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Wednesday, August 17, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख आरएसएस की शाखा में तब्दील होते भारतीय टीवी चैनल………

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अस्पृश्यता का संविधान लागू है! छिटपुट धमाकों से हिंदुत्व की इस सर्वनाशी सुनामी का मुकाबला करना असंभव! सौ विवेकानंद भी पैदा हो जाये तो चंडाल जनम जनम तक चंडाल रहेंगे। दलितों,आदिवासियो,विभाजनपीड़ितों और मुसलमानों के सफाये के इस राजकाज और राजधर्म का प्रस्थानबिंदू इतिहास और भूगोल से उनकी बेदखली का खुल्ला मुक्तबाजारी एजंडा है। पलाश विश्वास


अस्पृश्यता का संविधान लागू है!

छिटपुट धमाकों से हिंदुत्व की इस सर्वनाशी सुनामी का मुकाबला करना असंभव!



सौ विवेकानंद भी पैदा हो जाये तो चंडाल जनम जनम तक चंडाल रहेंगे।


दलितों,आदिवासियो,विभाजनपीड़ितों और मुसलमानों के सफाये के इस राजकाज और राजधर्म का प्रस्थानबिंदू इतिहास और भूगोल से उनकी बेदखली का खुल्ला मुक्तबाजारी एजंडा है।




पलाश विश्वास

हिंदू राष्ट्र में सबसे बड़ा संकट हिंदुत्व का है।

अलगाव और विघटन का शिकार अखंड हिंदू समाज है,जो हिंदू राष्ट्र का मूल आधार है।गुजरात में ऊना में दलितों की महारैली के बाद सवर्णों के हमलावर रुख से पूरे देश में दलितों के हिंदुत्व से अलगाव की जमीन तैयार हो रही है।दलितों के लिए अस्तित्व संकट है और मनुस्मृति राजकाज में यह संकट ढाई हजार सालों से जारी है।


गौतम बुद्ध की क्रांति की वजह से सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य,सम्राट अशोक और सम्राट कनिष्क के सौजन्य से बुद्धमय भारत के पर्यावरण सत्य और अहिंसा, करुणा, बंधुत्व,मैत्री, प्रेम और शांति की जो दिशाएं खुलीं, उसके तहत राष्ट्र पर किसी वर्ण और वर्ग का एकाधिकार अभीतक भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर चीन,जापान,तुर्की, मंगोलिया,मध्यएशिया और सुदूर दक्षिण पूर्व एशिया तक में कभी नहीं रहा है राजनीतिक भूगोल भिन्न होने के बावजूद सांस्कृतिक विविधता और बहुलता के सामंजस्य और समन्वय की निरंतरता के कारण।दूरियों के बावजूद।


मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा समय से वाणिज्य के रेशमपथ से बाकी दुनिया के साथ, खासकर मध्य एशिया और दक्षिणपूर्व एशिया में भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जो प्रभाव रहा है,उसका आधार गौतम बुद्ध का धम्म है।


तिब्बत में भारतीय मूल के पद्म संभव और दीपंकर अतीश के मिशन की वजह से जो धर्म राज्य बना,उसकी संस्कृति भी भारतीय है।जापान,चीन,कोरिया से लेकर थाईलैंड और म्यांमार में जो बौद्धधर्म का भूगोल है,उसमें भारतीयता की गहरी छाप है,जिसमें स्थानीय संस्कृति,लोक,भाषा,बोली और धर्मों का समन्वय हुआ है।


महापंडित राहुल सांकृत्यायन के पांडित्य और शोध की वजह से इसके सिलसिलेवार सबूत और दस्तावेज हासिल हैं।बाकी सामाजिक राजनीतिक भौगलिक यथार्थ को हम स्वाध्याय से जान समझ सकते हैं।


बाकी दुनिया की तरह,पश्चिम व मध्यपूर्व एशिया की तुलना में भारतीय उपमहाद्वीप और बाकी एशिया में जो आम तौर पर अमन चैन की फिजां विभिन्न धर्मों, जातियों, नस्लों, भाषाओं, जीवन शैलियों के बावजूद अब भी बना हुआ है,उसमें भारतीय विविधता और बहुलता की भारतीय संस्कृति के उन्मुक्त रेशम पथ का बहुत बड़ा असर है।इंडोनेशिया,मलेशिया,म्यांमार,थाईलैंड से लेकर कंबोडिया और वियतनाम तक इस भारतीयता की जड़ें खोजी जा सकती हैं जिसके लिए भरत से कोई साम्राज्यवादी अभियान हुआ नहीं है।


वैदिकी सभ्यता के दौरान आर्य अनार्य सुरासुर संग्राम के बावजूद,वर्णाश्रम के बावजूद,विजेताओं और विजितों के बीज वर्गीयध्रूवीकरण के बावजूद भारत में मनुस्मृति अनुशासन पुष्यमित्र शुंग समय से लागू होने से पहले शूद्रों और अछूतों के सामाजिक बहिस्कार और जन्मजात पेशा की अनिवार्यता और शिक्षा,संपत्ति,शस्त्र के निषेध आधारित विशुद्धता के वर्चस्व वाली रंगभेदी पितृसत्ता का यह स्थाई सामंती बंदोबस्त का वजूद नहीं रहा।


विडंबना यह है कि विकास ,विज्ञान,बाजार और तकनीक की आधुनिकताओं के बावजूद वहीं सामंतवाद अब अखंड हिंदू समाज और निर्मम हिंदू राष्ट्र के अवतार में वर्ण वर्ग एकाधिकारवादी पितृसत्ता के रुप में कहर बरपा रही है।



संत कबीर दास से शुरु निरीश्वरवाद की नई चार्वाक धारा की कोख से जनमे सुधार आंदोलन से हिंदुत्व का यह भूगोल बना है,जिसमें बहुसंख्य जनगण की आस्था हिंदुत्व है।यह कोई वैदिकी या सनातन हिंदुत्व नहीं है।


निरंतर प्रगतिशील,धर्मनिरपेक्ष,लोकतांत्रिक विविधता बहुलता का महोत्सव रहा है।


नवजागरण ने इस लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष आस्था को कानूनी हक हकूक में तब्दील करके सामंती अवेशेषों को मिटाने की पहल की जिसके नतीजतन ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इसी भारतीयता की स्वतंत्र चेतना के तहत समूचे भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के पहले दिन से आदिवासी किसानों के साथ साथ हिंदू मुसलमानों का साझा आंदोलन जारी रहा है।


1857 की क्रांति में इस एकता के तहत जो स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बनी,उसी दिशा में आगे चलकर समूचे अखंड भारत की आजादी तय थी लेकिन मुस्लीम लीग और हिंदू महासभा के दो राष्ट्र सिद्धांतों पर अडिग होने के कारण अंततः भारत का बंटवारा हुआ।


1857 में भारतीय स्वत्ंत्रता संग्राम में अलग अलग आस्थाएं हमारी एकता का आधार बन गयीं और तम गोमाता या गोरक्षा या राम रहीम का कोई विवाद आड़े नहीं आया तो 1947 में उन्हीं आस्थाओं ने हमें दो से तीन राष्ट्रों के लहूलुहान अंजाम तक पहुंचा दिया और अब हम उन्हीं आस्थाओं पर भारत का न जाने कितने और विभाजन करने पर आमादा हैं।


बहुजन या दलितों का आंदोलन कोई नया नहीं है।संन्यासी और नील विद्रोह से लेकर चुआड़,संथाल कोल भील मुंडा गोंड विद्रोह और अनगिनत किसान विद्रोह से लेकर तेभागा आंदोलन के तहत इस देश में बहुजन समाज आकार लेता रहा है और इन विद्रोहों और आंदोलनों में जमींदारी रियासती तबके के सवर्ण सत्तावर्ग की कोई भूमिका नहीं रही है।बहुजन समाज के विघटन की वजह से दलितों,आदिवासियों,मुसलमानों और स्त्रियों के खिलाफ यह निरंकुश नरमेध अभियान नया है।


अंग्रेजी हुकूमत से नत्थी सत्तावर्ग ने चुआड़ विद्रोह से लेकर 1857 की क्रांति और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त तक हर कीमत पर स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ विदेशी हुकूमत का साथ वैसे ही दिया है जैसे आज के हुक्मरान विदेशी पूंजी और विदेशी हितों के लिए हिंदुत्व और विकास के नाम भारत को अमेरिकी उपनिवेश बना रहे हैं।


बंगाल में हरिचांद ठाकुर ने दो सौ साल पहले नीलविद्रोह का नेतृत्व किया जो किसानों और आदिवासियों का विद्राह था तो मध्य भारत से लेकर महाराष्ट्र और आंध्र, बंगाल से लेकर बिहार और असम समेत समूूचे पूर्वोत्तर और पूर्वी बंगाल में चुआड़ विद्रोह के तहत जाति धर्म निर्विशेष भारतीय शासक तबके ने ईस्ट इंडिया कंपनी से लगातार लोहा लेते रहे और इस विद्रोह के दमन के बाद  अंग्रेज हुक्मरान ने स्थाई बंदोबस्त के तहत जमींदारी प्रथा को आधार बनाकर अपने साम्राज्यवादी हुकूमत का सामंती संरचना  तैयार किया।


और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लगभग दो सौ साल तक दगा और फरेब करने के बाद जमींदारी के संकट तेज होने के बाद,भूमि सुधार तेज होते जाने,दलित बहुजनसमाज के आकार लेकर बंगाल में सत्ता हासिल करने के कारण,आदिवासी किसानों के लगातार आंदोलनों के जरिये वर्गीय ध्रूवीकरण के कारण साम्राज्यवादियों की उसी सामंती संरचना ने हिंदू राष्ट्र के एजंडे के तहतभारत का विभाजन कर दिया।


बंगाल के समांतर पंजाब,महाराष्ट्र,गुजरात,केरल,कर्नाटक,आंध्र और तमिलनाडु में लगातार दलितों और बहुजनों का आंदोलन सैकड़ों सालों से जारी रहा है जबकि सामंतीवाद के खिलाफ दलित बहुजन स्त्री अस्मिता की लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष विरासत संत कबीरदास और संत रविदास,सूरदास,मीराबाई,रसखान,दादू और सिख गुरुओं के नेतृत्व में गायपट्टी की लोक विरासत चौदहवीं सदी से अटूट रही है और जो सामाजिक न्याय की राजनीति गायपट्टी में हो रही है,उसका आधार किसी मसीहा का करिश्मा नहीं,बल्कि यही लोकसंस्कृति है।


स्वतंत्र भारत में बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की एकमात्र छवि वैध है,वह है संविधान निर्माता की छवि।बहुजन और दलित आंदोलन,स्त्री अस्मिता और मेहनकशों, आदिवासियों और पिछड़ों के हक हकूक को धम्म आधारित संविधान की प्रस्तावना संवैधानिक रक्षाकवच देने वाले बाबासाहेब को हम किसी दूसरी छवि में देखने को अभ्यस्त हैं नहीं और न ही हम राष्ट्रनेताओं की अग्रिम पंक्ति में वोट बैंक राजनीति की मजबूरियों के बावजूद उन्हें कहीं रख सकें।


बाबासाहेब को जो न्यूनतम स्वीकृति मिली,हरिचांद गुरुचांद ठाकुर,बशेश्वर के लिंगायत आंदोलन,पेरियार के द्रवि़ड़ आंदोलन,स्वाधिकार और शिक्षा के लिए महात्मा ज्योतिबा फूले और माता सावित्री बाई फूले, अय्यनंकाली  की पहली मजदूर किसान हड़ताल को उस तुलना में कोई मान्यता नहीं मिली है और बाकी देश के लोगों को उनके बारे में खास कुछ भी मालूम नहीं है।इस मायने में दलित आंदोलन निराधार है।


बंकिम चंद्र के आनंदमठ और बंदेमातरम की वजह से साधु संत फकीर पीर बाउल के नेतृत्व में हिंदुओं औ मुसलमानों,आदिवासियों और बहुजनों के आंदोलन का इतिहास अब हिंदुत्व का इतिहास है तो वंदेमातरम हिंदू राष्ट्र का जयघोष है।यह इतिहास से हमारी बेदखली की शुरुआत है।


इतिहासबोध और वैज्ञानिक दृष्टि के बिना हिंदू राष्ट्रवाद के इस निराधार आधारकार्ड को समझना उतना ही मुश्किल है जैसे सिंधु घाटी की नगर वाणिज्यिक सभ्यता के नागरिकों को बालीवूड फिल्मों में नरभक्षी आदिवासी के रुप में चित्रित करना और परित्राता के रुप में त्रिशुलधारी आर्य महानायक का अवतार या फिर शिवाजी महाराज की विरासत के खिलाफ और महाराष्ट्र के देशज बहुजन इतिहास के विध्वंस के तहत चितपावन बाजीराव का महिमामंडन है।


चुआड़ विद्रोह के बारे में चर्चा होती ही नहीं है और महाश्वेता देवी ने बाकी किसान आदिवासी आंदोलनों के साथ इसकी चर्चा की है लेकिन हमारे अभिलेखागार या हमारे इतिहास या साहित्य में 1857 से पहले पलाशी की लड़ाई के तुरंत बाद भारतव्यापी शूद्र, मुसलमान,अछूत,आदिवासी शसकों के इस महाविद्रोह के बारे में कुछ भी कहीं उपलब्ध नहीं है।


बंगाल के चंडाल आंदोलन और बाबासाहेब के आंदोलन से पहले अस्पृश्यता निषेध कानून  के बारे में शेखर बंदोपाध्याय ने लिखा है तो हाल में बांग्ला अखबारों में,टीवी चैनलों पर दलित सब अल्टर्न विमर्श में दलितों और बहुजनों की कोई भागेदारी नहीं है।इतिहास और लोक से बेदखली की वजह से यह अलगाव है क्योंकि शिक्षा और ज्ञान के अधिकार से वंचित हमारे पुरखों ने कुछ भी नहीं लिखा है।


महात्मा ज्योतिबा फूले,बाबासाहेब अंबेडकर और पेरियार को छोड़कर दलितों और बहुजनों के इतिहास भूगोल की चर्चा दलितों और बहुजनों की ओर से कहीं हुई नहीं है जैसे भारत की स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सत्ता वर्ग के हितों के मुताबिक रचा गया है और इस संग्राम के बहुजन नायकों नायिकाओं की कोई कथा नहीं है।उसी तरह भारत विभाजन के शिकार लोगों की कोई कथा व्यथा विभाजनपीड़ितों की जुबानी में नहीं है।


मेरे पिता तजिंदगी अंबेडकर और साम्यवादी,किसान और शरणार्थीि आंदोलन के सिलसिले में कैंसर से रीढ़ की हड़्डी गल जाने से मौत के अंजाम तक पहुंचने से पहले तक सक्रिय रहे।


हमारे पुरखे मतुआ आंदोलन के भूगोल और इतिहास के लोग हैं।जो सन्यासी विद्रोह से लेकर नील विद्रोह और फिर तेभागा तक के लड़ाके रहे हैं।न मेरे पिता ने इस बारे में कुछ लिखा और न हमारे पुरखों ने कुछ लिखा।


हरिचांद गुरुचांद ठाकुर ने भी स्वयं कुछ लिखा नहीं है।उनके अनुयायियों ने हरिलीला और गुरुचांद लीला भक्तिभाव से लिखा है,जिसमें इतिहासबोध और वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है और बाकी भारत के लोगों को बहुजन समाज की इस पकी हुई जमीन के बारे में कोई अता पता नहीं है।


बाबासाहेब को बंगाल से संविधान सभा में चुनकर भेजने वाले जोगेंद्र नाथ मंडल और बैरिस्टर मुकुंद बिरहारी मल्लिक ने भी कुछ लिखा नहीं है।महाप्राण जोगेंद्र नाथ मंडल ने तो वैसे ही पाकिस्तान का संविधान रचा है जैसे बाबासाहेब ने भारत का संविधान।लेकिन बाकी कुछ जोगेंद्र नाथ मडल ने नहीं लिखा।


उनके बेटे जगदीश चंद्र मंडल ने अंहबेडकर जोगेंद्र पत्र व्यवहार,पुणे समझौता,साइमन कमीशन,असेंबली और संसद के माइन्यूट्स,अखबारी कतरनों और भारत विभाजन के दस्तावेजों का संकलन महाप्राण जोगेंद्रनाथ रचनावसली में कर दिया लेकिन मुकुंद बिहार मलिलिक और मंडल और मल्लिक के साथियों के हवाले से हमें कुछ भी मलूम नहीं है।


इसीतरह हम अय्यंन काली की विरासत से बेदखल हैं।बशेश्वर के बारे में हम खास जानते ही नहीं है।बशेश्वर को पहचानते नहीं हैं।बुद्ध धर्म और धम्म के इतिहास को छोड़ दीजिये,हमने अभी गुरु ग्रंथ साहेब का पाठ बही नहीं किया है,जो अनिवार्य है।


अंबेडकरवादियों का हल यह कि आंदोलन से दशकों से जुड़ेलोगों को बी बाबासाहेब का लिखा सिलसिलेवार पढ़ने की फुरसत नहीं है।


गनीमत है कि बाबासाहेब  भीमराव अंबेडकर  पढ़ते लिखते रहे हैं और इसलिए भारतीय इतिहास. अर्थव्यवस्था, स्वतंत्रता संग्राम,धर्म कर्म और संविधान कानून के बारे में दलितों और बहुजनों का पक्ष हमें मालूम है वरना हमारा इतिहासबोध और वैज्ञानिक दृष्टि फिर वही सामंतवादी धर्मोन्माद के अलावा कुछ भी नहीं है।


मेहनतकशों को अ आ इ ई सीखकर उन्हें हथियार बनाने का सबक सफदर हाशमी जो देते रहे हैं,उसका आशय इतिहास और भूगोल से बेदखली के खिलाफ लड़ाई का ऐलान है।


अब सोशल मीडिया में लाखों की तादाद में बहुजन मौजूद है और हद से हद वे जयभींम और नमोबुद्धाय या पारिवारिक अलबम या जोक्स तक सीमाबद्ध है और उनका कोई कांटेट नहीं है।


वे समझते ही नहीं है कि ब्राह्मणवाद के अनंत कांटटेंट के मुकाबले बहुजनों क पक्ष में और आम जनता के मुद्दों पर कोई कांटेट रचे बिना हम नया इतिहास बनाने की कोई तैयारी कर ही नहीं सकते और कहीं से इस कैद से रिहाई का रास्ता भी इस मूक वधिर जनता के लिए कोई मसीहा  बना नहीं सकता।


हमारे जैसे इक्का दुक्का लोग जो बहुजन विमर्श का कांटेट शेय़र करते हैं,वे उसे पढ़ते भी नहीं हैं और मीडिया और मुख्यधारा को गरियाने या ब्राह्मणों के खिलाफ युद्धघोषणा करके अपनी हर हरकत से ब्राह्मणवाद को मजबूत करते हुए हिंदुत्व की वानर सेना बने हुए हैं।और मुक्तबाजारी जाति तिलिस्म को अपनी क्रयशक्ति से हत्यारी सत्ता संस्कृति में बदलने में उनकी निर्णायक भूमिका है।वे नहीं बदले तो कुछ भी नहीं बदलेगा।


अपने हिस्से का इतिहास दर्ज किये बिना बदलाव की कोई लड़ाई असंभव है क्योंकि भारत के बहुसंख्य लोग इतिहास भूगोल और संविधान में अस्पृश्य हैं चाहे जाति धर्म और नस्ल और भाषा उनकी कुछ भी हो।

अलगाव की जमीन यहीं पर बनती है।


इतिहास की गहराई में पैठे तो साफ जाहिर है कि राजतंत्र में भी जो लोकतंत्र की विविधता और बहुलता भारतीय इतिहास की विरासत है,हम आज उससे सिरे से बेदखल हैं।फिरभी भारत लोक गणराज्य है।जो कुल मिलाकर सलवाजुड़ुम है या फिर शशत्र सैन्य विशेधाकार कानून है और हमारी कोई नागरिकता है ही नही।


रवींद्रनाथ की चर्चा हम बार बार करते हैं जिसे इस देश के मुसलमान और बहुजन ब्राह्मणवाद का अवतार मानकर कारिज कर देते हैं और नहीं जानते कि वे जाति से अस्पृस्य ब्राह्मण थे और बहिस्कृत उनका परिवार पूर्वी बंगाल से कोलकाता आया और उनके पुरखों में अनेक लोग मुसलमान और दलित बनकर पूर्वी बंगाल में ही मर खप गये और उनके परिवार ने भी ब्राह्मणत्व को तिलांजलि देकर ब्रह्मसामाज आंदोलन में निर्णायक भूमिका अदा की और इसी वजह से नौबेल पुरस्कार पाने के बाद भी वे पुरी के मंदिर में उसी तरह अस्पृश्यता के अपराध में निषिद्ध घोषित हुए जैसे भारत की प्रधानमंत्री की हैसियत से भी श्रीमता इंदिरा गांधी को पारसी फिरोज गांधी से विवाह के अपराध में काठमांडो के पशुमति मंदिर में घुसने नही दिया गया।नेहरु वंश की विरासत,कश्मीरी पंडित की पहचान को हिंदुत्व ने कोई रियायत नहीं दी है।


आज ही बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल ने बांग्ला दैनिक आनंदबाजार पत्रिका के अपने संपादकीय आलेख में अखंड हिंदू समाज के बारे में लिखते हुए शीर्षस्थ संघियों के हवाले से लिखा है कि सौ विवेकानंद भी पैदा हो जाये तो चंडाल जनम जनम तक चंडाल रहेंगे।जाति व्यवस्था का अंत नहीं है।अस्पृश्यता अनंत है।


यह हिंदू राष्ट्रवाद है और इस नजरिये से हिंदुत्व के एकमात्र शूद्र मसीहा स्वामी विवेकानंद का नरनारायण उसीतरह अस्पृश्य है जैसे रवींद्रनाथ का नरनारायण।


यह आंदोलन से भी  जरुरी है कि हम पहले समझ लें कि दलितों, आदिवासियों, विभाजनपीड़ितों और मुसलमानों के सफाये के इस राजकाज और राजधर्म का प्रस्थानबिंदू इतिहास और भूगोल से उनकी बेदखली का खुल्ला मुक्तबाजारी एजंडा है।


एक बात और,बाबासाहेब का जाति उन्मूलन का मिशन उनकी विचारधारा और आंदोलन का प्रस्थानबिंदू है तो हिंदुत्व से और महात्मा गाधी से लेकर सवर्ण राष्ट्रीयता के तमाम राष्ट्रनेताओं से उनके मतभेद और टकराव से लेकर पुणे करार और आरक्षण के मौजूदा राजनीतिक बंदोबस्त का आधार फिर वही जाति उन्मूलन का एजंडा है।उनके इस एजंडा में आर्यसमाज आंदोलन की भी खास भूमिका है।


आर्यसमाजियों के जाति तोड़क स्मेलन में बाबासाहेब को भाषण देना था और ब्राह्मणवाद पर उनके निर्मम प्रहार के कारण आर्यसमाजियों ने बाबासाहेब को यह भाषण देने की इजाजत नहीं दी तो उन्होंने इस भाषण को पुस्तकार छापा।जिस पर गांधी ने हिंदू समाज के विघटन की दलील के तहत कड़ा ऐतराज जताया और उनके तर्कों का बाबासाहेब ने खंडन किया।


इस विमर्श का भारत के कम्युनिस्टों ने कोई नोटिस नहीं लिया जाति व्वस्था के कारण भारत में वर्गीय ध्रूवीकरण की अनंत बाधाओं के सामाजिक यथार्थ के बावजूद तो भारत के बहुसंख्य आम जनता को भी जैसे धम्म में पैठी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और सामाजिक आचरण और मूल्यबोध की कोई समझ या चेतना नहीं है,वैसे ही जाति उन्मूलन के बाबासाहेब के इस एजंडे का हमें अता पता नहीं है।


बंगाल में मतुआ आंदोलन और पंजाब में आर्यसमाज आंदोलन भारत में वैदिकी कर्म कांड और ब्राह्मणवाद के विरोध में,जातिव्यवस्था के खिलाफ मुख्यधारा के बहुजन आंदोलन रहे हैं।जिसका आम लोगों पर असर देशव्यापी बहुत घना रहा है।


बंगाल में तो बहुजनों के साथ साथ मुसलमान भी बड़ी संख्या में मतुआ आंदोलन के सिपाही थे और आज भी बांग्लादेश में मतुआ आंदोलन में मुसलमान शामिल हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में नहीं हैं।बंगाल में दरअसल मतुआ आंदोलन सता का वोटबैंक है।


हिंदुत्व के पुनरूत्थान से हम आर्यसमाज आंदोलन से बेदखल हैं और हमें इसका कोई अहसास तक नहीं है जैसे मतुआ लोगों को अपना इतिहास मालूम नहीं है।

आर्यसमाज का अवसान का नतीजा यह बेमौसम कयामती हिंदुत्व है।


बांग्लादेश  में ग्लोबल आतंकी नेटवर्क के साथ युगलबंदी में जितना प्रलयंकर होकर बांग्ला राष्ट्रीयता के लोकतांत्राक धर्मनिरपक्ष प्रगतिशील ढाचे को खत्म करने पर आमाजदा है इस्लामी जिहादी धर्मोन्माद और आतंकवाद उसके मुकाबले भारत के हिंदू तालिबान के खिलाफ मोर्चाबंदी करीब करीब अनुपस्थित होने के सामाजिक यथार्थ के मुकाबले बांग्लादेश में दलित आंदोलन में समस्त बौद्ध, ईसाई, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष मुसलमानों,साधु संतों,पीरो,फकीरों और बाउलों का आंदोलन एकताबद्ध दलित आंदोलन है जो दरअसल अब भी पूर्वी बंगाल की विरासत के मुताबिक बहुजन आंदोलन है जो भारत के पश्चिम बंगाल में भी अनुपस्थित है।


भारत में हिंदुत्व के मोर्चे से बांग्लादेश की इसी प्रगतिशाल धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक दलितआंदोलन पर हमले ज्यादा हो रहे हैं।धर्मोन्माद पर बहुत कम।


हम बार बार लिख रहे हैं कि भारत का विभाजन मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा की सिंधु घाटी का विभाजन है और इसका आशय वही इतिहास और भूगोल,मातृभाषा और लोक संस्कृति से बेदखली है।


इसीके साथ ही यह बंगाल के  मतुआ आंदोलन और पंजाब के आर्यसमाज आंदोलन का विभाजन और बंटाधार है जो बहुजनों के विध्वंस और आत्मध्वंस का आधार है।


भारत विभाजन से पहले मुसलमानों और गैरहिंदुओं का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले हिमलयी जनता सवर्ण और बहुजनों,दोनों  का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले बाहुबलि सवर्ण राजपूतों और क्षत्रियों  का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष नागरिकता  का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले आदिवासियों का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले पिछड़ों का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले दलितों और बहुजनों  का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले मेहनतकशों और किसानों  का यह अलगाव भारतीयइतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


भारत विभाजन से पहले बच्चों और स्त्रियों का यह अलगाव भारतीय इतिहास के किसी भी कालखंड में हुआ नहीं है।


कल हमने अभिषेक श्रीवास्तव के ऊना आंदोलन के बाद दलितों के अलगाव और उनपर हो रहे सवर्णों के हमलों पर रपट से पहले हस्तक्षेप पर लिखा है कि आजादी कोई रोटी नहीं है कि जब चाहे तब उसे पृथ्वी की शक्ल दे दें।वह आलेख बी पढ़ लें।


अभिषेक की टिप्पणी पर हमने लिखा है कि कि इस अलगाव की खास वजह आंदोलन की तैयारी न हो पाना है और हमलों की वजह भी यही अलगाव है क्योंकि आंदोलन छिटपुट भावावेग है और इसकी कोई संरचना अभी बनी नहीं है।


आंदोलन ही काफी नहीं है।

आंदोलन में शामिल जनसमूहों को सलवा जुड़ुम से बचाने की जिम्मेदारी नेतृत्व की है।

इसके लिए देशव्यापी मोर्चाबंदी अनिवार्य है और हमने इस दिशा में अभी कुछ किया नहीं है तो छिटपुट धमाकों से हिंदुत्व की इस सर्वनाशी सुनामी का मुकाबला करना असंभव है।


दलित अकेले यह लड़ाई जीत नहीं सकते जबतक कि हम आम लोगों को ब्राह्मणवाद के खिलाफ मोर्चाबंद कर न लें।ब्राह्मणवादी समरसता के मुकाबले आम जनता का मानवबंधन बेहद जरुरी है और भारतीय छात्रों और युवाओं ने इसकी पहल कर दी है।


भारतीय स्त्रियों  की पितृसत्ता विरोधी आंदोलन की नींव पर छात्रों और युवाओं के इसी आंदोलन को मनुस्मृति दहन दलित आंदोलन में तब्दील करने की अब चुनौती है।


आदिवासियों,मेहनतकशों और पिछड़ों को दलितों के साथ खड़ा करना पहले जरुरी है।पितृसत्ता के खिलाफ आधी आबादी को एकजुट करना भी जरुरी है।










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Monday, August 15, 2016

आजादी कोई रोटी नहीं है।जो आटा गूंथ लिया फिर उसे आग पर सेंककर पृथ्वी की शक्ल दे दी। फिरभी हम आजादी का जश्न बहुत बेशर्मी से मना रहे हैं और आजादी का मतलब समझने से साफ इंकार कर रहे हैं।हमारी त्रासदी ओलंपिक त्रासदी है। फिरभी हम महज झंडा फहराकर आजादी का ऐलान कर रहे हैं और आजादी की जंग में हम कहीं हैं ही नहीं।आज फिर वहीं झंडा हमने गुजरात के ऊना में धूम धड़ाके के साथ फहरा दिया। पलाश विश्वास


आजादी कोई रोटी नहीं है।जो आटा गूंथ लिया फिर उसे आग पर सेंककर पृथ्वी की शक्ल  दे दी।


फिरभी हम आजादी का जश्न बहुत बेशर्मी से मना रहे हैं और आजादी का मतलब समझने से साफ इंकार कर रहे हैं।हमारी त्रासदी ओलंपिक त्रासदी है।

फिरभी हम महज झंडा फहराकर आजादी का ऐलान कर रहे हैं और आजादी की जंग में हम कहीं हैं ही नहीं।आज फिर वहीं झंडा हमने गुजरात के ऊना में धूम धड़ाके के साथ फहरा दिया।

पलाश विश्वास


सिर्फ ऐलान कर देने से आजादी मिलती नहीं है।कश्मीर के दोनों हिस्से में आजादी के नाम अभूतपूर्व हिंसा है तो इस आजाद देश में सन 1947 के बाद आजादी का नारा भी कोई नया नहीं है और नया नहीं है आजादी का आंदोलन।मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा में पराजित होने के बाद से लगातार हमारी हजारों पीढ़िया आजादी के ख्वाब जीते हुए हजारों साल से आजादी की जंग लड़ती रही हैं।


हजारों पीढ़ियों ने कुर्बानियां दी है और महात्मा गौतम बुद्ध की क्रांति से गुलामी की जो जंजीरें टूट गयी थीं,प्रतिक्रांति के जरिये तब से लेकर आज तक गुलामी का अनंत सिलसिला है और जंग आजादी की हमेशा आधी अधूरी रही है।हमें न आर्थिक आजादी मिली है  और न समामाजिक और नसांस्कृतिक आजादी।




पिछले सात दशक से हम राजनीतिक आजादी का जश्न मना रहे हैं।राजनीति जो मुकम्मल नरसंहारी अश्वमेधी रंगभेदी अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी, समाज विरोधी, मनुष्यविरोधी और प्रकृति विरोधी भी है.उस राजनीतिक आजादी का जश्न हम मना रहे हैं और आजादी के ख्वाब जमींदोज हैं।


आजादी कोई रोटी नहीं है।जो आटा गूंथ लिया फिर उसे आग पर सेंककर पृथ्वी की शक्ल  दे दी।उस पृथ्वी से भी हम अब बेदखल हैं।हम रोजी रोटी से भी बेदखल है।रोटी के लिए अनिवार्य आग के भी  हम मोहताज हैं।अनाज अब भी उग रहे हैं।कायनात की रहमतें,बरकतें और नियामतें भी वहीं हैं लेकिन इतनी आजादी भी नहीं है कि सबको रोटी नसीब हो जाये।इतनी आजादी भी नहीं है कि हर शख्स के हिस्से में उसकी अपनी कोई दुनिया हो। हम सिर्फ झंडे फहराकर आजादी का जश्न मनाने वाले लोग हैं।



आदिवासी भूगोल के विध्वंस के खिलाफ आवाज तक दर्ज नहीं कर सके हैं हम।

कश्मीर में रोज रोज हो रहे मानवाधिकार हनन के खिलाफ हम गूंगे बहरे हैं।

ये हालात हैं।


फिरभी हम महज झंडा फहराकर आजादी का ऐलान कर रहे हैं और आजादी की जंग में हम कहीं हैं ही नहीं।

आज फिर वहीं झंडा हमने गुजरात के ऊना में धूम धड़ाके के साथ फहरा दिया।


संस्थागत हत्या के शिकार रोहित वेमुला की बमौत मौत ने बगावत पैदा कर दी है और हम कह सकते हैं कि एक जलजला आया है और थोड़ी हलचल मची है।इससे बड़ी लड़ाई तो हजारों साल के दरम्यान  हजारों दफा लड़ी गयी है।


आज फिर वहीं झंडा हमने गुजरात के ऊना में धूम धड़ाके के साथ फहरा दिया।संस्थागत हत्या के शिकार रोहित वेमुला की बमौत मौत ने बगावत पैदा कर दी है और हम कह सकते हैं कि एक जलजला आया है और थोड़ी हलचल मची है।इससे बड़ी लड़ाई तो हजारों साल के दरम्यान  हजारों दफा लड़ी गयी है।


ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ दो सौ साल की हमारे पुरखों की कुर्बानियों से हमें हासिल एक खंडित भूगोल मिला है और हम उसे भी बेचने लगे हैं।हम उसकी भी हिफाजत कर नहीं पा रहे हैं।


पलाशी की लड़ाई के बाद पूर्वी भारत और मद्यभारत के बड़े हिस्से में चुआड़ विद्रोह का सिलसिला बना।फिर संथाल,भील,मुंडा,गोंड और आदिवासी विद्रोह का सिलसिला।


कंपनी राज के खिलाफ संन्यासी विद्रोह के तहत इस देश के प्रजाजनों ने जाति धर्म नस्ल की दीवारें तोड़कर आजादी की लड़ाई शुरु की।नील विद्रोह हुआ और उसके बाद 1857 की अधूरी क्रांति।


भक्ति आंदोलन के तहत साधुओं,संतों, पीर, फकीरों,गुरुओं और बाउलों ने सामंतवाद से आजादी की जमीन तैयार की और आज तक हम उसे पका नहीं सके हैं।उस विरासत से हम धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के तिलिस्म में अंधियारे की गुलामी जीने लगे हैं।


ब्रह्मसमाज के जरिये हमने ज्यादातर कुप्रथाओं से कानूनी निजात पा ली है लेकिन हमारा समाज अभीतक उन्हीं कुप्रथाओं के शिकंजे में है।


एकजुट होकर भारत की स्वतंत्रता संग्राम के माऱ्फत हमने खंडित आजादी खंडित देश के लिए हासिल कर ली और संविधान की प्रस्तावना में समता और न्याय का लक्ष्य धम्म के आधार पर तय किया और कुछ चुनिंदा इलाकों को छोड़कर देश में कहीं संविधान लागू नहीं है।


हमने सत्ता और राजनीति रंगभेदी  असंवैधानिक तत्वों को भेंट कर दिया और बाहुबलियों धनपशुओं को हम नेतृत्व देते रहे हैं और वे  ही हमारे जनप्रतिनिधि हैं।


जीवन के हर क्षेत्र में रंगभेदी मनुस्मृति शासन का वर्चस्व तकनीक और विज्ञान के बावजूद अभूतपूर्व है और मौजूदा कयामत की फिजां वैदिकी हिंसा से ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह पूरा स्थाई बंदोबस्त अब ग्लोबल है और किसी स्थानीय विरोध से कयामत का यह मंजर बदलेगा नहीं।


हम उत्त्तर भारत की गायपट्टी में सामाजिक न्याय के दावे के साथ सत्ता में भागेदारी का सिलसिला और उसका हश्र देख चुके हैं।हम संपूर्ण क्रांति से लेकर आम आदमी की क्राति का जलवा देख चुके हैं और जन आंदोलन के साथी क्रांति का एकतम ताजा ब्रांड स्वराज लेकर मुक्तबाजार में बदलाव के ख्वाब बेच रहे हैं।


कोई शक नहीं कि छात्रों और युवाओं की पहल से मनुस्मृति दहन का देशव्यापी अभूतपूर्व माहौल है लेकिन यह कुल मिलाकर छात्रों और युवाओं के आंदोलन में सीमाबद्ध है।


विश्वविद्यालयों और उच्चतर वातानुकूलित संस्थानों में सीमाबद्ध है।

जो न बीरसा मुंडा,न सिधु कान्हों का आंदोलन है और न बशेश्वर या मतुआ या चंडाल आंदोलन है,जिसका आदार जनसमाज हो।


यह दक्षिण भारत का आत्मसम्मान का द्रविड़आंदोलन भी नहीं है और न यह मणिपुर में सैन्यशासन के खिलाफ व्यापक जनविद्रोह का आकार ले पाया है।


जनता जाग रही होती तो बाबा साहेब की विचारधारा और उनके आंदोलन का बंटाधार न हुआ होता।

जनता जाग रही होती तो बाबासाहेब वोटबैंक एटीएम में बदल नहीं दिये गये होते।


जनता जाग रही होती तो बाबासाहेब का अंबेडकर भवन जमींदोज होने के बावजूद उत्तर प्रदेश तक में भी कुछ हलचल रही होती जहां इसकी आम जनता को कोई खबर नहीं है तो महाराष्ट्र में बहुजन आपस में मारामारी कर नहीं रहे होते।


जेएनयू के लगातार आंदोलन का दिल्ली और उत्तरप्रदेश में क्याअसर हुआ हमें मालूम नहीं है।हैदराबाद विश्वविद्यालय से उठे तूफान से आंध्र या तेलंगाना में जनता कितनी लामबंद हुई हमें मालूम नहीं है।

कोलकाता के विश्वविद्यालयों में सुनामी का माहौल है और बंगाल की जनता सीधे मनुस्मृति राजकाज के के यंत्रणा शिविर में अपनी अपनी हत्या की बारी के इंतजार में है।


देवभूमि के जयघोष से अघा नहीं रही हिमालयी जनता को खबर ही नहीं है कि हिमालय मर रहा है।

कुड़नकुलम और नर्मदा घाटी से लेकर टिहरी घाटी और नैनीझील का भी काम तमाम है और समुद्रतट वासी भारतीयजनता को परमामु भट्टियों में झुलसने के लिए छोड़ दिया गया है लेकिन इस रेडियोएक्टिव तबाही की खबर किसी को नहीं है।


आपदाओं का सृजन रोज रोज हो रहा है और हम मुकाबले के हालात में नहीं है।


जल जंगल जमीन रोजी रोटी श्रम आजीविका नागरिकता खाद्य सुरक्षा शिक्षा चिकित्सा लोकतंत्र की बहाली  नागरिक और मानवाधिकार अमन चैन विविधता बहुलता की कोई लड़ाई हम कायदे से शुरु भी नहीं कर सकें।

देशभर में बेहद जरुरी मानवबंधन की कोई पहल भी नहीं कर सके हैं हम।


आदिवासी भूगोल के विध्वंस के खिलाफ आवाज तक दर्ज नहीं कर सके हैं हम।

कश्मीर में रोज रोज हो रहे मानवाधिकार हनन के किलाफ हम गूंगे बहरे हैं।

ये हालात हैं।

फिरभी हम महज झंडा फहराकर आजादी का ऐलान कर रहे हैं और आजादी की जंग में हम कहीं हैं ही नहीं।


मन बेहद भारी है।कल देर रात तक हम दीपा कर्मकार की कामयाबी का इंतजार कर रहे थे। लेकिल सीमोन बाइ्ल्स की तैयारी के मुकाबले दीपा सर्वोत्तम प्रयास करके भी पिछड़ गयी चूंकि सीमोन को तैयारी और कामयाबी का जो मौका मिला वह दीपा को नहीं मिला और ओलंपिक क्वालीफाई करने से पहले हम दीपा को जानते भी नहीं थे और अगले चार साल और न जाने कितने साल उषा और मिल्खा सिंह के साथ उसे याद करके हम अपनी देशभक्ति दर्ज कराते रहेंगे और कभी नहीं सोचेंगे कि मंजिल के इतने करीब होकर भी वे आखिर जीत क्यों न सके।


हमारी हाकी टीमें बहुत अच्छा खेलकर भी एकदम आखिरी मौके पर विपक्षी टीम को जीत का तोहफा देकर घर वापसी कर चुकी है।तीरंदाजी,शूटिंग,टेनिस बैडमिंटन,मुक्केबाजी वगैरह वगैरह में हमारे बच्चे मुंह की खाकर घर वापस हैं।



जबकि ओलंपिक मैदान पर अश्वेतों का वर्चस्व है और हम भी वहीं अश्वेत है।


इसकी खास वजह हममें आजादी और कामयाबी का,लड़ाई का और जीतने का जज्बा है ही नहीं और न कामयाबी की कोई तैयारी है हमारी ।वेस्ट इंडीज,अफ्रीका और एशिया के दूसरे देशों के मुकाबले हम खेल में भी रंगभेद,जाति वर्चस्व,पितृसत्ता और सत्ता के खुल्ला खेसल फर्रूखाबादी के शिकार हैं और सात दशक बाद हाकी में अपनी जमीन बेदखल होने के बाद केल की दुनिया में हमारी कोई हैसियत है नहीं।


फिरभी हम आजादी का जश्न बहुत बेशर्मी से मना रहे हैं और आजादी का मतलब समझने से साफ इंकार कर रहे हैं।हमारी त्रासदी ओलंपिक त्रासदी है।


आम जनता की भागेदारी,आम जनता की एकता और आम जनता की कुर्बानियों के बगैर आजादी कोई मसीहा किसी से छानकर हमें तोहफे में दे देंगे और हम आजादी का ज्शन मनाते हुए जंडे फहराकर लड्डू बांटेंगे,सबसे पहले इस कैद से निकलने की जरुरत है।


कोई मसीहा हमें आजादी दे नहीं सकता और न मोक्ष का रास्ता दिखा सकता है कोई अवतार।


मनुष्यता के भूगोल और मनुष्यता के इतिहास की जड़ों से जुड़े बगैर बदलाव का यह दिवास्वप्न बेमानी है।

हम शुरु से दुर्मुख हैं और जश्न में  मजा किरकिरा करने के लिए माफी चाहते हैं वरना आप आजाद हां हमें गरियाने को।आपकी गालियां हमारे सर माथे।यही हमारी विरासत है।


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Saturday, August 13, 2016

गुजरात से राह बनती नजर आ रही है लेकिन अकेले दलित आंदोलन से हालात बदलने वाले नहीं हैं। सबसे पहले यह मान लें कि हम हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो के वंशज हैं और हम आज भी हारे नहीं है क्योंकि कोई भी हार निर्णायक नहीं होती।यूनान में आदिविद्रोही स्पार्टकस और उनके लाखों अनुयायियों की हार और एथेंस की सड़कों पर उनकी लाशें टांगने के बावजूद वे लाशें ही जिंदा होकर गुलामी की प्रथा हर देश काल परिस्थि�


गुजरात से राह बनती नजर आ रही है लेकिन अकेले दलित आंदोलन से हालात बदलने वाले नहीं हैं।

सबसे पहले यह मान लें कि हम हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो के वंशज हैं और हम आज भी हारे नहीं है क्योंकि कोई भी हार निर्णायक नहीं होती।यूनान में आदिविद्रोही स्पार्टकस और उनके लाखों अनुयायियों की हार और एथेंस की सड़कों पर उनकी लाशें टांगने के बावजूद वे लाशें ही जिंदा होकर गुलामी की प्रथा हर देश काल परिस्थिति में खत्म करने के लिए लड़ती रहीं तो आज दुनियाभर में लोकतंत्र है और रंगभेद सिर्फ अमेरिका और भारत में है।


भारत में इस रंगभेद की वजह ब्राह्मणवाद है और उसके खिलाफ लड़ाई फिर वही हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो की लड़ाई है।


पलाश विश्वास

हम लगातार आपको बंगाल में बदलती हवा का ताजा रुख बता रहे हैं।आज बंगाल में टाइम्स ग्रुप के लोकप्रिय बांग्ला दैनिक एई समय के रविवासरीय में पहली बार बंगाल के दलित आंदोलन के सिलसिले में अंबेडकर की नये भारत के निर्माण में उनकी निर्णायक भूमिका की सिलसिलेवार चर्चा की गयी है और साफ तौर पर खुलासा किया गया है कि बंगाल और भारत के दलित आंदोलन के इतिहास की हत्या कैसे होती रही है। कैसे भारतीय संविधान के रचालकार का वोटबैंक एटीएम बतौर इस्तेमाल करते हुए सत्तावर्ग ने उनकी विचारधारा और उनके आंदोलन के उलट हिंदू राष्ट्र का निर्माण किया।


अंबेडकर हत्या का यह अभूतपूर्व खुलासा अनिवार्य पाठ है।


इस लोकप्रिय अखबार छपा कांटेट दोहराने की जरुरत नहीं है।लाखों की प्रसार संख्या वाले इसअखबार की प्रतियां जब इस विषय पर कतई चर्चा निषेध के परिवेश में आम लोगं के हाथों में जायेगा तो समझ लीजिये कि इसके क्या नतीजे होंगे।बंगाल में फिर बेहद व्यापक परिवर्तन की हवा बनने लगी है।अंबेडकर पर और बंगाल के दलित आंदोलन पर एकमुश्त फोकस इसीका सबूत है।


दलित आंदोलन बंगाल में कतई फिर न हो,शरणार्थी आंदोलन भी न हो, भारत विभाजन से लेकर मरीचझांपी हत्याकांड और फिर 2003 की नागरिकता संशोधन कानून के खुल्ला खेल फर्रूखाबादी का मतलब कुल यही रहा है कि भारत विभाजन के बलि भारत में अंबेडकर के उत्थान और उन्हें संविधानसभा तक भेजने वाले समुदायों का सफाया ताकि भविष्य में भारत में फिर बहुजन समाज का निर्माण हो न सके जो बंगाल महाराष्ट्र और पंजाब को केंद्रित दलित किसान आदिवासी आंदोलन की वजह से भारत विभाजन के पहले तक लगातार बनता रहा है और सत्तावर्ग के हिंदुत्व ने  इस बहुजनसमाज की हत्या के लिए भारत का विभाजन कर दिया और बंगाल के बहुजनों के नरसंहार का सिलिसिला बना दिया।


सबसे पहले यह मान लें कि हम हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो के वंशज हैं और हम आज भी हारे नहीं है क्योंकि कोई भी हार निर्णायक नहीं होती।यूनान में आदिविद्रोही स्पार्टकस और उनके लाखों अनुयायियों की हार और एथेंस की सड़कों पर उनकी लाशें टांगने के बावजूद वे लाशें ही जिंदा होकर गुलामी की प्रथा हर देश काल परिस्थिति में खत्म करने के लिए लड़ती रहीं तो आज दुनियाभर में लोकतंत्र है और रंगभेद सिर्फ अमेरिका और भारत में है।


भारत में इस रंगभेद की वजह ब्राह्मणवाद है और उसके खिलाफ लड़ाई फिर वही हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो की लड़ाई है।इसीलिए रंगभेद के खिलाफ फिर फिर मनुस्मृति दहन अनिवार्य है और आजादी के लिए ब्राह्मणवाद का अंत भी अनिवार्य है।



हम शुरु से मानते रहे हैं कि 1947 में दरअसल भारत का विभाजन हुआ नहीं है।विभाजन हुआ है हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो की सभ्यता का।उस निर्णायक क्षण में हम मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा की फिर हार गये और सिंधु घाटी की सभ्यता से बेदखल हो गये और राजनीतक सीमाओं की बात करें तो ब्रिटिश भारत का भूगोल इस खंडित अखंड देशे से कहीं बड़ा अफगानिस्तान से लेकर म्यामार तक विस्तृत था तो यह विस्तार दक्षिण अफ्रीका की जनसंख्या को भी छूता था।


भारत में जाहिर है कि हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो में हमारे पुरखे विदेशी हमलावरों से हारे नहीं थे और आज भी हर आदिवासी घर में उस सभ्यता का कालचक्र मौजूद हैं और आदिवासियों की संस्कृति आज भी सिंधु घाटी की सभ्यता है।बाकी समुदायों का ब्राह्मणीकरण का इतिहास भारत का इतिहास मनुस्मृति शासन अखंड है,जिसका एकाधिकार,रंगभेदी वर्चस्व भी सन 1947 में भारत विभाजन का कारण और परिणाम दोनों हैं।


भारतीय इतिहास लोकतांत्रिक विरासत को वैशाली के गणराज्यों से आजतक वांच लें,भारतीय लोक संस्कृति और धर्म कर्म को बारीकी से जांच लें,फिर गौतम बुद्ध के बाद राजतंत्र का इतिहास देख लें,बु्द्धमय भारत के अवसान के बावजूद राजकाज और राजधर्म से लेकर आम नागरिकों का धर्म कर्म और जीवन कुल मिलाकर धम्म का अनुशीलन रहा है और तथाकथित वैदिकी साहित्य के अलावा मनुस्मृति अनुशान का कोई ऐतिहासिक आधार लेकिन नहीं है,जो आजादी के पहले से रंगभेदी वर्चस्ववादियों की जमींदारी में भारत को बदलने की साजिश बतौर बंगाल की सरजमीं पर हिंदुत्व और इस्लाम की धर्मोन्मादी दो राष्ट्रों के आत्मघाती सिद्धांत के तहत भारत के राजनैतिक विभाजन का कारण और परिणाम दोनों है और सही मायने में भारत में विशुध हिंदू राष्ट्र का इतिहास भी उतना ही है तो रंगभेदी मनुस्मृति का शासन भी वहीं है।


गुजरात के ऊना में आजादी के ऐलान से कुछ बड़ा नतीजा निकालने की उम्मीद तब तक कृपया न करें जबतक कि हम हजारों वर्षों से जारी आदिवासियों और किसानों के स्वंत्रतता संग्राम की निरंतरता से इस आंदोलन को जोड़कर शासक वर्ग का तख्ता पलट का चाकचौबंद इंतजाम न कर लें।


बंगाल आर्यावर्त के बाहर का भूगोल रहा है हमेशा और बुद्धमय भारत का आखिरी द्वीप भी रहा है बंगाल जहां पांचसौ साल पहले चैतन्य महाप्रभु के वैष्णव धर्म के जरिये हिंदुत्व की नींव पड़ी तो पाल वंश के अवसान के बाद सेनवंश के दौरान ब्राह्मणवादी राजकाज शुरु हुआ लेकिन तभी से साधु संत पीर फकीर बाउल और अंततः ब्रह्मसमाज आंदोलनों की वजह से बंगाल कभी ब्राह्मणवाद का उपनिवेश बना नहीं।रवींद्र का बारत तीर्थ और रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद का नरनारायण इसी जीवन दर्शन का अविभाज्य अंग है जो भारती कीलोक परंपरा और इतिहास की निरंतरता है।


उस उपनिवेश की कोई संभावना भारत विभाजन के बिना असंभव था और इसीलिए हिंदुत्ववादी जमींदार राजनेताओं ने बंगालर के साथ भारत का विभाजन कर दिया और जिन्ना का जिन्न भी उन्होंने खड़ा कर दिया अपने धतकरम की जिम्मेदारी धर्मांतरित मुसलमानों पर थोंपने और आजाद भारत में मुसलमानों को दोयम दर्जे का विभाजनकारी अपरराधी जीवन जीने को मजबूर करने की रणनीति के तहत।


इस इतिहास की हम बार बार चर्चा करते रहे हैं और भारत विभाजन के बारे में बार बार लिखते भी रहे हैं।इसे सिलसिले वार दोहराने की जरुरत नहीं है।


हम ऊना में दलितों की आजादी के ऐलान के गंतव्य के मुहूर्त पर आपको याद दिलाना चाहते हैं कि भारत में अंग्रेजी हुकूमत की नींव बंगाल में पलाशी के मैदान में पड़ी तो अब समझ लीजिये कि यह खंडित बंगाल मुकम्मल पलाशी का मैदान है।आजादी की लड़ाई पलाशी में हार के बाद शुरु हो गयी थी।किसानों और आदिवासियों ने गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए लगातार विद्रोह का सिलसिला जारी रखा जो आझ भी जारी है,दलित आंदोलन उस परंपरा से जुड़े बिना दलित आंदोलन हो ही नही सकता।


बंगाल में दलित आंदोलन की शुरुआत कवि जयदेव की बाउल पंरपरा से,ईश्वर और दैवी अस्तित्व देवमंडल के निषेध के साथ सेनवंश के  हिंदुत्व राजकाज के खिलाफ शुरु हो गया था जो भारतभर में संत कवियों के सामंती व्यवस्था के किलाफ स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा था तो पहले यह मान लीजिये कि दलित आंदोलन की शुरुआत संत कबीर ने 14 वीं सदी में कर दी थी।


दलितआंदलन के जनक भारत में संत कबीरदास है.दलित विमर्श का प्रस्थानबिंदू फिर कबीर के दोहे हैं।


उनका यह निरीश्वर वाद धम्म और पंचशील का अनुशीलन है तो नवजागरण में ब्रह्मसमाज भी निरीश्वरवादी है जो नवैदिकी कर्मकांड और पुरोहिती ब्राह्मणवाद का निषेध है।


ब्रह्मसमाज के आंदोलन का दीर्घकालीन प्रभाव है लेकिन नवजागरण के मसीहावृंद ने आदिवासी किसान विद्रोह का साथ नहीं दिया क्योंकि उनमें से ज्यादातर खुद प्रजा उत्पीड़क जमींदर थे।हम इसका खुलासा भी बार बार करते रहे हैं।


भूमि सुधार के एजंडे के साथ नीलविद्रोह के जयघोष से जो मतुआ आंदोलन हरिचांद ठाकुर ने वैदिकी कर्म कांड और ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरु किया,उसीके तहत पूरा बंगाल दलित आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बना और महाराषट्र, पंजाब, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गुजरात और समूचे उत्तर भारत के दलित आंदोलनों,किसान और आदिवासी आंदोलनों से सर्वभारतीय बहुजन समाज की स्थापना हो गयी।


भारत का विभाजन दरअसल बहुजन समाज का विध्वंस है और इसके सबूत विभाजनपीड़ित बंगाल के दलित शरणार्थी भारत में आज भी बेनागरिक हैं और उनके कोई नागरिक मानवाधिकार नहीं है।खासतौर पर बंगाल और असम उनके लिए यातनाशिविर में त्बीदल हैं जबकि वे बहुजनसमाज के अगवा लड़ाका होने की कीमत अदा कर रहे हैं।शरणार्थी आंदोलन भी दलित आंदोलन का मोर्चा है उसीतरह जैसे कि किसानों,मजदूरों और आदिवासियों के तमाम आंदोलन।


गुजरात से राह बनती नजर आ रही है लेकिन अकेले दलित आंदोलन से हालात बदलने वाले नहीं हैं।


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ঘুষপেঠিয়া অজুহাতে হ্যলেঞ্চা ১৩ জন ছাএকে পুলিশের হাতে গ্রেফ্তার, নিখিল বারতের উদ্যোগে মুক্ত। বাংলা ভারতভাগের বলি উদ্বাস্তুদের জন্য যন্ত্রণা শিবির ডিটেনশান ক্যাম্প হয়ে গিয়েছে। মাননীয়া মুখ্যমন্ত্রী বলে থাকেন যে বাংলায় কোনো বাংলাদেশি ঘুসপেঠিয়া নেি,কিন্তু তাঁর পুলিশ ও প্রশাসন রজই কোথাও ন কোথাও ওপার বাংলার মানুষদের ঘুসপেঠিয়া বলে গ্রেফতার করছেন কেন্দ্র সরকারের নিষেধাকজ্ঞা �

ঘুষপেঠিয়া অজুহাতে হ্যলেঞ্চা ১৩ জন ছাএকে পুলিশের হাতে গ্রেফ্তার, নিখিল বারতের উদ্যোগে মুক্ত।

বাংলা ভারতভাগের বলি উদ্বাস্তুদের জন্য যন্ত্রণা শিবির ডিটেনশান ক্যাম্প হয়ে গিয়েছে।

মাননীয়া মুখ্যমন্ত্রী বলে থাকেন যে বাংলায় কোনো বাংলাদেশি ঘুসপেঠিয়া নেি,কিন্তু তাঁর পুলিশ ও প্রশাসন রজই কোথাও ন কোথাও ওপার বাংলার মানুষদের ঘুসপেঠিয়া বলে গ্রেফতার করছেন কেন্দ্র সরকারের নিষেধাকজ্ঞা সত্বেও।


পলাশ বিশ্বাস

আমি বার বার মনে করিয়ে দিচ্ছি,ভারতভাগের বলি বাঙালি হি্নদু উদ্বাস্তুদের জন্য সারা ভারতে সবচেয়ে শত্রুতা করছে বাংলার শাসক শ্রেণী।সেই ভারতভাগের আগে থেকেই প্রজা কৃষক পার্টির ভূসংস্কার এজেন্ডা নিয়ে সরকার গঠনের সময় থেকে বাংলার জমিদার শ্রেণী পূর্ব বাংলার মানুষকে শেষ করার জন্য যা যা করার প্রয়োজন,তা করতে কখনো পিছপা হয়নি।ভারতভাগ তারই পরিণতি।


ভারতভাগের বলি ওপার বাংলার মানুষদের জন্য পশ্চিম বঙ্গে জায়গা হয়নি,তাঁদের সারা ভারতে ছড়িয়ে ঢিটিয়ে দিয়ে তাঁদের রাজনৈতিক পরতিনিধিত্বের দফা রফা করা হল।


শুধু তাই নয়,মূলতঃ কৃষি জীবিকার সঙ্গে যুক্ত এই সব মানুষদের বাংলার ভূগোল ইতিহাস থকে চিরতরে নির্বাসিত করা হল।

ওপার বাংলায় যারা থেকে গেলেন,এপার বাংলা তাঁদের কথা ভাবল না কোনো দিন এবং যারা এসেছেন এপার বাংলায় পত্রপাঠ তাঁদের বিদায় করা হল।

ফিরে যারা আসার চেষ্টা করলেন,তাঁদের মরিচঝাঁপি গণ সংহার গণধর্ষনে বুঝিয়ে দেওয়া হল এই বাংলায় তাঁদের ঠাঁই নাই।


যারা তবু থেকে গেলেন তাঁদের পুনর্বাসনের নামে বসত পাট্টা দায়সারা ভাবে দেওয়া হল,কিন্তু নাগরিকত্ব ভারতে বর্ষে 2003 সাল পর্যন্ত জন্মসূত্রে নাগরিকত্ব থাকা সত্বেও দেওয়া হল না।বাংলা উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্বের দাবি কখনো করেনি যেমনটা পান্জাব করেছে,এবং পান্জাবি বা সিন্ধিদের নাগরিকত্ব নিয়ে কোনো দিন কোনো প্রশ্ন ওঠেনি।

ভারতবর্ষের  সীমান্তে ঢকার সঙ্গে সঙ্গে তাঁদের পুনর্বাসন,নাগরিকত্ব ও সংরক্ষণ,ক্ষতিপূরণ সবকিছু হল।আজও যারা পাকিস্তান থেকে আসছেন তাঁদের নাগরিকত্বে আইনী কোনো বাধা নেই।অথচভারতভাগের পর পর ওপার বাংলা থেকে যারা এসেছেন তাঁর নাগরিত্বের, মাতৃভাষার,সংরক্ষণের,জীবন জীবিকার কোনো হক নাই

অথচ সেই ভারতভাগের সময়ে যারা শত পুরুষের ভিটে মাটি ছেড়ে ভারতে আসতে বাধ্যহলেন.যারা ভারত ও বাংলাদেশের স্বাধীনতায় সব চেয়ে বেশি রক্ত দিলেন,তাঁদের 2003 সালে আইন করে প্রণব মুখার্জির নেতৃত্বে রাতারাতি বেনাগরিক ঘুসপেঠিয়া করে দেওয়া হল।বাংলার কোনো দলের কোনো নেতা সাংসদ বিরোধিতা করলেন না।একমাত্র জেনারেল শন্কর রায় চৌধুরী ছাড়া।এই আইন একনো পালটায়নি।

মোদী যখন 2014 সালের নলোকসভা নির্বাচন প্রচারে বাংলাদেশি ঘুসপেঠিয়াদের ওপারে ফেরত পাঠাবার ঘোষণা করলেন বারম্বার,তখন বাংলার মুখ্যমন্ত্রী শ্রীমতী মমতা ব্যানার্জি বলেছিলেন,কাউকে যদি ফেরত পাঠাতে হয,তাহলে তাঁকে ফেরত পাঠাতে হবে।মরিচঝাঁপির তদন্ত ও দোষীদের শাস্তির কথা তিনি মুখ্যমন্ত্রী হওয়ার আগে বার বার বলেছেন,মুখ্যমন্ত্রী হওয়ার পর ভুলে গেছেন।

ইতিমধ্যে ভারতজুড়ে সমস্ত রাজ্যে উদ্বাস্তু আন্দোলন ও ভারতের 22টি রাজ্যে নিখিল বারত উদ্বাস্তু সমিতির সংগঠনের লাগাতার প্রয়াসে  ভারত সরকারের  তরফে বাংলাদেশিদেরও নাগরিকত্ব দেওয়ার জন্যনাগরিকত্ব সংশোধনী বিল সংসদে পেশ হয়েছে,কিন্তু শত্রুপক্ষ অত্যন্থ ক্ষমতাবান যাদের পিছনে বাংলার রাজনীতি ত আছেই,এক শ্রেণী ঘর ভেদী বিভীষণ উদ্বাস্তু স্বয়ংভূ নেতারাও আছেন,যাদের সম্মিলিত চেষ্টায় এই বিলটি সংসদের এই অভিবেশনে পাশ ত হলই না ,আদৌ হবে কিনা জানা নেই,যেহেতু উদ্বাস্তুদের বেঁচে বর্তে থাকার, নাগরিকত্বের, মানবাধিকারে কোনো দায়বদ্ধতা বাংলার শাসক শ্রেণী জমিদার বংশধরদের নেই।

তা সত্বেও উদ্বাস্তু আন্দোলনের ফলে নোটিফিকেশান হয়েছে যে উদ্বাস্তুদের হাযরানি বন্ধ করতে হবে,তাঁদের বিদেশি বলে ঠেলে ফেলে গ্রেফতার করা চলবে না।

বাংলার বাইরে যেখানে 2003সালের আইন বলে উদ্বাস্তুদের হায়রানি ,এমনকি ডিপোর্টেশানও করা হয়েছে,সেখানেও উদ্বাস্তুদের দাবি মেনে নেওয়া হচ্ছে।

সব রাজ্যেই আন্দোলনের ফলে হায়রানি বন্ধ হয়েছে।একমাত্র আসামে উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্ব নাকচ করে ডিটেনশান ক্যাম্পে কয়েদ করা হচ্ছে।সেখানেও আন্দোলন চলছে এবং সেই আন্দোলনকে পক্ষ বিপক্ষের সবাই সমর্থনও করছেন।

এটা সংযোগবশ দুর্ঘটনা নয়ই কি সারা বাংলা ভারতভাগের বলি উদ্বাস্তুদের জন্য যন্ত্রণা শিবির ডিটেনশান ক্যাম্প হয়ে গিয়েছে।


বাংলার নূতন মন্ত্রী সভায় একজন ও উদ্বাস্তু মন্ত্রী নেই।সীমান্তে ত বটেই,সারা বাংলায়যেখানে সেখানে ওপার বাংলার মানুষকে ঘুসপেঠিয়া তকমা দিয়ে গ্রেফ্তার করা হচ্ছে,হাযরানি করা হচ্ছে যেমনটা কয়েক বছর আগেও দিল্লীতে বা মুম্বাইয়ে হত,এখন হচ্ছে না।

মাননীয়া মুখ্যমন্ত্রী বলে থাকেন যে বাংলায় কোনো বাংলাদেশি ঘুসপেঠিয়া নেি,কিন্তু তাঁর পুলিশ ও প্রশাসন রজই কোথাও ন কোথাও ওপার বাংলার মানুষদের ঘুসপেঠিয়া বলে গ্রেফতার করছেন কেন্দ্র সরকারের নিষেধাকজ্ঞা সত্বেও।

এর পরও যদি উদ্বাস্তুরা একতাবদ্ধ না হনত কপালে আরো অনেক বিপর্যয় আছে ত বটেই,ক্রমশঃ ওপার বাংলার সব মানুষদের জন্যবাংলায় ডিটেনশান ক্যাম্প হচ্ছেই।

যেমন আজ ১৩ আগষ্ট ২০১৬ ভোরবেলা পশ্চিম বাঙলার হ্যালেঞ্চার পার্শবর্তী অঞ্চলথেকে ঘুমের ঘরে এগারো বাবো ক্লাশের স্কুল ছাএদের বাঙলাদেশি ঘুষপেঠিয়া অজুহাতে পুলিশ বাড়ীতে গিয়ে এরেষ্ট করে এবং ধরে পুলিশ স্টেশনে নিয়ে আসে।


নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির সমাজব্রতী নেতৃত্ব শ্রী অনুপম রায় ও বাদল সরকার,(প্রধান শিক্ষক)হ্যালেঞ্চা থানা থেকে তাদের ছাড়িয়ে আনেন।সহযোগীতার হাত বাডিয়ে দেন শ্রী শ্যামল বালা ও গৌতম রায়।কেন্দ্র সরকারে নোটিশ দখার পর পুলিশ তাঁদের ছাড়তে বাধ্য হয়। ঠিক এমনতর গণ সংগঠন প্রত্যেকটি জেলায় মহকুমায় তৃণমূল স্তরে গড়ে তুলেই আমরা আমাদের স্বজনদের বাঁচাতে পারি,অন্যথা নয়।

সমিরিত একনিষ্ট সমাজসেবক শ্রী হীরেনময় সরকার,নেপথ্যে সারাদির সবারসংগে যোগাযোগ করে,ছাএদের রেহাইয়ের ব্যবস্থা করেন।

নেপথ্যে সাহায্য করেছেন অসীম বাবু,ডা মৃনাল সিকদার ও সমিতির অনেকে।

হেলন্চায় সংগঠন ছিল বলেই মুক্তি পেল ১৩ জন স্কুল ছাএ।নতুবা আজ তাদের স্থান হোত হাজতে।যেখানে সংগঠন নেই,সেখানে কিছুই করা সম্ভব হবে না।


সবাইকে নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির পক্ষ থেকে ধন্যবাদ জানানো হয়েচে।নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির কেন্দ্রীয় ও রাজ্যনেতৃত্বের তরফে আবেদন করা হয়েছে, এই জাতীয় ঘটনা হলে নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির নেতৃত্বকে অবিলম্বে জানান।

যাদের পুলিশ আটক করা হয়েছিল, তাদের নাম....নীচে দেওয়া হল।

উৎপল বিশ্বাস,রহিত বালা,কল্লোল বিশ্বাস,অর্নব সরকার,সৌরব বালা,অব্ভ্র মল্লীক,প্রবীর বিশ্বাস, ইসান সরকার,অপুর্ব সরকার,প্রতাভ রায়,কৌশিকবালা,সম্রাট বিশ্বাস,রথীন রায়।

এরা সবাই দশ বারো ক্লাসের ছাএ। এছাড়া দুইজন বাংলাদেশি ভ্রমন কারি ধরা পড়ে। তারা পাসপোর্ট দেখালে ছেড়ে দিয়েছে।

নীচে অভিযুক্তদের থানা থেকে মুক্ত করার পরের ফটো।সঙ্গে আছেন সমিতির সক্রিয় সদস্য অনুপম রায়।



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