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Thursday, February 17, 2011

बात बुनियादी उठी By गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' on February 10, 2011

बात बुनियादी उठी

बात बुनियादी उठी

बात ये फिलवक्त की है साथियो ! इस देश में,
ये उदासी ऊपरी है साथियो इस देश में।republic-india-and-people

आप अब तक शक्ल हिन्दोस्तां की जो समझा किये,
सिर्फ वैसा ही नहीं है साथियो ! इस देश में।

गांधी-गौतम के फरेबी फलसफे को चीर कर,
हुआ पैदा नक्सली है साथियो ! इस देश में।

लाठी-गोली-चार्ज-एनकाउण्टरों की हकीकतें,
गर जमाना जान ले क्या हाल हो इस देश में।

वह आजादी सैंतालीसी किसने दी किसको मिली,
बात बुनियादी उठी रे शासको ! इस देश में।

मुक्त होकर ही रहेगा देश अपना क्योंकि अब,
हर गुलामी देख ली है साथियो ! इस देश में

साथियो ! यह देश कैसा तब बनेगा होगी जब,
सर्वहारा की हुकूमत सोचिये इस देश में।

- गिर्दा

(संभवतः 1980-81 के दौरान लिखी गई यह कविता हमारी जानकारी के अनुसार अप्रकाशित है। – संपादक)

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