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Wednesday, August 24, 2016

संघम् शरणम् गच्छामि! पलाश विश्वास

संघम् शरणम् गच्छामि!

पलाश विश्वास

बोधगया धम्म संदेश के तहत हिंदुत्व में निष्णात धम्म और पंचशील और बुद्धमय भारत को नवजागरण आंदोलन में बदलना भारत में सक्रिय तमाम अंबेडकरी आंदोलनकारियों, बहुजन संगठनों और बौद्ध संगठनों का साझा कार्यक्रम बने तो शायद हम फासिज्म के मुकाबले ,अधर्म और नरसंहार के मुकाबले राष्ट्र और समाज को ब्राह्मणवादी निरंकुश रंगभेदी नस्ली सत्ता के शिकंजे से रिहा कर सकते हैं।


अधर्म के फासिस्ट राजकाज,राजकरण,राजनय और नरमेधी राजधर्म के मुकाबले के लिए धम्म ही एकमात्र रास्ता आम जनता और बहुजनों के लिए बचा है,इस पर हम सिलसिलेवार चर्चा जो कर रहे हैं,वह हवा हवाई वैचारिक कवायद नहीं है बल्कि उसे जमीनी हकीकत में बदलकर विध्वंस और विनाश के मुकाबले खड़ा होने की जरुरत है।


हम इतिहास से सबक लें तो भारत की आजादी के बाद भारत के ब्राहमणवादी सत्ता वर्चस्व के विपरीत तमाम एशियाई देशों में व्यापक जन आंदोलनों ने विभिन्न देशों के विश्वभर में सक्रिय बुद्ध धम्म संघों और संप्रदायों के समन्वय की प्रक्रिया निरंतर तेज की है और 1950 में ही श्रीलंका के कोलंबो में हुए विश्व बौद्ध सम्मेलन में विश्व बौद्ध संघ की स्थापना हो गयी।


भारत में धम्म और पंचशील को बहुजनों ने त्यागकर ब्राह्मणवादी  वर्चस्व की व्यवस्था में खुद को हिंदू दर्ज करा लिया है और इसीलिए अब उनका कोई वजूद रहा नहीं है और वे वास्तव में जी जीकर या मर मरकर नर्क जी रहे हैं।


भारत में अबतक बौद्ध संगठन अलग अलग सक्रिय रहे हैं लेकिन बाकी देशों के मुकाबले बौद्ध संगठनों का आपसी समन्वय कम रहा है।मिथ्या अहंकार,निजी स्वार्थ,मिथ्या विपश्यना में बौद्ध संघों,विहारों,मठों,संस्थानों और बहुजन अंबेडकरी संगठनों की सामाजिक निष्क्रियता और सम्यक दृष्टि के वैज्ञानिक इतिहासबोध का अभाव इसके बड़े कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है ब्राह्मणधर्म के हिंदुत्व के सनातन छलावे के तहत ब्राह्मणवाद के पुनरूत्थान में बहुजनों के वानरसेना में तब्दील हो जाना।जो इस रंगभेदी नरसंहारी संस्कृति की असल ताकत भी है।


यह सबसे बड़ी समस्या है तो ब्राह्मणवादी पुनरूत्थान के मुकाबले फिर धम्मचक्र प्रवर्तन ही प्रतिरोध और समाधान दोनों हैं। आम जनता के जिंदा बचने का एक ही रास्ता है ढाई हजार साल पहले  हुई सामाजिक क्रांति का वह धम्मचक्र प्रवर्तन।


इसी प्रसंग और संदर्भ में बौद्ध संगठनों की समन्वय समिति का गठन और बोधगया में धम्म संसद का आयोजन भविष्य की कार्य योजना के तहत संवैधानिक लड़ाई के एजंडा के साथ बौद्ध संगठनों का राष्ट्रीय संगठन और समन्वय बहुत खास इसीलिए है।


तथागत गौतम बुद्ध ने जिस ब्राह्मण धर्म और ब्राह्मणवाद के खिलाफ समाज और राष्ट्र के चरित्र में बुनियादी परिवर्तन के लिए धम्म और पंचशील की सम्यक दृष्टि से बौद्ध संघों की संस्थागत संरचना के तहत ज्ञान विज्ञान सम्मत सामाजिक  क्रांति को अंजाम दिया,आज का समाजिक यथार्थ फिर वही ब्राह्मणवादी अधर्म और नरमेधी फासिस्ट राजकाज है।


साफ जाहिर है कि जनांदोलनों के लिए इस निरंकुश ब्राह्णमवादी नस्ली  सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का एकमात्र विकल्प फिर वही तथागत गौतम बुद्ध का धम्म है और धम्म चक्र के प्रवर्तन के तहत बौद्ध विहारों,मठों और संघों को फिर ज्ञान विज्ञान के केंद्रों, विश्वविद्यालयों में तब्दील करके ही  हिंदुत्व की निरंकुश संस्थागत सत्ता और एकाधिकार नस्ली  वर्चस्व को खत्म करके समता और न्याय संभव है।वरना नहीं।


गौरतलब है कि बोधगया धम्म संदेश में सबसे ज्यादा जोर बुद्धिस्ट पर्सनल ला और बुद्धिस्ट मैरेज एक्ट पर है क्योंकि बौद्धों के लिए हिंदू पर्सनल ला और हिंदू मैरेज एक्ट लागू होने से संवैधानिक और कानूनी तौर पर तमाम बौद्ध हिंदू ही माने जायेंगे और धर्म दीक्षा का कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि जनसंख्या में धर्मांतरित बौद्ध भी विष्णु के अवतार तथागत गौतम बुद्ध की तरह हिंदू ही बने रहेंगे।वैसे ही वे हिंदू बने हुए हैं और हिंदुओं की तरह ही जात पांत की नर्क जी रहे हैं।धर्मदीक्षा बेमतलब हो गयी अंदर बाहर इसी हिंदुत्व अस्मिता की निरंतरता के लिए।पहले इसे समझ लें।फिर धर्म दीक्षा।


बौद्ध संगठनों की समन्वय समिति सुप्रीम कोर्ट में यह कानूनी लड़ाई लड़ रही है। भारतीय बौद्ध संगठनों की राष्ट्रीय समन्वय समिति की भविष्य की कार्य योजना के तहत भारतीय संविधान की धारा -25 उपखंड बी के भाग दो के तहत बौद्धों की स्वतंत्र पहचान  और संवैधानिक मान्यता दिलाना समिति का मुख्य एजंडा है।


पुरातत्व विभाग को सौंपे गये तमाम बुद्ध धम्म के धर्म स्थलों को बुद्ध धर्म के अनुयायियों को सौंपने के लिए आंदोलन राष्ट्रीय बौद्ध धम्म संसद के एजंडा में खास तौर पर शामिल है।इसके तहत बौद्ध स्मारकों को पुरातत्व विभाग से भिक्षु संघ को हस्तांतरित करने  के लिए समिति संवैधानिक लड़ाई कर रही है।इसके लिए धम्म संसद ने बुद्ध विहार (Buddhist Monastery Bill) विधेयक लाकर कानूनी हक की मांग की है।


विडंबना है कि संघम् शरणम् गच्छामि का मतलब अब ब्राहमणधर्म के हिंदुत्व के संस्थागत संघ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शरण में जाना हो गया है।


जाहिर है कि जबतक आरक्षण है,तब तक हिंदुत्व का यह तिलिस्म अटूट है क्योंकि आरक्षण की वजह से गैर हिंदू तमाम समुदाय अनुसूचित होने का लाभ उठाने से चूकते नहीं हैं और लगातार हिंदुत्व को मजबूत करते हुए ब्राहमणवादी सत्ता और राष्ट्र को निरंकुश बना रहे हैं।


विडंबना है कि अल्पसंख्यकों के धर्म के बजाय बहुसंख्यकों के धर्म हिंदुत्व से जुड़कार लाभ का इकलौता सौदा अनुसूचित तमगा है,जिसे छोड़कर कोई बौद्ध हो नहीं सकता।


तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है।


तथागत गौतम बुद्ध का धम्म दुःखों से भागने के लिए दिव्य ईश्वर के अनुसंधान में समाधि नहीं है,बल्कि दुःखों के निराकरण का विज्ञान है।


तथागत गौतम बुद्ध का धम्म मानव कल्याण,बहुजन हिताय समर्पित सामाजिक सक्रियता की निरंतरता का यथार्थ है और समानता और न्याय की परिकल्पना है,जिसे संघों की शरण में जाकर ज्ञान विज्ञान की सम्यक दृष्टि,सही गलत को समझकर पंचशील अनुशीलन की प्रज्ञा के तहत अंजाम देना है।


जैसा कि बहुप्रचारित है,उसके विपरीत सच यह है कि बुद्ध के धम्म का अवसान नहीं हुआ है बल्कि बुद्ध धम्म का विश्वभर में विस्तार हुआ है और भारत से बाहर सर्वत्र बुद्ध धम्म का विकास की निरंतरता जारी है क्योंकि बाकी दुनिया में ब्राह्मणवाद की अटूट संघीय जाति व्यवस्था की संस्थागत संरचना ने संघों और भिक्षुओं  का विनाश नहीं किया है।


बुद्ध धम्म विश्वभर में मनुष्य और प्रकृति, समस्त जीवों और जीवन चक्र के हित में सत्य, शांति,अहिंसा,प्रेम,करुणा,बंधुता,भ्रातृत्व,मैत्री का पर्यावरण आंदोलन है।


बुद्धमय भारत के अवसान को ब्राह्मणवादी इतिहासकार अपनी जीत का परचम लहराते हुए बुद्ध के धम्म का अवसान बता रहे हैं। बुद्धमय भारत के अवसान की नींव पर तामीर हुआ है ब्राह्मण धर्म का नस्ली हिंदुत्व का पुनरुत्थान,मुक्तबाजारी नरसंहारी सैन्य राष्ट्र और असमानता, अन्याय, असहिष्णुता, घृणा, हिंसा, नरसंहार, मिथ्य़ा,शत्रुता, विवाद, आतंक, युद्ध और गृहयुद्ध का राजकाज,राजधर्म,राजकरण और राजनय।


इतिहास और विचारधारा ,माध्यमों और विधाओं की मृत्युघोषणा जैसे वर्चस्वी साम्राज्यवादी रंगभेद का शंखनिनाद है,वैसे ही भारत में धम्म के अवसान का ऐलान ब्राह्मण धर्म के हिंदुत्व के तिलिस्म में बदलने का सच है।जो किसी वसंत के वज्रनिनाद से भी बदला नहीं है।जो धम्म क्रांति के बिना बदलेगा भी नहीं।


विडंबना है कि बुद्धधम्म की सामाजिक क्रांति की नींव जो संघ है,ब्राह्मणधर्म के हिंदुत्व के संस्थागत संघ ने धम्म को पंथ में बदलकर,उपासना और आस्था और निष्क्रिय विपाश्यना में बदलकर उसी संघ का हिंदुत्वकरण कर दिया है।


संघ का मतलब अब ब्राह्मणवाद का संस्थागत संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है तो धम्म और पंचशील का न कोई संघ बचा है और न कोई संस्था है।


बुद्धमय भारत का हश्र यह बुद्धमय भारत का अवसान है जो हिंदू राष्ट्र में तब्दील है। लेकिन यह बुद्धधम्म का अवसान नहीं है और संस्थागत संघों के पुनर्निर्माण के तहत हम बुद्धमय भारत फिर बना सकते हैं।इसलिए बौद्ध अनुयायी ही नहीं,भारत के समस्त उत्पीड़ित वंचित बहुजनों को तथागत गौतम बुद्ध की तरह संगठित करना होगा और वह संगठन भी संस्थागत संघ संरचना बनाना होगा।कोई और विकल्प है नहीं।


इस कर्मकांडी तंत्र मंत्र यंत्र पंथ और निष्क्रिय विपाश्यना में भारत में बुद्ध धर्म के ज्ञान विज्ञान के केंद्र बने बिहार,मठ और संघों की विश्वविद्यालयी संरचना का ढहता जाना ही बुद्धमय भारत का अवसान है।बुद्धधम्म का अवसान यह कतई नहीं,नहीं है।


बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ता और सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।


बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ताऔर सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।जिसे तथागत बुद्ध के धम्म प्रवर्तन के मार्ग पर संस्थागत बौद्धसंघों,विहारों,मठों,विश्वविद्यालयों को पुनर्जीवित करके ही तैयार किया जा सकता है। मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।



भारत में बौद्ध संगठनों के लिए और उनके समन्वय समिति के लिए संघ संरचना बनाने की यह सबसे बड़ी चुनौती है तो सच यही है कि  बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ताऔर सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।संगठन और व्यक्ति के स्तर पर पंचशील की यह अग्निपरीक्षा है।



समझ लें कि भारतीय इतिहास में बहुजनों और प्रजाजनों के हकहकूक की लड़ाई और उनके वर्गीय ध्रूवीकरण के आंदोलन को तथागत बुद्ध ने जिसतरह ज्ञान विज्ञान और समाजिक यथार्थ की सम्यक दृष्टि के तहत सत्य और अहिंसा के मार्ग पर सामाजिक क्रांति में तब्दील कर दिया,वह दरअसल समाज और राष्ट्र का पुनर्निर्माण है।


बुद्धमय भारत के अवसान की पृष्ठभूमि में मनुस्मृति अनुशासन की निरंतरता ब्राह्मण धर्म के हिंदुत्व अस्मिता के तहत समता और न्याय आधारित समाज और राष्ट्र के विखंडन का अटूट सिलसिला है और उसका नतीजा यह अभूतपूर्व हिंसा, आतंक, घृणा, युद्ध और गृहयुद्ध का घना अंधियारा है कटकटेला।


ब्राहमण धर्म का पालन करने वाले ब्राह्मणों का रंगभेदी नस्लवादी कर्मकांडी हिंदुत्व बाकी लोगों ने हिंदुत्व के नाम अंगीकार किया है जबकि इतिहास और यथार्थ में हिंदू धर्म दरअसल ब्राह्मणधर्म है और इसकी सबसे बड़ी संस्था जाति व्यवस्था है।


जातिव्यवस्था की वंशगत असमान लेकिन दूसरे किसी न किसी से उंची हैसियत के हिंदुत्व के तहत गैरब्राह्मणों ने ब्राह्मणवाद को जो हिंदुत्व मान लिया,वहीं समानता और न्याय का अंत है।जिसके तहत सारे गैर ब्राह्मण ब्राह्मणों के गुलाम हैं।


बोधगया में आदरणीय भिक्खु भंतों से हमारी यही चर्चा रही है कि बोधिसत्व बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर के लाखों अनुयायियों ने जो धर्म दीक्षा ली है,वे अबतक 22 प्रतिज्ञाओं के बावजूद ब्राह्मण धर्म का ही पालन कर रहे हैं जाति का परित्याग किये बिना जबकि बाबासाहेब ने इसी जाति व्यवस्था से मुक्ति पाने के लिए ही धर्म दीक्षा का विकल्प चुना है।


बोधगया में आदरणीय भिक्खु भंतों से हमारी यही चर्चा रही है कि जाति बनी हुई है तो धर्म दीक्षा का मतलब क्या है।धर्म दीक्षा से पहले जाति उन्मूलन अनिवार्य है वरना धर्म दीक्षा भी वैदिकी कर्मकांड है।


दरअसल भारत में तथागत बुद्ध के धम्म का वास्तविक संकट जो मनुस्मृति अनुशासन की निरंतरता के साथ जारी है,वह यही है कि जाति के दायरे में कैद है धम्म और 22 प्रतिज्ञाओं के तहत धम्म और पंचशील से धर्मांतरित बौद्धों का कोई नाता नहीं है।


वे अनुसूचित बने रहकर हिंदुत्व के संघीय संस्थागत ढांचे की शरण में बने रहकर हिंदुत्व का लाभ उठाने के चक्कर में खुद को बौद्ध भी नहीं दर्ज कराते और भारत में जनगणना में बौद्धों की संख्या जो दर्ज हुई है,वह धर्मदीक्षा के तहत नवबौद्धों की संख्या से काफी कम है।


जाहिर है कि भारत में बौद्ध संगठनों के लिए और उनके समन्वय समिति के लिए संघ संरचना बनाने की यह सबसे बड़ी चुनौती है तो सच यही है कि  बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ताऔर सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।संगठन और व्यक्ति के स्तर पर पंचशील की यह अग्निपरीक्षा है।



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समाज और राष्ट्र के मनुष्यकल्याणे बहुजन हिताय नवनिर्माण, समता और न्याय का मिशन ही धम्म

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রবীন্দ্রনাথের রথের রশি মনে পড়ছে কী? অভিনীত হচ্ছেতো, কালের রথের চাকা দলিত মুসলমান ঐক্যের ঠেলাতে নড়ছে বলেইতো মনে হচ্ছে... এবারে কী বলেন কবি? পুরোহিতের থেকে আলাদা কিছু?

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बोधगया धम्म संदेश समाज और राष्ट्र के मनुष्यकल्याणे बहुजन हिताय नवनिर्माण,समता और न्याय का मिशन ही धम्म है। पलाश विश्वास

बोधगया धम्म संदेश

समाज और राष्ट्र के मनुष्यकल्याणे बहुजन हिताय नवनिर्माण,समता और न्याय का मिशन ही धम्म है।

पलाश विश्वास

डा.भिक्खु सत्यपाल महाथेरा की अध्यक्षता में बोधगया में भिक्खु संघ के धम्म सांसदों और भारत के लगभग सभी राज्यों से विभिन्न बौद्ध संगठनों के राष्ट्रीय,प्रादेशिक,जिला नेतृत्व और विभिन्न ट्रस्टों के प्रतिनिधियों की धम्म संसद 20 और 21 अगस्त को संपन्न हो गयी और बोधगया धम्म संदेश जारी हो गया।


इस मौके पर भिक्खु भंतों और विभिन्न बौद्ध संगठनों के साथ हमारी रात दिन अलग अलग बातचीत भी होती रही है।जिसका खुलासा हम आगे बहस और संवाद के सिलसिले में करते रहेंगे।बोधगया धम्मसंदेश पर भी हम बिंदुवार चर्चा जारी रखेंगे।


इसबीच गुगल प्लस के बाद अब फेसबुक का पुराना खाता हमारे काम का नहीं रहा।फेसबुक का नया खाता खुला है।इसलिए संवाद सीमित दायरे में ही संभव है।


जो लोग अब भी हमारी प्रासंगिकता और मित्रता काम लायक जरुरी मानते हैं, वे कृपया मेरे नये फेसबुक खाते या लिंकडइन से जुड़ें तो बेहतर।अलग से मेल भेजना  भी संभव नहीं है।सीधे हस्तक्षेप से संपर्क साधने का नंबर हैः 09312873760.


राष्ट्रीय बौद्ध धम्म संसद के बारे में विस्तृत ब्यौरे आशाराम गौतम से हासिल कर सकते हैं और उनका नंबर हैः09899853744.

जिन्हें भी इस संवाद के सिलसिले में कुछ कहना है,वे हस्तक्षेप या आशाराम गौतम से संपर्क साध सकते है।



बोधगया धम्म संदेश के प्रसारण के लिए हस्तक्षेप की नेटवर्किंग भी अनिवार्य है,कपया इसे जारी रखने की भी सोचें।जो अधर्म के खिलाफ तथागत गौतम बुद्ध के धम्म और पंचशील के साथ बोधिसत्व बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर और शहीदेआजम भगतसिंह की विचारधारा के तहत समाज और राष्ट्र के कायाकल्प के मिशन में लगे हैं,वैचारिक भिन्नता और अस्मिता विविधता बहुतलता और विभिनन्ता के बावजूद हम इस अभियान में उन सबका साथ चाहते हैं जाति, धर्म, नस्ल, भाषा निर्विशेष क्योंकि हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता मनुष्यता ,सभ्यता और प्रकृति के हित हैं।


इस अभियान में उन सबका साथ चाहते हैं जाति धर्म नस्ल भाषा निर्विशेष क्योंकि  समाज और राष्ट्र के मनुष्यकल्याणे, बहुजन हिताय नवनिर्माण,समता और न्याय का मिशन ही धम्म है।


धम्म संसद के माध्यम से देशभर के जिन प्रतिनिधियों से हमारा संवाद अभी अभी शुरु हुआ है,उनसे भी निवेदन है कि वे हमारे नये फेसबुक खाते से जुड़कर हमें अपने क्षेत्र में हो रही गतिविधियों और संवाद का सिलसिलेवार ब्यौरा देते रहें।


जितने जिलों और क्षेत्रों के प्रतिनिधि बोधगया में हमारे साथ थे,वे तमाम लोग हमारे साथ खड़े रहें तो फिर देख लें कि बिना कारपोरेट मीडिया बदलाव के लाखोंलाख रास्ते खुलते और खिलते हैं।


हर जिले से नेटवर्किंग बना लें हम, तो इस हिंसा के रंगभेदी नरमेधी फासिज्म के राजकाजी अधर्म के खिलाफ बोधगया संदेश से धम्म चक्र अभियान के तहत ही मानवकल्याण है।

राष्ट्रीय बुद्ध धम्मसंसद का आयोजन यूं तो पांचवीं दफा हुआ लेकिन इस बार धम्म संसद में धम्म की प्रासंगिकता वैश्विक ज्वलंत समस्याओं के संदर्भ में और भारत राष्ट्र में खासतौर पर अमन चैन,बंधुत्व, मैत्रीभाव,सहिष्णुता,विविधता बहुलता समता और न्याय के आधार पर तथागत गौतम बुद्ध के धम्म पर राष्ट्र और समाज के नवनिर्माण पर बहुआयामी संवाद का सिलसिला शुरु हुआ है।


इस बार धम्म संसद में भारत में बौद्ध धर्म की चुनौती,जाति व्यवस्था और आरक्षण के सिलसिले में बोधिसत्व बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजंडा के तहत समता और न्याय के लिए वर्गीय ध्रूवीकरण,राष्ट्र व्यवस्था और सामाजिक क्रांति के कार्यभार के संदर्भ में धम्म की व्याख्या और तदनुसार भावी कार्ययोजनाओं के तहत भारत और भारत की सीमाओं से बाहर मनुष्यता और प्रकृति के हित में मनुष्य के कल्याण आधारित धम्म चक्र प्रवर्तन की आवश्यकता पर गहन विचार विमर्श हुआ।


बुद्ध धर्म की चुनौतियों और समस्याओं को भारत के संविधान के फ्रेम के मातहत संवैधानिक तरीके से सुलझाने के लिए अलग बुद्धिस्ट पर्सनल ला,बुद्धिष्ट मैरेज एक्ट,बुद्धबिहार मोनास्ट्री एक्ट जैसे कुल 28 सूत्री एजंडा पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के विधि विशेषज्ञ पैनलों की मौजूदगी में विचार के बाद बोधगया धम्मसंदेश जारी करके भारतवर्ष और संपूर्ण विश्व के मनुष्यों को प्रेमबंधन में बांधने की  मानव शृंखला गढ़ते हुए मुक्तबाजारी अभूतपूर्व हिंसा और आतंकी तांडव के साथ हिंदुत्व के फासीवादी नरसंहारी अभियान के मुकाबले का संकल्प बौद्ध संगठनों की ओर से लिया गया।


इस बारे में तमाम तथ्य,चित्र,वीडियो और दस्तावेज हम हस्तक्षेप से जारी कर सकें, इसके लिए लिए बौद्ध संगठनों के राष्ट्रीय समन्वय समिति के राष्ट्रीय संगठक आशा राम गौतम और कानूनी सलाहकार,सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अंबिका राय जल्द ही हस्तक्षेप संपादक से मिलेंगे,ऐसा तय हुआ है।वे जितनी जल्दी संबंधित सामग्री हमें उपलब्ध करा देंगे, उतनी तेजी से हम धम्म संदेश पर संवाद का विषय विस्तार करेंगे।


धर्मांध मुक्तबाजारी सुनामी के खिलाफ धम्मचक्र प्रवर्तन के इस नये अभियान के विविध आयामों और कार्यक्रमों और मुद्दों पर हम बौद्ध संगठनों और भिक्खू संगठनों के आधिकारिक वक्तव्य और दस्तावेजों के मिलने के क्रम में खुली चर्चा करेंगे।


फिलहाल आशाराम गौतम जी पर निर्भर है कि वे बाकी देश से संवाद के क्या तौर तरीके अपनाते हैं और इस संवाद में हमारी क्या भूमिका होगी।




बोधगया धम्म संदेश समाज और राष्ट्र के मनुष्यकल्याणे बहुजन हिताय नवनिर्माण,समता और न्याय का मिशन ही धम्म है। पलाश विश्वास

बोधगया धम्म संदेश

समाज और राष्ट्र के मनुष्यकल्याणे बहुजन हिताय नवनिर्माण,समता और न्याय का मिशन ही धम्म है।

पलाश विश्वास

डा.भिक्खु सत्यपाल महाथेरा की अध्यक्षता में बोधगया में भिक्खु संघ के धम्म सांसदों और भारत के लगभग सभी राज्यों से विभिन्न बौद्ध संगठनों के राष्ट्रीय,प्रादेशिक,जिला नेतृत्व और विभिन्न ट्रस्टों के प्रतिनिधियों की धम्म संसद 20 और 21 अगस्त को संपन्न हो गयी और बोधगया धम्म संदेश जारी हो गया।


इस मौके पर भिक्खु भंतों और विभिन्न बौद्ध संगठनों के साथ हमारी रात दिन अलग अलग बातचीत भी होती रही है।जिसका खुलासा हम आगे बहस और संवाद के सिलसिले में करते रहेंगे।बोधगया धम्मसंदेश पर भी हम बिंदुवार चर्चा जारी रखेंगे।


इसबीच गुगल प्लस के बाद अब फेसबुक का पुराना खाता हमारे काम का नहीं रहा।फेसबुक का नया खाता खुला है।इसलिए संवाद सीमित दायरे में ही संभव है।


जो लोग अब भी हमारी प्रासंगिकता और मित्रता काम लायक जरुरी मानते हैं, वे कृपया मेरे नये फेसबुक खाते या लिंकडइन से जुड़ें तो बेहतर।अलग से मेल भेजना  भी संभव नहीं है।सीधे हस्तक्षेप से संपर्क साधने का नंबर हैः 09312873760.


धम्मसंसद के बारे में विस्तृत ब्यौरे आशाराम गौतम से हासिल कर सकते हैं और उनका नंबर हैः09899853744.

जिन्हें भी इस संवाद के सिलसिले में कुछ कहना है,वे हस्तक्षेप या आसारम गौतम से संपर्क साध सकते है।



बोधगया धम्म संदेश के प्रसारण के लिए हस्तक्षेप की नेटवर्किंग भी अनिवार्य है,कपया इसे जारी रखने की भी सोचें।जो अधर्म के खिलाफ गौतम बुद्ध के पंथ और अंबेडकर भगतसिंह की विचारधारा के तहत समाज और राष्ट्र के कायाकल्प के मिशन में लगे हैं,वैचारिक भिन्नता और अस्मिता विविधता बहुतलता और विभिनन्ता के बावजूद ङम इस अभियान में उन सबका साथ चाहते हैं जाति धर्म नस्ल भाषा निर्विशेष क्योंकि हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता मनुष्यता ,सभ्यता और प्रकृति के हित हैं।


इस अभियान में उन सबका साथ चाहते हैं जाति धर्म नस्ल भाषा निर्विशेष क्योंकि  समाज और राष्ट्र के मनुष्यकल्याणे बहुजन हिताय नवनिर्माण,समता औॅर न्याय का मिशन ही धम्म है।


धम्म संसद के माध्यम से देशभर के जिन प्रतिनिधियों से हमारा संवाद अभी अभी शुरु हुआ है,उनसे भी निवेदन है कि वे हमारे नये फेसबुक खाते से जुड़कर हमें अपने क्षेत्र में हो रही गतिविधियों और संवाद का सिलसिलेवार ब्यौरा देते रहें।जितने जिलों और क्षेत्रों के प्रतिनिधि बोधगया में हमारे साथ थे,वे तमाम लोग हमारे साथ खड़ रहें तो फिर देख लें कि बिन कारपोरेट मीडिया बदलाव के लाखोंलाख रास्ते खुलते और खिलते हैं।हर जिले से नेटवर्किंग बना लें हम तो इस हिंसा के रंगभेदी नरमेधी फासिज्म के राजकाजी अधर्म के खिलाफ बोधगया संदेश से धम्म चक्र अभियान के तहत ही मानवकल्याण है।

धम्मसंसद का आयोजन यूं तो पांचवीं दफा हुआ लेकिन इस बार धम्म संसद में धम्म की प्रासंगिकता वैश्विक ज्वलंत समस्याओं के संदर्भ में और भारत राष्ट्र में खासतौर पर अमन चैन,बंधुत्व, मैत्रीभाव,सहिष्णुता,विविधता बहुलता समता और न्याय के आधार पर महात्मा गौतम बुद्ध के पंथ पर राष्ट्र और समाज के नवनिर्माण पर बहुआयामी संवाद का सिलसिला शुरु हुआ है।


इस बार धम्म संसद में भारत में बौद्ध धर्म की चुनौती,जाति व्यवस्था और आरक्षण के सिलसिले में बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजंडा के तहत समता और न्याय के लिए वर्गीय ध्रूवीकरण,राष्ट्र व्यवस्था और सामाजिक क्रांति के कार्यभार के संदर्भ में धम्म की व्याख्या और तदनुसार भावी कार्ययोजनाओं के तहत भारत और भारत की सीमाओं से बाहर मनुष्यता और प्रकृति के हित में मनुष्य के कल्याण आधारित धम्म चक्र प्रवर्तन की आवश्यकता पर गहन विचार विमर्श हुआ।


बुद्ध धर्म की चुनौतियों और समस्याओं को भारत के संविधान के फ्रेम के मातहत संवैधानिक तरीके से सुलझाने के लिए अलग बुद्धिस्ट पर्सनल ला,बुद्धिष्ट मैरेज एक्ट जैसे कुल बीस सूत्री एजंडा पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के विधि विशेषज्ञ पैनलों की मौजूदगी में विचार के बाद बोधगया धम्मसंदेश जारी करके भारतवर्ष और संपूर्ण विश्व के मनुष्यों को प्रेमबंधन में बांधने की  मानव शृंखला गढ़ते हुए मुक्तबाजारी अभूतपूर्व हिंसा और आतंकी तांडव के साथ हिंदुत्व के फासीवादी नरसंहारी अभियान के मुकाबले का संकल्प बौद्ध संगठनों की ओर से लिया गया।


इस बारे में तमाम तथ्य,चित्र,वीडियो और दस्तावेज हम हस्तक्षेप से जारी कर सकें, इसके लिए लिए बौद्ध संगठनों के राष्ट्रीय समन्वय समिति के राष्ट्रीय संगठक आशा राम गौतम और कानूनी सलाहकार एडवोकेट अंबिका राय जल्द ही हस्तक्षेप संपादक से मिलेंगे,ऐसा तय हुआ है।वे जितनी जल्दी संबंधित सामग्री हमें उपलब्ध करा देंगे, उतनी तेजी से हम धम्म संदेश पर संवाद का विषय विस्तार करेंगे।


धर्मांध मुक्तबाजारी सुनामी के खिलाफ धम्मचक्र प्रवर्तन के इस नये अभियान के विविध आयामों और कार्यक्रमों और मुद्दों पर हम बौद्ध संगठनों और भिक्खू संगठनों के आधिकारिक वक्तव्य और दस्तावेजों के मिलने के क्रम में खुली चर्चा करेंगे।फिलहाल आशाराम गौतम जी पर निर्भर है कि वे बाकी देश से संवाद के क्या तौर तरीके अपनाते हैं और इस संवाद में हमारी क्या भूमिका होगी।



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Tuesday, August 23, 2016

#SAVE_BOIKONTHOPUR , #SAVE_TEA_WORKERS

Mohan Rabidas 

#SAVE_BOIKONTHOPUR , #SAVE_TEA_WORKERS 
Tea workers of Boikunthapur Tea Estate in Madhabpur upazila of Habiganj district are not getting their wages and ration for 14 weeks. On the other hand tea workers are not getting any medical treatment for 8 month. 4 tea workers already died for not getting medical treatment. All other opportunities provided by tea garden authority are stopped for 1 year. Violating the lease dead authority of Boukunthopur Tea Estate sold the shade trees and sand mine of the garden. 
As there is no income opportunity outside the tea garden, tea workers of Boikunthopur are in great economic crisis. Serious food crisis grips 416 tea garden workers along with around 4000 family members .These people are now struggling for existence, living on liquid extract from boiled rice and mashed tea leaves and chillies while the authorities continue receiving their labour.
"Give me food or shoot me -- I would say if I could see or had enough energy to shout. I'm too old to go elsewhere to earn money?" said Jamuna Sawtal, an 80-year-old blind woman in the tea garden area.
"I was happy to hear my grandson's plan to marry soon but now we are frustrated because tea garden owner did not pay him wages for 13 weeks," she said.
Sudhamoni Bhumij, 75, says, "If the government does not help us during the crisis period, I would rather like to be beheaded and let my blood flow in the garden."
"Hardship and struggle are constant companions of most of the indigenous people living in the area. But the present food crisis has left us in suffering worse than ever before," said Kartik Chowhan, 92, breaking down in tears.
Minoti Kairi, a tea worker of the garden, said they stopped their children's schooling due to the crisis.
Monib Karmakar, general secretary of Bangladesh Tea Labour Union's Baikunthapur tea garden unit, said the workers are falling sick as they have to pass their days half-fed for not getting wages with ration for 13 weeks. 
Most of the staff left the tea garden as they do not get salary regularly, he added.
"We request the owner to come on the spot and see our plight. Throughout the life we have worked in the tea garden. Where will we go now?" said Modhu Sawtal, 62. 
"We are also not getting proper treatment as the lone hospital of the garden has remained closed for the last six months," Ramnath Keut, Baikunthapur unit president of Bangladesh Tea Labour Union, said when this correspondent visited the tea garden on Monday.
An immediate help is needed to save the garden and tea workers.

I am requiting you to come forward to help the tea workers of Boikunthopur Tea Garden

Indian Express reports: Rohith Vemula was not a Dalit, says probe panel set up by HRD Ministry

Indian Express reports:


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