुशीलन के लिए धर्मांतरण जरुरी नहीं है।


जबकि बदलाव के लिए धम्म और पंचशील का अनुशीलन जरुरी है।


बौद्धमय भारत के बजाय बुद्धमय भारत अगर हम अपना लक्ष्य बना लें तो सामाजिक राजनीतिक भूगोल इतिहास अर्थव्यवस्था आस्था उपासना पद्धति कुछ भी हो हम इस धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का जवाब धम्म और पंचशील से दे सकते हैं।


गौतम बुद्ध के आंदोलन में उनके अनुयायियों की भूमिका धर्मांतरण अभियान  की नहीं रही है।वह अभियान सत्य,अहिंसा और प्रेम के धम्म और पंचशील की निरंतरता रही है और जनसाधारण को अज्ञानता के अंधकार से सही मायने में तमसोमाज्योतिर्गमय का पंथ रचा है महात्मा गौतम बुद्ध ने,जो विशुध भारतीय है।


तबसे जनसंख्या का बूगोल समय समय पर होने वाले तो धर्मान्तरण से जो भी बदला हो,भारतीय संस्कृति की मुख्यधारा इतिहास के हर निर्णायक मोड़ पर फिर वही बुद्धम् शरणम् गच्छामि है।


विविधता और बहुलता भारत तीर्थ की भारतीय राष्ट्रीयता के वास्तविक जनक कविगुरु अस्पृश्य म्लेच्छ ब्रह्मसमाज रवींद्रनाथ की रचनाधर्मिता का मुख्य स्वर वही बुद्धम् शरणम् गच्छामि है और गांधी की विचारधारा का आधार भी वहीं है तो बाबासाहेब की समता और न्याय का दर्शन भी वही है।


धर्म नहीं,आस्था और उपासना पद्धति नहीं,गौतम बुद्थ की क्रांति दरअसल हमारी विरासत और भारत की साझा संस्कृति है।लोक संस्कृति है।


फासीवादी धर्मोन्मादी हिंदुत्व के नरसंहारी अश्वमेध के मुकाबले जनपक्षधरता के मोर्चे की बुनियाद अगर धम्म हो,तो समता और न्याय की मंजिल बहुत नजदीक है अन्यथा हम किसी और तरीके से इस ग्लोबल आर्डर के महाविध्वंस का मुकाबला कर नहीं सकते।धम्म और पंचशील ही धर्मोन्मादी अधर्म के नरमेधी राजसूय का जवाब है।


भारत में मेहनतकशों के हकहकूक के तमाम कानून ही बाबासाहेब ने नहीं बनाये,भारत में मजदूर आंदोलन की शुरुआत भी उन्होंने की।


भारत में साम्यवादी आंदोलन के नेतृत्व पर काबिज सामंती सत्ता वर्ग ने अगर जाति उन्मूलन के एजंडा को वर्गीय ध्रूवीकरण का माध्यम मानकर बाबासाहेब का साथ दिया होता तो बाबासाहेब की वर्कर्स पार्टी के जरिये भारतीय जनता को सच्ची आजादी मिल गयी होती।लेकिन उन्होंने तो कामगारों के मोर्चे से बाबासाहेब को दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया।


इसी तरह फासीवाद विरोधी आंदोलन और हिंदुस्तानी साझा चूल्हे की राष्ट्रीयता के नेता नेताजी को भी इसी सत्तावर्ग ने भारत की राजनीति,भूगोल और इतिहास से बाहर कर दिया।इससे पहले उनने फजलुल हक का काम तमाम किया।


गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की जंग के खास सिपाहसालर अब्दुल गफ्पार खान की उन्होंने नहीं सुनी और अपने विभाजन और विभाजन के जरिये आजाद भारत में बहुजनों और मुसलमानों के कत्लेआम के एजंडे को उन्होंने अंजाम दिया और विभाजन के बाद नानाविध कायाकल्प के साथ नरसंहारी अश्वमेध की वह वैदिकी हिंसा अब मुक्तबाजार की मनुष्यविरोधी प्रकृति विरोधी अबाध विदेशी पूंजी प्रवाह है और महज भारत नहीं सारा महादेश अब फासिज्म का उपनिवेश है।


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Tuesday, August 9, 2016

आम लोग बंधुआ मतदाता हैं जो अपने सफाये के लिए मनपसंद कातिल चुन लेते हैं।

इरोम की राजनीति का आशय और वर्गीय ध्रूवीकरण के बिना संस्थागत सत्तावर्ग की एकतरफा राजनीति

आम लोग बंधुआ मतदाता हैं जो अपने सफाये के लिए मनपसंद कातिल चुन लेते हैं।


प्रतिरोध की राजनीति का चेहरा अगर इरोम शर्मिला है तो यह समझना बेहद जरुरी है कि इस एकाकी प्रतिरोध के असंख्य द्वीपों से हम सत्ता पक्ष की नरसंहारी प्रकृति मनुष्यविरोधी नीतियों और सैन्य अभियान का मुकाबला कैसे कर सकते हैं जबकि राष्ट्र अब पूरी तरह सैन्य राष्ट्र है।


आजादी के बाद से लेकर अबतक भारत में जो हो रहा है वह सत्ता वर्ग की राजनीति है और इसी जनविरोधी राजनीति के मुक्तबाजार को हम लोकतंत्र कहते हैं।


यह संस्थागत राजनीति वर्गीय हितों के मुताबिक सत्ता परिवर्तन भी करती रहती है ताकि लोग अच्छे दिनों की उम्मीद में मर मर कर नरक जीते रहे धर्म,जाति,नस्ल,भाषा और क्षेत्र के नाम पर,जो इस देश के आम नागरिकों के वर्गीय ध्रूवीकरण में शाश्वत प्रेतबाधा है।


वर्गीय ध्रूवीकरण के बिना जनपक्ष की राजनीति हो नहीं सकती।


पलाश विश्वास

सोलह साल से जारी अपना लगातार आमरण अनशन इरोम शर्मिला ने आज तोड़ दिया और उन्होंने राजनीति में शामिल होकर मणिपुर की मुख्यमंत्री बनने का इरादा जताया है।इससे पहले अपने प्रेमी से विवाह करने का भी उन्होंने ऐलान कर दिया है।इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी लड़ाई की कोई प्रासंगिकता पर किसी तरह की आंच आनेवाली है।


हम अभी ठीक ठीक नहीं जानते कि भविष्य में इरोम की राजनीति क्या और किस रंग की होने वाली है और उस राजनीतिक विकल्प से मणिपुर में लोकतंत्र की बहाली होगी या नहीं या सशस्त्र सैन्यबल विशेषाधिकार कानून का विरोध वह अपने राजनीतिक मच से करने में कामयाब होंगी या नहीं।खासतौर पर जब उन्हें उनकी इच्छा के मुताबिक राजनीतिक कामयाबी मिलने लगेंगी।


पहली बात तो यह है कि किसी भी आंदोलन की अनंतकाल तक निरंतरता जारी रखना लगभग असंभव है।सोलह साल के अनशन के बावजूद सत्ता वर्ग सिर्फ मणिपुर में नहीं,देश के हर कोने में फौजी हुकूमत का विकल्प नानाविध कानून के तहत कर रहा है।इससे इरोम को यह आमरण अनशन आगे और खींचना निरर्थक लग रहा होगा और अब मणिपुर की लड़ाई जारी रखने के लिए वे राजनीतिक विकल्प चुन रही हैं।


आंदोलन करने का या आमरण अनशन का उन्हें जितना अधिकार है,इस भारत लोकगणराज्य में राजनीति करने का भी उन्हें उतना ही हक है जैसे अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनना और उसीसे विवाह करने का अधिकार उन्हें है।


उनके परिजनों या उनके अनुयायियों को उनके इस निर्णय का सम्मान करना चाहिए और हमें भी।


दूसरी बात यह है कि इस देश में विशुद्ध गांधीवादी तरीके से आंदोलन और आमरण अनशन जैसे प्रतिरोध से निरंकुश सत्ता का मुकाबला करना भी असंभव है।हमारे जनांदोलन के तमाम साथी एक के बाद एक राजनीतिक विकल्प चुनते जा रहे हैं और हमने किसी को रोका नहीं है।हम इरोम को भी रोक नहीं सकते।


तीसरी लेकिन सबसे अहम बात यह है कि राजनीति के बिना राष्ट्र का चरित्र बदलने की लड़ाई असंभव है।राजनीति से ही आप सत्ता हासिल करते हैं और सत्ता से ही नीतिगत निर्णय होते हैं और उस पर अमल बी सत्ता की राजनीति है।जैसे सत्ता की राजनीति होती है,वैसे प्रतिपक्ष की भी राजनीति होती है।


हम जिसे अराजनीति कहते हैं,अब तक असल प्रतिपक्ष वही अराजनीतिक जनपक्षधर मोर्चा ही है।क्योंकि सत्ता संघर्ष में पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों सत्ता वर्ग के हैं,जिनके हित भी उनके वर्गीय हित है जो वंचित जनता और उत्पीड़ित क्षेत्रों के खिलाफ दमनात्मक राजकाज के मुताबिक सिद्ध होते हैं।


राजनीति का मतलब मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं है।इस लिहाज से मणिपुर की जनता की फौजी हुकूमत से आजादी के लिए इरोम सबसे मजबूत और सबसे प्रासंगिक राजनीति कर रही थीं और उनकी इस प्रतिरोध की राजनीति का मणिपुर और पूरे देश में जनपक्षधर आवाम का पूरा समर्थन था।


अब वे मुख्यमंत्री बनने के लिए राजनीति करेंगी तो वह राजनीति आम जनता के पक्ष में किस तरह की राजनीति होगी,यह देखना बाकी है।


बहरहाल प्रतिरोध की राजनीति का चेहरा अगर इरोम शर्मिला है तो यह समझना बेहद जरुरी है कि इस एकाकी प्रतिरोध के असंख्य द्वीपों से हम सत्ता पक्ष की नरसंहारी प्रकृति मनुष्यविरोधी नीतियों और सैन्य अभियान का मुकाबला कैसे कर सकते हैं जबकि राष्ट्र अब पूरी तरह सैन्य राष्ट्र है।


सत्ता की राजनीति लोकतांत्रिक प्रणाली है जो संस्थागत है।यह गौर करने वाली बात है।सत्तावर्ग के एजंडे को लागू करने के लिए दल और चेहरे बदल जाते हैं ,राजनीति बदल जाता है लेकिन राजकाज नहीं बदल जाता।

भारत की आजादी के बाद निरंतर यही हो रहा है क्योंकि सत्तावर्ग दिखावे के वैचारिक राजनीतिक सैद्धांतिक मतभेद के बावजूद वर्गीय हितों के मुताबिक संसदीय सहमति के मुताबिक राजकाज चलाता है और नरसंहारी अश्वमेध और वैदिकी हिंसा पर अंकुश कभी नहीं लगता।


उत्पीड़ित वंचित जनता असंगठित मजदूरों की तरह है।वे अपने श्रम के मुताबिक तो क्या मानवाधिकार और नागरिक अधिकार,बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं में अपना हिस्सा समझ लेने में नाकाम है क्योंकि सत्ता वर्ग की तरह उनका वर्गीयध्रूवीकरण नहीं हुआ है।


वे विभिन्न राजनीतिक दलों के मातहत सत्ता वर्ग की राजनीति ही कर रहे हैं और उनकी कोई राजनीति नहीं है।आम लोग बंधुआ मतदाता हैं जो अपने सफाये के लिए मनपसंद कातिल चुन लेते हैं।


आजादी के बाद से लेकर अबतक भारत में जो हो रहा है वह सत्ता वर्ग की राजनीति है और इसी जनविरोधी राजनीति के मुक्तबाजार को हम लोकतंत्र कहते हैं।


मसलन हिंदुत्व का एजंडा किसी एक पार्टी का नहीं है और यह धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद भी सत्ता वर्ग की तरह संस्थागत है जिसपर सरकार और प्रशासन के नेतृत्व का कोई अंकुश हो ही नहीं सकता,बल्कि उनपर वर्गीयहितों की संस्थागत व्यवस्था का पूरा नियंत्रण है।


उनके हमलावर आंदोलन उनकी सत्ता की तरह निरंकुश है और यह निरंकुश सत्ता तब और खतरनाक होती है जब उसके शीर्षपर वंचितों और उत्पीड़ितों के चेहरे चस्पां कर दिये जाते हैं और अस्मिताओं के नाम पर लाखों टुकड़ों में बंटी जनता सत्ता में अपनों के चेहरे देखकर घात लगाकर होने वाले हमलों के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकती।


यह संस्थागत राजनीति वर्गीय हितों के मुताबिक सत्ता परिवर्तन भी करती रहती है ताकि लोग अच्छे दिनों की उम्मीद में मर मर कर नरक जीते रहे धर्म,जाति,नस्ल,भाषा और क्षेत्र के नाम पर,जो इस देश के आम नागरिकों के वर्गीय ध्रूवीकरण में शाश्वत प्रेतबाधा है।


ये हालात बदलने चाहिए।


हमारी कोई राजनीति नहीं है।जो भी राजनीतिक विकल्प चुन रहे हैं ,वे सत्तावर्ग की राजनीति में ही शामिल हो रहे हैं और उनका पक्ष जनता का पक्ष कभी हो ही नहीं सकता।


वर्गीय ध्रूवीकरण के बिना जनपक्ष की राजनीति हो नहीं सकती।


जबतक धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की पैदल सेनाएं हैं हम,जबतक जाति को मजबूत बनाते रहेंगे हम और जाति का नाश नहीं करेंगे हम,तब तक न वरगीय ध्रूवीकरण हो सकता है और न जनता की राजनीति हो सकती है।


जाहिर है कि कोई अकेली इरोम शर्मिला या और कोई मसीहा हमें इस तिलिस्म से आजाद कराने की स्थिति में नहीं है और मुक्त के पथ हमें बनाने ही होंगे।


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