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Sunday, June 30, 2013

चुटका परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर सरकार के पैंतरे के खिलाफ एकजुट हो रहे लोग

चुटका परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर सरकार के पैंतरे के खिलाफ एकजुट हो रहे लोग


लोकेश मालती प्रकाश

protest against Chutka nuclear power plantsभोपाल। चुटका परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर सरकार ने सोची-समझी रणनीति के साथ तेजी से कदम बढ़ाते हुये 31 जुलाई को मानेगांव (चुटका से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव) में जन-सुनवाई की घोषणा कर दी है। समझा जाता है कि इस जगह का चुनाव बहुत सोच-समझ कर किया गया है। पिछली बार जब 24 मई को जन-सुनवाई होने वाली थी तो उस समय सरकार ने यह देखा कि स्थानीय जनता न सिर्फ इस परियोजना के बिल्कुल खिलाफ है बल्कि सुनवाई का विरोध करने के लिये भारी संख्या में उस दिन चुटका गांव भी पहुँच गयी थी। इसलिये इस बार सरकार ने बड़ी धूर्तता से चाल चलते हुये जन-सुनवाई को दूर की जगह पर तय किया है ताकि गरीब आदिवासी जनता वहाँ अधिक संख्या में पहुँच ही न पाये। दूरी के अलावा सरकार को शायद यह भी उम्मीद है कि मानसून के मौसम में बारिश के चलते भी शायद स्थानीय और बाहरी लोग भी वहाँ आने से कतरायेंगे।

सरकार के इस पैंतरे के खिलाफ कई राजनीतिक व जनसंगठन एकजुट हो रहे हैं। चुटका परमाणु ऊर्जा संयंत्र और परमाणु ऊर्जा के खिलाफ 29 जून को प्लॉट न. 8, पत्रकार कॉलोनी, भोपाल में बैठक हुयी जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (म.प्र.), भारत की कम्युनिस्ट पार्टी –मार्क्सवादी-लेनिनवादी (म.प्र.), गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, चुटका परमाणु संघर्ष समीति, क्रांतिकारी नौजवान भारत सभा (म.प्र.) और शिक्षा अधिकार मंच, भोपाल के साथी शामिल हुये जबकि कई अन्य सहयोगी संगठनों ने अपना समर्थन प्रेषित किया। बैठक में तच किया गया कि इस लड़ाई में शामिल तीन राजनीतिक दल (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी – मार्क्सवादी-लेनिनवादी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी) दिल्ली में इसी मसले पर 11 जुलाई को प्रेस-रिलीज़ जारी करेंगे।

बैठक में सभी लोगों ने यह स्पष्ट निश्चय जाहिर किया कि अगर सरकार जनता के खिलाफ अपनी मनमानी पर अड़ी है तो जनता के हौसले भी कम नहीं हुये हैं। इस हौसले को सही नजरिए से मजबूत करते हुये चुटका परमाणु संयंत्र को रद्द करने और प्रस्तावित धोखेबाजीपूर्ण जन-सुनवाई का बहिष्कार करते हुये इसे इस बार हमेशा के लिये रद्द करवाने के लिये चुटका और आसपास के अंचल के साथ-साथ भोपाल, जबलपुर और मंडला में व्यापक प्रचार-प्रसार के अलावा जिन अन्य प्रस्तावों पर सहमति बनी वे इस प्रकार हैं –

1.    प्रेस-वार्ता -  11 जुलाई (गुरुवार) को भोपाल, जबलपुर व मंडला में चुटका परमाणु संयंत्र और परमाणु ऊर्जा के खिलाफ एक साथ सभी संगठनों की संयुक्त प्रेस-वार्ता।

2.    राज्यपाल को ज्ञापन -  12 जुलाई (शुक्रवार) को भोपाल में संयुक्त प्रतिनिधि-मंडल चुटका परमाणु संयंत्र और परमाणु ऊर्जा के खिलाफ और आदिवासियों के अधिकारों के राज्य द्वारा हनन के खिलाफ राष्ट्रपति को सम्बोधित ज्ञापन राज्यपाल को सौपेगा।

3.    धरना -  13 जुलाई (शनिवार) को भोपाल, जबलपुर व मंडला में एक साथ सभी संगठनों द्वारा धरना दिया जायेगा।

4.    दिल्ली में प्रेस-रिलीज़ -  इस लड़ाई में शामिल तीन राजनीतिक दल (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी – मार्क्सवादी-लेनिनवादी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी) दिल्ली में इसी मसले पर 11 जुलाई को प्रेस-रिलीज़ जारी करेंगे।

5.    चुटका व अन्य गावों में और मानेगांव में 15 जुलाई से स्थानीय स्तर पर धरना शुरु किया जायेगा।

6.    चुटका, मानेगांव व अन्य गावों में सघन प्रचार प्रसार में सहयोग के लिये भोपाल, जबलपुर व प्रदेश के अन्य जिलों से 25 जुलाई को कार्यदल पहुँचेंगे।

7.    जन-सम्मेलन -  चुटका परमाणु ऊर्जा संयंत्र और परमाणु ऊर्जा के खिलाफ 30 जुलाई (मंगलवार) को जन-सम्मेलन मानेगांव या आसपास आयोजित किया जायेगा।

8.    जन-सुनवाई का 31 जुलाई को अहिंसापूर्ण बहिष्कार।

9.    परमाणु संयंत्र का विरोध करते हुये, इसके पर्यावरणीय खतरे के बारे में या अन्य मसलों पर जो भी आपत्तियाँ दर्ज करनी होंगी वह 31 जुलाई से पहले की जायेंगी। जन-सुनवाई के नोटिस में इसका प्रावधान है। 31 जुलाई को हम केवल बहिष्कार करेंगे कोई आपत्ति या अर्जी नहीं दाखिल करेंगे।

10. प्रदेश के अलावा, देश और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उभारने के लिये लगातार मीडिया, इंटरनेट व अन्य साधनों से प्रचार प्रसार किया जायेगा।

इस कार्ययोजना की प्रगति का जायजा लेने के लिये 8 जुलाई (सोमवार) को प्लॉट न. 8, पत्रकार कॉलोनी, भोपाल में दोपहर 2 बजे फिर बैठक की जायेगी।


कुछ पुराने महत्वपूर्ण आलेख

उत्तराखण्ड की त्रासदी को राष्ट्रीय शोक घोषित करने की उठी माँग, प्रधानमन्त्री को सौंपा ज्ञापन

उत्तराखण्ड की त्रासदी को राष्ट्रीय शोक घोषित करने की उठी माँग, प्रधानमन्त्री को सौंपा ज्ञापन


पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की अविलम्ब हो समीक्षा

पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर पर किया श्रद्धाञ्जलि सभा का आयोजन

उत्तराखण्ड की त्रासदी को राष्ट्रीय शोक घोषित करने की उठी माँग, प्रधानमन्त्री को सौंपा ज्ञापननई दिल्ली, 30 जून। उत्तराखण्ड प्राकृतिक आपदा में हजारों लोगों की मौत पर केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय शोक घोषित करने की माँग को लेकर पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आज जंतर-मंतर पर एक श्रद्धाञ्जलि सभा का आयोजन किया। इस दौरान उन्होंने उत्तराखण्ड समेत देश के विभिन्न इलाकों में अनेक प्राकृतिक आपदाओं में मरने वाले लोगों को दो मिनट का मौन रखकर भावभीनी श्रद्धाञ्जलि दी। सभा के दौरान वक्ताओं ने उत्तराखण्ड त्रासदी को राष्ट्रीय शोक घोषित करने, पहाड़ी क्षेत्रों में विकास कार्यों की अविलम्ब समीक्षा करने और देश के विभिन्न इलाकों में चल रहे अँधाधुँध अवैध खनन पर तत्काल रोक लगाने की माँग की।

कार्यक्रम के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रविंद्र गढ़िया ने कहा कि मौसम विभाग की चेतावनियों की अनदेखी और राहत कार्य देर से शुरू करना भारी संवेदनहीनता के प्रमाण हैं। यह संवेदनहीनता अब भी जारी है। इसके बावजूद सरकार इस गम्भीर त्रासदी को राष्ट्रीय शोक के लायक नहीं मानती है। ना ही सरकार देश में बार-बार हो रही प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की समीक्षा कर रही है। इसलिये हम चाहते हैं कि सरकार उत्तराखण्ड की त्रासदी को राष्ट्रीय शोक घोषित करे और घटना की समीक्षा करते हुये पीड़ितों और प्रभावितों को हुये नुकसान की रिपोर्ट सार्वजनिक करे।

उत्तराखण्ड पीपुल्स फोरम के प्रकाश चौधरी ने कहा कि ये त्रासदी प्राकृतिक संसाधनों की अँधाधुँध लूट का नतीजा है। हम नहीं चाहते कि इस तरह जान-माल के नुकसान की घटनाओं की पुनरावृत्ति हो, इसलिये हमें इससे सबक लेते हुये उत्तराखण्ड में तमाम निर्माण कार्यों को अविलम्ब रोक लगायी जाये। साथ ही सरकार पर्यावरणविदों, भूगर्भशास्त्रियों, विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करे और उनकी सहमति के बाद ही निर्माण/विकास कार्यों को कराये।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य पत्र 'मुक्ति संघर्ष' के संपादक महेश राठी ने कहा कि उत्तराखण्ड की त्रासदी मानव निर्मित राष्ट्रीय तबाही है। सरकार और मीडिया जिस तरह इसे पेश कर रही है, वह एक पक्षीय है। जो मध्यवर्गीय लोग, तीर्थ यात्रा पर गये थे, उनके मारे जाने अथवा उनके नुकसान को इस त्रासदी का शिकार बताकर प्रमुखता से पेश किया जा रहा है। जबकि उत्तराखण्ड के दो सौ से ज्यादा ऐसे प्रभावित गांव हैं, जिनमें 28 से 30 की औसत से लोग लापता हैं। यह तीर्थ यात्रा उनकी आजीविका का साधन है लेकिन वे सरकार और मीडिया के चर्चे में नहीं हैं। इसके अलावा साढ़े चार हजार पंजीकृत खच्चर वाले अभी भी अपने पशुओं के साथ गायब हैं। एक हजार पालकियाँ थीं और उसके ढोने वाले करीब चार हजार लोगों का अभी तक पता नहीं है। इस तरह से देखें तो करीब 20000 से ज्यादा लोग मारे गये हैं लेकिन सरकार केवल 1000 सैलानियों और मध्यवर्गीय लोगों के गायब होने अथवा मरने की बात कर रही है। सरकार राहत एवम् बचाव कार्य को स्थानीय लोगों पर केन्द्रित करे। साथ ही वह उत्तराखण्ड की त्रासदी को राष्ट्रीय शोक घोषित करे और प्रभावित लोगों के पुनर्वास और आजीविका का स्थाई प्रबंध करे। इसके अलावा उत्तराखण्ड को पर्यावरण संरक्षित राज्य घोषित करे।


कार्यक्रम के आयोजक एवं पत्रकार महेंद्र मिश्र ने कहा कि एक आँकड़े के मुताबिक उत्तराखण्ड में इस जल प्रलय ने 2000 गाँवों को लील लिया। लोगों के 8000 आशियाने तबाह हो गये। लोगों को जोड़ने वाली 1520 सड़के क्षतिग्रस्त हो गयी हैं। 743 गांवों का सड़क सम्पर्क बिल्कुल टूट गया है। कुल 154 पुल बह गये। तकरीबन 12 हजार करोड़ रुपये के नुकसान की आशंका जतायी जा रही है। विभीषिका ने 16 लाख जिन्दगियों को अस्त-व्यस्त कर दिया है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल तकरीबन तीन करोड़ पर्यटक उत्तराखण्ड जाते हैं जिनमें 25 लाख चार धाम यात्रा पर आने वाले होते श्रद्धालु हैं। यहाँ के तकरीबन एक चौथाई लोग इसी पर आश्रित हैं। राहत और बचाव के नाम पर नेताओं की लफ्फाजियाँ ज्यादा हैं ठोस योजना और कार्रवाई कम। शुक्र है हमारे बहादुर जवान हैं। कमियाँ देखकर उन्हें हल करने की जगह सरकार ने अब दूसरा रास्ता अख्तियार कर लिया है। इस लिहाज से मीडिया तक को भी प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की ये त्रासदी कुदरती कम इंसानी ज्यादा है। पिछले 40 सालों में हमारी सरकारों ने पहाड़ के विकास का जो रास्ता चुना है, वह काफी खतरनाक है। पहाड़ी इलाकों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर पहाड़ों का अँधाधुँध अवैध खनन किया जा रहा है। नदियों की धाराओं को मोड़कर घातक बाँध बनाये जा रहे हैं। उत्तराखण्ड की घटना ऐसे ही गैरजिम्मेदाराना कार्यों का नतीजा है। अतः सरकार पहाड़ी इलाकों में विकास कार्यों के लिये होने वाले निर्माण और उसके दुष्परिणामों की गंभीरता से समीक्षा करे।

कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को संबोधित एक ज्ञापन भी दिया गया। इसमें उत्तराखण्ड त्रासदी को राष्ट्रीय घोषित करने और पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की समीक्षा अविलम्ब करने की माँग प्रमुखता से की गयी। श्रद्धाञ्जलि सभा के दौरान बचपन बचाओ आंदोलन के ओम प्रकाश, सामाजिक कार्यकर्ता शैलेंद्र गौड़, पत्रकार अरविंद कुमार सिंह, प्रदीप सिंह, शशिकांत त्रिगुण, शिव दास प्रजापति, सामाजिक कार्यकर्ता राकेश सिंह, अरुण कुमार, भास्कर शर्मा, जीवन जोशी, दिनेश सामवाल, गिरिजा पाठक, पन्ना लाल, कृष्ण सिंह, रविंद्र पटवाल, आजाद शेखर, सामाजिक कार्यकर्ता संजय कुमार, धनराम सिंह समेत दर्जनों लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार राहुल पांडे ने किया।

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L'MULVASI' CONFERENCE

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE



अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय  मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' 


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देहरादून में वैज्ञानिक डा. रवि चोपड़ा, वयोवृद्ध पर्यावरणविद और टिहरी बाँध आन्दोलन के योद्धा रहे एन.डी. जयाल, उत्तराखंड आर.टी. आई. क्लब के अध्यक्ष बी.पी.नवानी आदि अनेक मित्रों के साथ मिलकर हमने यह वक्तव्य इस तरह बनाया कि इसमें उत्तराखंड के हर हितैषी की सहमति मिल जाये. मुद्दे बुनियादी हैं और भाषा एकदम शिष्ट. हम चाहते हैं कि उत्तराखंड के हर आम और खास व्यक्ति की ही नहीं, उत्तराखंड के बाहर के हमारे शुभचिंतकों की भी इसमें सहमति मिल जाये. हजारों लोग जब इस वक्तव्य को लेकर अपनी एकजुटता दिखायेंगे तो शायद उत्तराखंड की सरकार हमारी आवाज़ दबाने में कामयाब नहीं होगी और इस त्रासदी की पुनरावृत्ति नहीं होगी. हम चाहते हैं कि आप अकेले नहीं, बल्कि सभी मित्र-परिचितों के साथ इस पर सहमति व्यक्त करें, अपने हस्ताक्षर करें.....

देहरादून में वैज्ञानिक डा. रवि चोपड़ा, वयोवृद्ध पर्यावरणविद और टिहरी बाँध आन्दोलन के योद्धा रहे एन.डी. जयाल, उत्तराखंड आर.टी. आई. क्लब के अध्यक्ष बी.पी.नवानी आदि अनेक मित्रों के साथ मिलकर हमने यह वक्तव्य इस तरह बनाया कि इसमें उत्तराखंड के हर हितैषी की सहमति मिल जाये. मुद्दे बुनियादी हैं और भाषा एकदम शिष्ट. हम चाहते हैं कि उत्तराखंड के हर आम और खास व्यक्ति की ही नहीं, उत्तराखंड के बाहर के हमारे शुभचिंतकों की भी इसमें सहमति मिल जाये. हजारों लोग जब इस वक्तव्य को लेकर अपनी एकजुटता दिखायेंगे तो शायद उत्तराखंड की सरकार हमारी आवाज़ दबाने में कामयाब नहीं होगी और इस त्रासदी की पुनरावृत्ति नहीं होगी. हम चाहते हैं कि आप अकेले नहीं, बल्कि सभी मित्र-परिचितों के साथ इस पर सहमति व्यक्त करें, अपने हस्ताक्षर करें.....

''पिछले दिनों की अतिवृष्टि के बारे में मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी से गर्म हवा पश्चिम की ओर तथा कश्मीर से ठंडी हवा पूर्व की ओर आने और उनका टकराव उत्तराखंड के निकट होने से उत्तराखंड में कम दबाव का क्षेत्र बना और अरब सागर से नम हवाओं का खिंचाव इस दिशा में हुआ। इन नम हवाओं के हिमालयी श्रृंखलाओं से टकराने से सम्पूर्ण उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में अतिवृष्टि हुई। अकेले नैनीताल में तीन दिनों में 1116 मिमी. वर्षा हुई जो नैनीताल की वार्षिक औसत वर्षा के 40 प्रतिशत से अधिक है। देहरादून में वर्षा का 88 साल का रिकार्ड टूट गया।
''पिछले दो दशकों से वैश्विक स्तर पर किये गये अध्ययनों का निष्कर्ष है कि 'ग्लोबल वार्मिंग' के कारण इस तरह की मौसम सम्बंधी चरम घटनाओं की आकस्मिता तथा आवृत्ति निरन्तर बढ़ रही है। उदाहरण के लिये उत्तराखंड में ही वर्ष 2012 में उत्तरकाशी तथा उखीमठ तथा वर्ष 2010 में अल्मोड़ा जिले की बादल फटने की घटनाओं का जिक्र किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में मोटरवाहन जनित प्रदूषण तथा सड़कों व बाँधों के निर्माण से उत्पन्न धूल के कणों से ऐसी अतिवृष्टि की संभावना बढ़ती है।
''16-17 जून की अतिवृष्टि के कारण उत्तराखंड की छोटी-बड़ी नदियों में कई जगहों पर बाढ़ आई। चार धाम क्षेत्र में हुई भयंकर तबाही की खबरें लगभग पूरी तरह जगजाहिर हो गई हैं। किन्तु शेष प्रदेश, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, में हुई तबाही के समाचार बहुत धीरे-धीरे आ रहे हैं और पूरी तस्वीर साफ होने में अभी काफी समय लगेगा। इस आपदा में जहाँ चार धाम में आये देश भर के हजारों श्रद्धालुओं ने अपने प्राण गँवाये, वहीं तीर्थ यात्रा के व्यवसाय से जुड़े हजारों परिवारों के कमाने वाले पुरुषों के मारे जाने की भी आशंका है। मंदाकिनी घाटी के 46 गाँवों के डेढ़ हजार से अधिक पुरुष अभी तक अपने घरों को नहीं लौटे हैं। प्रदेश भर में उफनाई हुई नदियों ने अपने रास्ते में अवरोध बनने वाले पहाड़ी गाँवों, कस्बों, मवेशियों, खेतों, गूलों, पेयजल योजनाओं, पुलों, निर्माणाधीन बाँधों, मोटर वाहनों, होटल-रिजाॅर्टों को नष्ट कर दिया। नदियों पर हुआ हर तरह का अतिक्रमण नदियों की चपेट में आया।
''इस आपदा ने उत्तराखंड में आपदा प्रबन्धन तंत्र की पूर्व तैयारियों तथा प्रबन्धन की पोल खोल कर रख दी। दो दिन तक सदमे में पड़ी सरकार जब हरकत में आयी भी तो उसका ध्यान केवल चार धाम यात्रियों पर केन्द्रित रहा। यहाँ भी जो जानें बचाई जा सकीं, वह सेना तथा अर्द्धसैनिक बलों के कारण। अन्य क्षेत्रों में राहत की बात तो दूर रही, क्षति का आँकलन भी अभी तक नहीं हो सका है। देश भर से राहत के लिये आये स्वयंसेवी संगठनों को दिशा निर्देश देने वाला भी अभी कोई नहीं है। बेहिसाब राहत सामग्री यहाँ-वहाँ बेकार पड़ी बर्बाद हो रही है।
''एक अतिवृष्टि किस तरह इतनी बड़ी मानवीय आपदा बन गई, इसके लिये हमें विकास के मौजूदा सोच का समझना पड़ेगा। उपभोक्तावादी मानसिकता और बाजारवाद प्रकृति के साथ लगातार छेड़खानी कर ऐसी घटनाओं को जन्म देते हंै। इसलिये उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौर में ही यहाँ की जनता ने इस तरह के विकास को खारिज कर जल, जंगल और जमीन पर अपना अधिकार माँगा था। तब यह आशा की गई थी कि नंगी पहाड़ी ढलानों पर हरियाली होगी। इन्ही जंगलों से यहां के निवासियों की ईंधन, चारा और पानी की जरूरतें पूरी होंगी, पुरुषों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने से पलायन रुकेगा और खुशहाली बढ़ेगी। जलागम प्रबन्धन से सूखी नदियों में पानी आयेगा। शराब के आतंक से मुक्ति मिलेगी।
''मगर उत्तराखंड के 13 वर्षों के जीवन में यहाँ के पहाड़ों के चरित्र और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की अवहेलना करते हुए यहाँ की सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों से पैसा कमाने को ही विकास का एकमात्र लक्ष्य बनाया। इसके लिये कमजोर पहाडि़यों पर भी बिना सोचे समझे सड़को, बाँधों, सुरंगों, पुलों एवं होटल-रिजाॅर्टों का निर्माण किया गया। इससे जो पैसा उत्पन्न हुआ वह तो कुछ ही हाथों तक पहुँचा, लेकिन प्रकृति से छेड़छाड़ से हुई आपदाओं की मार व्यापक पर्वतीय समाज को झेलनी पड़ी।
''इस वक्त जबकि सारा देश उत्तराखंड के कष्टों को महसूस कर रहा है, हमें विकास का यह रास्ता छोड़ना पड़ेगा। इससे पहले कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सिलसिला फिर से शुरू हो, हमें कुछ जरूरी निर्णय कर लेने चाहिये। सबसे पहले हमें यह मानना होगा कि उत्तराखंड का विकास मानव, सामाजिक एवं प्राकृतिक संपदा के विकास में ही निहित है। इसी से रोजगार एवं स्वावलंबी व टिकाऊ आर्थिक विकास के अवसर पैदा होंगे। यह तभी संभव है जब संविधान द्वारा 73वें-74वें संशोधन में निर्देशित विकेन्द्रित शासन व्यवस्था लागू हो और संविधान के अनुच्छेद '39 बी' के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का स्वामित्व स्थापित हो। इस कदम से मौजूदा विकास की नीतियों से उत्पन्न हुआ पूँजी का केन्द्रीकरण रुकेगा और आर्थिक समानता का रास्ता खुलेगा।
''फिलहाल प्रदेश भर में इस आपदा में हुई क्षति का जन सहभागिता से पूरी पारदर्शिता के साथ आँकलन कर त्वरित राहत पहुँचाना पहली प्राथमिकता है। जनजीवन के लिय आवश्यक सम्पर्क मार्ग, पेयजल लाइनंे, नहरें, स्कूल, स्वास्थ्य सेवायें, विद्युतापूर्ति आदि पुनस्र्थापित की जायें। प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित आजीविका के स्रोतों के सष्जन हेतु ठोस कार्य योजना बनाई जाये।''

इस वक्तव्य पर देश और प्रदेश के अधिकाधिक विशिष्ट व्यक्तियों तथा विशेषज्ञों की सहमति लेकर जन-जागरण किया जायेगा, ताकि उत्तराखंड ऐसी आपदाओं के दुष्चक्र से मुक्त होकर वास्तविक विकास के मार्ग पर आगे बढ़े।

PVCHR: Let a reminder be issued to the SSP, Varanasi by NHRC in case of Sapana


Sunday, June 30, 2013

Let a reminder be issued to the SSP, Varanasi by NHRC in case of Sapana

Case Details of File Number: 42218/24/72/2012
Diary Number 19566/JR
Name of the Complainant DR LENIN, EXECUTIVE DIRECTOR
Address PEOPLE VIGILANCE COMMITTEE ON HUMAN RIGHTS, SA 4/2A, DAULAT PUR
VARANASI , UTTAR PRADESH
Name of the VictimSAPNA CHAURASIA W/O SUNIL GUPTA
AddressR/O KASHMIRI GANJ, RAM MANDIR, KHOJNAN, PS. BHELPUR
VARANASI , UTTAR PRADESH
Place of IncidentKASHMIRI GANJ
VARANASI , UTTAR PRADESH
Date of Incident1/1/1991
Direction issued by the Commission These proceedings are on a complaint of Dr. Lenin, General Secretary to PVCHR, Varanasi, U.P., in which it is alleged that Smt. Sapna Chaurasia, 23, daughter of late Ramnarayan Chaurasia was forcibly produced before a Notary Public for attestation of a so- called marriage with one Sunil Kumar Gupta. She has been subjected to sexual abuse and harassment by him. Her brother and parents are also intimidated with the help of local police. No action was taken on her complaint to the police. Her own life as well as that of her son Ansh, 5, is in danger. The complainant has requested intervention of the Commission. The Commission took cognizance of matter on 13.12.2012 and called for a report from the SSP, Varanasi. But no report has been received. Let a reminder be issued to the SSP, Varanasi to send the requisite report within eight weeks.
Action TakenAdditional Information Called for (Dated 3/25/2013 )
http://www.pvchr.net/2013/06/0_3709.html

These proceedings are on a complaint of Dr. Lenin, General Secretary to PVCHR, Varanasi, U.P., in which it is alleged that Smt. Sapna Chaurasia, 23, daughter of late Ramnarayan Chaurasia was forcibly produced before a Notary Public for attestation of a so- called marriage with one Sunil Kumar Gupta. She has been subjected to sexual abuse and harassment by him. Her brother and parents are also intimidated with the help of local police. No action was taken on her complaint to the police. Her own life as well as that of her son Ansh, 5, is in danger. The complainant has requested intervention of the Commission. The Commission took cognizance of matter on 13.12.2012 and called for a report from the SSP, Varanasi. But no report has been received. Let a reminder be issued to the SSP, Varanasi to send the requisite report within eight weeks.
http://www.pvchr.net/2013/06/let-reminder-be-issued-to-ssp-varanasi.html

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