| Friday, 13 September 2013 11:34 |
शेखर पाठक 1961 की जनगणना में भारत में 1652 'मातृभाषाएं' बताई गई थीं। दुर्भाग्य से जब 1971 की जनगणना हुई तो किसी नासमझी से उन भाषाओं के आंकड़े नहीं दिए गए या उन सबको 'अन्य भाषाओं' में गिना गया, जिनको बोलने वालों की संख्या दस हजार से कम थी। 1971 में दस हजार से ऊपर की आबादी में बोली जाने वाली एक सौ आठ भाषाओं की चर्चा है। एक प्रकार से सरकारी तौर पर लगभग पंद्रह सौ 'मातृभाषाओं' को दफ्न कर दिया गया। यह सरकारी तौर पर पहला 'भाषा संहार' (गणेश देवी इसे 'फोनोसाइड' कहते हैं) था। सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकता यह थी कि हमारे ऐतिहासिक प्रवाह में बोलियां सदा धारा का गतिशील हिस्सा बनी रहीं और भाषाएं किनारे शान से खड़ी होती रहीं। 'बोलियों' के प्रवाह की गति से 'भाषाओं' को भी नमी और ताप मिलता रहता था। फिर भाषाई प्रांतों के विचार-फलन के बाद संविधान की आठवीं अनुसूची बनी। अभी इस अनुसूची में बाईस भाषाएं हैं। संविधान की धारा 347 के अनुसार राज्य द्वारा नई भाषाओं को मान्यता देने का प्रावधान है। यूनेस्को के द्वारा प्रकाशित संकटग्रस्त भाषाओं के एटलस में एक सौ सत्तर भारतीय भाषाओं को खतरे में बताया गया है। यूनेस्को ने दस हजार से कम बोलने वालों की भाषाओं को भी लिया है। हालांकि यूनेस्को का एटलस बहुत-सी खामियां लिए है, पर यह एटलस विश्व संस्था द्वारा की गई महत्त्वपूर्ण पहल है। भाषा मनुष्य की सांस्कृतिक थाती का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह हमारे मनुष्य होने का प्रमाण है और रचनात्मकता को प्रकट करने का माध्यम भी। अभी दुनिया में मौजूद अनुमानित छह हजार भाषाओं में से बाईसवीं सदी तक मात्र तीन सौ भाषाओं के जीवित बचे रहने की संभावना प्रकट की गई है। इसका अर्थ हुआ कि हम अनेक समुदायों को तब तक या तो खो देंगे या वे किन्हीं और समाजों में विलीन हो जाएंगे। पर आज दुनिया और देश के अनेक समुदायों में अपनी स्थिति समझने और बदलने की चेतना दिखाई देती है। उन्हें सरकारों और निगमों/ कंपनियों से लड़ते हुए देखा जा सकता है। इसलिए अनेक लोगों को लगता है कि अब भाषाओं को बचाने की संभावना बढ़ गई है। आज पापुआ न्यूगिनी (900), भारत (870), इंडोनेशिया (600), नाइजीरिया (400), मैक्सिको (300) आदि भाषाई संपन्नता और विविधता वाले देश हैं। इनके मुकाबले औद्योगिक क्रांति वाले या विकसित देशों में यह भाषाई संपन्नता और विविधता नहीं है। अफ्रीका, अमेरिका, लातिनी अमेरिका और आस्ट्रेलिया में कैसे जन-भाषाओं का संहार किया गया, यह छिपा नहीं है। आज भाषा चेतना किसी भी और समय के मुकाबले अधिक है, उसे राजनीतिक और आर्थिक चेतना के साथ जोड़ने की जरूरत है। इतिहास में कई बार भाषाओं पर संकट मडराया। पहला संकट तब आया जब मनुष्य पशुचारण से खेती की ओर आया या कहें कि घुुमक्कड़ी से स्थायी बसाहटों की ओर आया। उद्योगीकरण के दौर में दूसरा संकट आया। यह उपनिवेशवाद से जुड़ा था। पर सबसे बड़ा संकट आज खगोलीकरण के दौर में आया है। क्योंकि पूंजीवाद के इस रूप की मुख्य फितरत एकल संस्कृति की है। वह पृथ्वी पर किसी भी तरह की विविधता नहीं चाहता है। कुछ विचार और संस्थाएं भी देशों या क्षेत्रों में इस तरह की विविधता के खिलाफ हैं। यह असहज और अप्राकृतिक स्वभाव कहा जा सकता है और इसका ज्यादा टिकना संभव नहीं होगा। 'भाषा' संस्था ने मात्र दो साल के भीतर तीन हजार भाषाविदों, भाषा कार्यकर्ताओं और समुदायों के सहयोग से आठ सौ सत्तर भाषाओं को सामने लाने में कामयाबी हासिल की है। यह काम इक्यावन या इससे भी अधिक खंडों में प्रकाशित हो रहा है। इसमें भारत की छियासठ लिपियां सामने आएंगी और एक संकेत/ इशारा ('साइन') भाषा भी। इस भाषा पर एक पूरा खंड है। इन खंडों में भारतीय हिमालयी क्षेत्र की सत्तर और समुद्र तटीय क्षेत्र की पैंतालीस भाषाएं प्रस्तुत हुई हैं। जनजातीय भाषाओं की कुल संख्या साढ़े तीन सौ से अधिक है। यह संस्था भाषाओं के नमूने रिकार्ड करने, सामुदायिक नृजातीय अध्ययन, पारिस्थितिकीय-सांस्कृतिक नक्शा तैयार करने का काम करेगी। यह एक ऐसे अंतरविश्वविद्यालयी केंद्र की स्थापना करना चाहती है, जहां गैर-अनुसूचित भाषाओं (जो आठवीं अनुसूची में नहीं हैं) का अध्ययन किया जाएगा। संस्था का सपना एक अखिल एशियाई भाषा सर्वेक्षण करने का भी है। वह सपने देखती है और उनको हथेली का यथार्थ भी बनाती है।
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Saturday, September 14, 2013
मरती भाषाओं के दौर में
मरती भाषाओं के दौर में
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