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Friday, April 13, 2012

प्रतिरोध की बहस में गांधी

प्रतिरोध की बहस में गांधी


Friday, 13 April 2012 11:09

विनोद शाही 
जनसत्ता 13 अप्रैल, 2012: प्रगतिशील जनतांत्रिक विचारधारा, गांधीवाद की चुनौती के बरक्स, इस सवाल से जूझ रही है कि भारत के पूर्वी सीमांतों में हो रहा माओवादी जन-प्रतिरोध 'हिंसक' क्यों नहीं होना चाहिए। गांधीवाद से प्रेरित होकर स्वामी अग्निवेश जैसे सारगर्भ विचारक और कांग्रेस के सत्ता-दर्शन की हिफाजत करने की इच्छा वाले सियासतदां इस संदर्भ में जब 'अहिंसक प्रतिरोध' की जरूरत को रेखांकित करते हैं, तो उनका मकसद गहरे जन-रूपांतर का न होकर, 'शांति को एक और मौका' देने जैसा अस्थायी और उथला होता है। 
इन दोनों पक्षों को देखते हुए ऐसा लगता है, जैसे विचार-विमर्श के ये दोनों खेमे, पहले से तय किए गए चिंतन मॉडलों के साथ प्रतिबद्ध होने की वजह से, वक्त की जरूरतों के मद्देनजर अपनी-अपनी विचारधाराओं के अंतर्विकास के लिए जरूरी चुनौतियों को स्वीकृति देने की बात टाल रहे हैं। यानी हमारा मौजूदा सत्ता-परिदृश्य, जिस रूप में और जिस हद तक तदर्थ तरीके से काम चलाने लगा है, उसी रूप और हद तक हमारी चिंतन की दुनिया भी अपनी प्रतिबद्धताओं और संजीदगियों की 'मंच जैसी प्रस्तुतियों' के आयोजन में उलझ गई है। 
चूंकि मीडिया की बढ़ती भूमिका ने चिंतन का एक बाजार खड़ा कर दिया है, इसलिए उसके द्वारा अहम बना दिए गए पेशकारियों और 'पैकेजिंग' के तौर-तरीकों से परहेज करना मुमकिन नहीं रह गया है। इस वजह से हमारे ज्यादातर चिंतक ऐसी बातें करना पसंद करते हैं, जिनकी मांग और खपत ज्यादा रहती है। यही वजह है कि इस माहौल में चिंतनधाराओं और दर्शनों के बुनियादी सवालों से जुड़े अंतर्विकास में रुकावट आती है, उससे रूपांतर मुल्तवी होता है और इस तरह सत्ता का यथास्थितिवादी ढांचा फायदा उठा कर खुद को बनाए-बचाए रखने में कामयाब हो जाता है।
'आॅपरेशन ग्रीन हंट' के विरोध में बोलते हुए अरुंधति राय ने कुछ काबिले-गौर एतराज किए हैं और कुछ चिंतन निष्कर्षों का काम-चलाऊ इस्तेमाल किया है। उसकी अहमियत और सीमाओं- दोनों को देखते हुए हम यहां विचार करने की कोशिश करेंगे। पूर्वांचल के माओवादी संघर्ष में हिंसक जन-प्रतिरोध को हालात की उपज मानते हुए अरुंधति राय की ओर से तर्क दिया गया है कि सत्ता की प्रगति और विकास की गलत नीतियों के चलते, जिनसे उनकी जमीन, रिहाइश, गुजर-बसर की उम्मीदें और संभावनाएं तक छीन ली गई हैं- उनकी आवाज अन्यथा किसी को कैसे सुनाई देगी? जो लोग रोटी-रोजी छिन जाने से, भूख से बिलख रहे हैं, वे क्या खाकर भूख-हड़ताल जैसा शांतिप्रिय अहिंसक गांधीवादी प्रतिरोध अपनाएंगे? और सलवा जुडूम जैसे शिविरों में रहते हुए अपने बलात्कारियों और नीम-हत्यारों से किस तरह के सत्याग्रह के जरिए न्याय पाने की उम्मीद रखेंगे? 
यहां हालात ऐसे हैं कि गांधी का रास्ता एकदम अप्रासंगिक मालूम पड़ता है। ऐसा इसलिए है कि जिन हालात में गांधी कामयाब हुए थे, उनमें वे एक तरह का सियासी रंगमंच पा रहे थे- जिसमें बहुत-से लोग ऐसे हों, जिन्हें हम दर्शक कह सकते हैं। इससे गांधी के सरोकार अपनी विचार-तर्क वाली विश्वसनीयता के बजाय, एक भाव नाट्य की तरह प्रभावपूर्ण हो जाते थे (देश भगत यादगार हाल, जालंधर में 17 अक्तूबर 2010 को दिए गए व्याख्यान से)।
यहां हमें जिस बात को ध्यानपूर्वक समझने की जरूरत है, वह यह है कि गांधी की विचारधारा को यथार्थ और विवेक की जमीन से अलहदा करने के लिए उनके कार्यकलापों को एक भंगिमा, भाव-नाट्य या रंग-अभिनय जैसी वस्तु की तरह प्रचारित करने से किस वर्ग का हित सधता रहा है- इसे टटोलना जरूरी है? और यह बात भी रेखांकित करने लायक है कि ऐसा गांधी और उनकी विचारधारा के साथ कब से और किनके द्वारा होता आया है? यही तो अंग्रेजों की प्राच्यवादी (ओरिंएटलिस्ट) प्रचार की पद्धति थी। वे गांधी को एक 'फकीर', 'संत' या आध्यात्मिक पुरुष की तरह प्रस्तुत करते थे और उनके कार्यकलापों को 'मूल्य आधारित सियासत' की तरह देखने-दिखाने के बजाय एक भाव-भंगिमा या रंगाभिनय की चीज बना डालते थे- ताकि उन्हें तर्क-विवेक या विचारधारा मूलक बहसों से अलहदा रखा जा सके और खुद को वैज्ञानिक चिंतन, आधुनिकता और प्रगति का अग्रदूत साबित किया जा सके। 
यहां अंग्रेजों का आग्रह था कि गांधी तो बेबस और अंतर्विरोधों से घिरे रहस्यवादी थे, पर यह अंग्रेजों की नैतिकता और उदारता का सबूत था कि वे गांधी को उनके मानवीय सरोकारों की वजह से अहमियत देते थे। यानी अगर वे नहीं होते और उनकी जगह कोई क्रूर तानाशाह होता तो गांधी की अहिंसा का मोल दो कौड़ी का भी नहीं होता।
तब अंग्रेज गांधी के रंगाभिनय के दर्शक होने का दावा करके, उनके सियासी नाटक की कामयाबी का सेहरा अपने सिरों पर बांध रहे थे और आज के मौजूदा परिदृश्य में यूरोप, अमेरिका की निगाहों में अहम हो गए हमारे बुद्धिजीवी उसी तरह खुद को ज्यादा संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न घोषित करके, फिर से गांधी के 'नए दर्शक समूह' वाला अभिनय कर रहे हैं। यह वह नाटक है जिसे दर्शक खुद रचते और खेलते हैं और तय करते हैं कि उनके नाटक में नायक की भूमिका किसे निभानी है। गांधी को 'नायक' मानने-बनाने की उनकी मजबूरी थी। 'रचना' इस बात पर टिकी रहती है कि वे अपने इस नाटक को क्या परिणति देते हैं? ऐसे नाटक का अंजाम क्या होगा- इसे वे पहले से   ही तय किए रहते हैं और फिर हमारे वास्तविक और जमीनी नायकों को उस भूमिका में बिठा कर, उन्हें वे अपनी इन मनगढ़ंत परिणतियों तक ले जाते हैं। 
नव-औपनिवेशिक गुलामी की मौजूदगी का  यह सबूत है, जिसे वे अपनी आयातित प्रगतिशीलता और आरोपित संघर्षशीलता के पक्ष में छिपाया करते हैं। अब कुछ गंभीर और बुनियादी सवाल। आधुनिक दुनिया में अभी तक फ्रांसीसी क्रांति, रूस और चीन की समाजवादी क्रांतियों और अन्य देशों में हुए अनेक सशस्त्र प्रतिरोधों से मानवजाति को क्या हासिल हुआ है? क्या प्रतिहिंसा, हिंसक सत्ता के दमन का मानवीय विकल्प होने में अभी तक कहीं भी कामयाब हो सकी है? 

इस सवाल की तह में उतरते हुए एक बात, जिसकी तरफ ध्यान जाना जरूरी है, यह है कि जब मानव समाज का कोई वर्ग या समूह, एक खास तरह के सत्ता-रूप या समीकरण के हिंसक और दमनकारी तौर-तरीकों का सशस्त्र प्रतिहिंसा से विकल्प तलाशता है तो इस प्रक्रिया में वह अपने 'मानवीय विकल्प के तमाम दावों' को एक आरोपित वस्तु में बदल देता है। और उसे ऐसा करके जब कामयाबी मिलती भी है, तो भी देर-सबेर वह यही पाता है कि सत्ता का पूर्व-रूप ही शक्ल बदल कर उसकी अपनी व्यवस्था की शक्ल में ढल गया है। आधुनिक काल में पूंजीवाद, जिस तरह के सत्ता परिदृश्य की रचना करता है, उसे पूंजीवाद द्वारा उपजाई गई हिंसा या प्रतिहिंसा के रूप कैसे बदल कर, एक विकल्प में ले जा सकते हैं?
दरअसल, सत्ता-व्यवस्था की हिंसाएं और दमन, सत्ता के खास रूपों की उपज नहीं होते, बल्कि वे समूची समाजार्थिक व्यवस्था का सार होते हैं। प्रगति और विकास के समाजार्थिक रूप ही सत्ता के समीकरण बनाते और उस सत्ता के हिंसा और दमन के रूपों का सृजन करते हैं। प्रतिहिंसाएं उन्हीं हिंसाओं और दमन-रूपों की गूंजों या अनुगूंजों की तरह प्रकट होती हैं। इसलिए प्रतिहिंसाओं से लाए गए सत्ता-रूपों के विकल्प भी, पूर्व सत्ता-रूपों जितने ही हिंसक और दमनकारी हो जाते हैं। रूस और चीन में आए सत्ता-रूपों के बदलाव, इसीलिए अंतत: पूंजीवादी समाजार्थिक संरचनाओं को खुल कर स्वीकार करने की ओर मुड़ गए हैं- क्योंकि वही तो यथार्थ है- नेपाल का माओवादी। 
सत्ता-विकल्प भी, गहरे में पूंजीवादी समाजार्थिक संरचनाओं का कोई विकल्प पेश नहीं करता है। क्यूबा या वेनेजुएला का समाजवादी विकल्प भी गहरे में, पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा के भीतर से ही कुछ थोड़े ज्यादा न्यायपूर्ण और समानतामूलक मुनाफे के वितरण से आगे नहीं जा पा रहा है। भारत के पूर्वांचल का माओवादी प्रतिरोध, आत्मरक्षात्मक है, रूपांतर या प्रगतिमूलक विकास मॉडल के विकल्प की चेतना की बात वहां भी दिखाई नहीं देती। 
ऐसे में हमारे चिंतक अगर खुद पूंजीवादी प्रगति के मॉडल और उसके फायदों के हिस्सेदार होने की हैसियत से पूर्वांचल में हो रहे जनविस्थापन की पीड़ा में हिस्सेदारी का दम भरते हैं- तो क्या हम उन्हें विकल्प लाने वाली मानवीय संवेदनशीलता का उदाहरण मान सकते हैं। पूंजीवाद के उपजते चिंतन के बाजार के हिस्सेदार, गांधी की अहिंसा का मजाक उड़ाते हैं, तो ऐसा करते हुए वे न गांधी का विकल्प बनाते हैं, न पूर्वांचल के लोगों की पीड़ा से निजात का कोई रास्ता दिखाते हैं। बेशक ऐसा करते हुए वे इस बाजार के ऐसे उत्तेजक चिंतन के प्रोडक्ट के निर्माता जरूर बन जाते हैं, जिसकी यूरोप और अमेरिका समेत पूरी 'पश्चिमीकृत' दुनिया में खासी मांग है। भारत में भी ऐसे नव-औपनिवेशिक बाजार की खपत के लिए बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं, जिसका फायदा इन बुद्धिजीवियों को मिल रहा है। 
गांधी के अहिंसक प्रतिरोध की चूंकि भारत में प्रयोग में लाने की संभावनाएं और जरूरतें प्रकट हुई हैं, इसलिए इसे मुख्यत: भारत के संदर्भ में ही समझना होगा। केवल एक अव्यावहारिक सांस्कृतिक सिद्धांत मान कर, इसे समाज विज्ञान और विकास के जमीनी रूपों से भिन्न घोषित करना- एक प्रचार मात्र है। इसी प्रचार की वजह से हमारे चिंतक मार्क्सवाद और गांधीवाद को एक दूसरे से अलहदा ही नहीं, परस्पर विरोधी भी मान बैठते हैं। हालांकि मार्क्सवाद विवेचन-विश्लेषण की द्वंद्वात्मक दृष्टि है, जिसकी कसौटी पर अगर गांधीवाद को समझने की कोशिश की गई होती तो ऐसा भ्रम खड़ा करना मुमकिन नहीं था। 
भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश रहा है। यहां यूरोप की तर्ज पर तेज विकास वाला मॉडल लागू नहीं हो सकता है। यूरोप में उच्चवर्गों द्वारा विविध सभ्यतामूलक विकास चरणों में जो तेज रफ्तार हासिल की गई, उसकी बुनियाद सामूहिक जनसंहारों पर रखी गई। भारत में इतनी बड़ी तादाद में गरीब और हाशिये के लोग हैं कि उस तरह की सामूहिक हिंसा यहां भयावह अराजकता फैला सकती है। 
इसलिए परस्पर सह-अस्तित्व वाले विकास मॉडल के तहत हमारे यहां अहिंसा के व्यावहारिक रूपाकार प्रकट हो सके, जो यूरोप की तुलना में यकीनन ज्यादा मानवीय थे। बेशक इससे भारत विकास की तेज रफ्तार पकड़ने से अक्सर चूकता रहा। विकास की वैसी तेज रफ्तार भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश पर आरोपित नहीं की जा सकती। इसलिए न सत्ता, सामूहिक जनसंहारों की हद तक हिंसक हो सकती है और न उसके चरित्र को बदलने के लिए प्रतिहिंसा कारगर उपाय हो सकती है। हमारे यहां लोगों को बचाने के लिए अहिंसा के सामूहिक व्यवहार ही काम के हैं और वही सत्ता पर भी और मानवीय होने का दबाव डालने की   भूमिका बनाते हैं। 
गांधी की कामयाबी की वजह अंग्रेज सरकार की नैतिक दयानतदारी नहीं थी, जो वहां मौजूद दर्शकों की तरह गांधी के लिए तालियां पीट रहे थे। हालांकि वह गांधी की इस समझ का नतीजा थी कि हमारे यहां प्रतिहिंसा हमें भी सत्ता के द्वारा किए जा सकने वाले सामूहिक जनसंहार का पात्र बना सकती थी, इसलिए हमें ज्यादा मानवीय रास्ता चुनने की जरूरत थी। इसके अलावा जब हम जनविकल्प के साथ खड़े होकर विकास के अपने मॉडल के साथ सत्ता का प्रतिरोध करते हैं, तो सत्ता का अनैतिक दमन खुद-ब-खुद बेनकाब होकर कमजोर पड़ने लगता है। जमीन पर खेतिहर जन का अधिकार, नमक पर नमक उत्पादकों का अधिकार आदि की जो तर्क-विधि है- वह हमें मार्क्सवाद-समर्पित जनवाद वाले समाज को ही 'अपने तरीके से खोजने और गढ़ने' की ओर ले जाती है। गांधी हमें उसी 'आत्म-सृजन के स्वराज' में ले जाना चाहते थे। 
अहिंसक व्यवहार शैली ही सृजनधर्मी हो सकती है और उसके भीतर से हम अपने भविष्य को रचने की उम्मीद के साथ दोबारा जन्म ले पाते हैं। गांधीवाद को अगर हम इस सृजन-दृष्टि की तरह देख सकेंगे तो वह हमें न मार्क्सवाद-विरोधी मालूम होगी और न पूर्वांचल के प्रतिरोध की निगाह से अव्यावहारिक।

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